✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • १. मूलपरियाय सुत्त

    १. मूलपरियाय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!

  • २२. अलगद्दूपम सुत

    २२. अलगद्दूपम सुत

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

  • ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

  • ४९. ब्रह्मनिमन्तनिक सुत्त

    ४९. ब्रह्मनिमन्तनिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक हैरतअंगेज सूत्र, जिसमें भगवान जाकर ब्रह्मा की दृष्टि सुधारने का प्रयास करते हैं।

  • ५०. मारतज्जनीय सुत्त

    ५०. मारतज्जनीय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    मार महामोग्गल्लान भन्ते को परेशान करता है। तब वे उसे अपनी पूर्वजन्म कथा सुनाते हैं, जिसमें वे स्वयं मार थे।

  • ६३. चूळमालुक्य सुत्त

    ६३. चूळमालुक्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु जाकर भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।

  • ६५. भद्दालि सुत्त

    ६५. भद्दालि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान भिक्षुओं को एक नया शिक्षापद पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक भिक्षु साफ मना कर देता है।

  • ६७. चातुम सुत्त

    ६७. चातुम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    विहार में शोर मचाने वाले भिक्षुओं को भगवान निष्कासित कर देते हैं, लेकिन उन्हें वापस स्वीकारने पर वे चार संभावित खतरों से सावधान करते हैं।

  • ७०. कीटागिरि सुत्त

    ७०. कीटागिरि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।