अनुपूर्वीशिक्षा
— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

२. सामञ्ञफलसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

३. अम्बट्ठसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइस तीखी बहस में भगवान घमंडी ब्राह्मण युवक की जाति पुछकर उसकी स्वघोषित श्रेष्ठता को सीधी चुनौती देते है, और अहंकार चूर कर देते है।

४. सोणदण्डसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

५. कूटदन्तसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायमहायज्ञ की अभिलाषा लिए सैकड़ों ब्राह्मणों संग आए कूटदंत को भगवान सबसे प्राचीन और सबसे फलदायी यज्ञ-पद्धति उजागर कर बताते हैं—एक ऐसा यज्ञ, जिसमें हिंसा त्यागकर जरूरतमंदों की सहायता की जाए।

६. महालिसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।

७. जालियसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।

८. महासीहनादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही राग है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

९. पोट्ठपादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

१०. सुभसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान के परिनिर्वाण के पश्चात, आनन्द भन्ते को भगवान की शिक्षाओं को स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया।

११. केवट्टसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या भिक्षुओं के द्वारा चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ? भगवान का इस पर अविस्मरणीय उत्तर।

१२. लोहिच्चसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या किसी की अध्यात्मिक सहायता नहीं करनी चाहिए? एक ब्राह्मण की दृष्टि का भगवान निवारण करते हैं।

१३. तेविज्जसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायकुछ सच्चे त्रिवेदी ब्राह्मण युवक ब्रह्मा के साथ समागम करने के मार्ग पर उलझन में हैं। किन्तु वे भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान पास ही रहते हैं।

२७. चूळहत्थिपदोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायक्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

३८. महातण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

३९. महाअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।

४०. चूळअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायश्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।

५१. कन्दरक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय'पशुओं का स्वभाव सीधा होता है, जबकि मानव स्वभाव का कोई भरोसा नहीं!' इस बात पर भगवान चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं।

५३. सेख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजब भगवान को पीठ दर्द हुआ, तब भन्ते आनन्द ने उपदेश की जिम्मेदारी संभाली और शाक्यों को साधना मार्ग का वर्णन किया।

६०. अपण्णक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

७६. सन्दक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायआनन्द भन्ते परिव्राजक गुरु से चर्चा करते हैं, तो वह अपने सभी शिष्यों को भिक्षु बनने भेज देते हैं।

७९. चूळसकुलुदायि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस रोचक और मजेदार चर्चा से परिव्राजकों का गुरु भिक्षु बनने का मन बनाता है, लेकिन उसके शिष्य उसे रोक देते हैं।

८०. वेखनस सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपिछले सूत्र के परिव्राजक सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।

९५. चङ्की सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।

१०१. देवदह सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।