✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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गंभीर विश्लेषण

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • १. ब्रह्मजालसुत्तं

    १. ब्रह्मजालसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    सुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

  • १. मूलपरियाय सुत्त

    १. मूलपरियाय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!

  • ९. सम्मादिट्ठि सुत्त

    ९. सम्मादिट्ठि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते सम्यक-दृष्टि को अनोखे अंदाज में, गहरे प्रतीत्य समुत्पाद के आधार पर परिभाषित करते हैं।

  • १५. महानिदान सुत्त

    १५. महानिदान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    आयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होंने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

  • २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

  • ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

  • ४३. महावेदल्ल सुत्त

    ४३. महावेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

  • ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ उपासक के गहरे सवालों का उत्तर एक प्रसिद्ध भिक्षुणी देती हैं। और क्या ही लाजवाब उत्तर देती हैं!

  • ५४. पोतलिय सुत्त

    ५४. पोतलिय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।

  • ५९. बहुवेदनीय सुत्त

    ५९. बहुवेदनीय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    दो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

  • ६०. अपण्णक सुत्त

    ६०. अपण्णक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

  • ६४. महामालुक्य सुत्त

    ६४. महामालुक्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

  • ७४. दीघनख सुत्त

    ७४. दीघनख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके परिव्राजक भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।

  • ७८. समणमुण्डिक सुत्त

    ७८. समणमुण्डिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक परिव्राजक भगवान के उपासक को “अजेय श्रमण” के चार गुण बताता है, पर भगवान उसका खंडन कर दस गुण बताते हैं।

  • १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

  • १०५. सुनक्खत्त सुत्त

    १०५. सुनक्खत्त सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    जो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।