✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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गंभीर विश्लेषण

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

    इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

    लेख

    यह ब्रह्मांड का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' है। ये वह धम्म नियम है जिससे ब्रह्मांड के अणु-अणु से लेकर आकाशगंगाएँ और हमारे मन का हर एक विचार संचालित होता है। इसी में पूरी सृष्टि गुंथी हुई है।

  • प्रतीत्य समुत्पाद

    प्रतीत्य समुत्पाद

    लेख

    यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

  • आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना

    आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना

    लेख

    इसे 'आर्य' इसलिए कहा गया है क्योंकि जब इसके आठों अंग पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तब यह किसी भी साधारण मनुष्य को पूर्णतः बदलकर संबोधि के प्रथम सोपान—श्रोतापत्ति—पर खड़ा कर देता है और उसे 'आर्य-जन' बना देता है।

  • इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना

    इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना

    लेख

    यह सच है कि ध्यान में कुछ लोग इन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि इन शक्तियों का उपयोग कैसे करें ताकि ये मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनें।

  • इन्द्रिय की भावना

    इन्द्रिय की भावना

    लेख

    इन पाँच इन्द्रियों का अंतिम उद्देश्य यही 'अमृत' प्राप्त कराना है। ये पाँच इन्द्रियाँ नदी पार कराने वाली एक मज़बूत नाव की तरह हैं; ये साधना के परम उपकरण हैं, स्वयं लक्ष्य नहीं।

  • उद्धच्चकुकुच्च - बेचैनी-पश्चाताप और उसका त्याग

    उद्धच्चकुकुच्च - बेचैनी-पश्चाताप और उसका त्याग

    लेख

    बेचैनी और पश्चाताप चित्त में उठा एक ऐसा तूफान है, जो हमारी अतिरिक्त और असंतुलित ऊर्जा का परिणाम है। जैसे उच्च रक्तचाप शरीर को थका देता है, वैसे ही चंचलता और अतीत का पछतावा चित्त को रोगी बना देते हैं।

  • कामछन्द - कामेच्छा और उसका त्याग

    कामछन्द - कामेच्छा और उसका त्याग

    लेख

    जो व्यक्ति जितना कामुकता में डूबता है, उसकी संवेदनाएँ उतनी ही मरती जाती हैं। उसका चित्त सूक्ष्म से गिरकर इतना स्थूल हो जाता है कि एक समय बाद उसे साधारण जीवन नीरस और बेजान लगने लगता है। तब और मज़ा निचोड़ने के लिए वह घिनौने कर्मों और नशे की दलदल में उतर जाता है।

  • थिनमिद्ध - सुस्ती-तंद्रा और उसका त्याग

    थिनमिद्ध - सुस्ती-तंद्रा और उसका त्याग

    लेख

    सुस्ती कोई साधारण नींद नहीं है; यह यथार्थ से भागने का चित्त का एक रक्षातंत्र है। जब चित्त वर्तमान क्षण की चुनौतियों या नीरसता का सामना नहीं कर पाता, तो वह खुद को 'शट डाउन' करने लगता है। व्यक्ति को लगता है कि उसे शारीरिक विश्राम चाहिए, लेकिन असल में उसका चित्त सत्य से आँखें चुरा रहा होता है।

  • बल की भावना

    बल की भावना

    लेख

    साधना के मार्ग पर जो पाँच इन्द्रियाँ अभ्यास की भट्टी में तपकर पूरी तरह परिपक्व हो जाती हैं, तो वे ही 'बल' बन जाती हैं।

  • बोज्झङ्ग की भावना

    बोज्झङ्ग की भावना

    लेख

    बोध्यङ्ग, अर्थात 'संबोधि' के सात आवश्यक अंग। ये वे सात परम गुण हैं, जो जब एक साथ पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो साधक के चित्त के सभी अज्ञान रुपी जालों को काटकर उसे सीधे अंतिम विमुक्ति के द्वार पर खड़ा कर देते हैं।

  • ब्यापाद - दुर्भावना और उसका त्याग

    ब्यापाद - दुर्भावना और उसका त्याग

    लेख

    दुर्भावना, दरअसल, आत्मरक्षा की एक अंधी प्रतिक्रिया है। जब हम किसी मामूली बात को भी अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान बैठते हैं, तो यह तुच्छ-सी बात भीतर धधकती आग बन जाती है। जो ऊर्जा दूसरों को जलाने उठती है, वह सबसे पहले स्वयं को ही राख कर देती है।

  • विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग

    विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग

    लेख

    उलझन या शंका बाहरी जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि भीतर की अस्पष्टता से जन्म लेती है। जब चित्त का अपना कोई ठोस आधार नहीं होता, तो वह मानसिक गुलामी, अंधविश्वास और अनिश्चितता के रेगिस्तान में भटकने लगता है।

  • सतिपट्ठान - स्मृतिप्रस्थान की मूल साधना

    सतिपट्ठान - स्मृतिप्रस्थान की मूल साधना

    लेख

    यहाँ हमारा उद्देश्य उन व्यावहारिक और सीधी स्मृति साधनाओं को सामने रखना है, जिन्हें कोई भी आम व्यक्ति अपने कमरे में बैठकर तुरंत शुरू कर सके।

  • सम्मपधान - सम्यक परिश्रम की भावना

    सम्मपधान - सम्यक परिश्रम की भावना

    लेख

    बौद्ध साधना में सम्मपधान का सिद्धांत आज ध्यान के बारे में प्रचलित कई मिथकों और धारणाओं को पूरी तरह से तोड़ देता है।

  • १. ब्रह्मजालसुत्तं

    १. ब्रह्मजालसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    सुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

  • १. मूलपरियाय सुत्त

    १. मूलपरियाय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!

  • ९. सम्मादिट्ठि सुत्त

    ९. सम्मादिट्ठि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते सम्यक-दृष्टि को अनोखे अंदाज में, गहरे प्रतीत्य समुत्पाद के आधार पर परिभाषित करते हैं।

  • १५. महानिदान सुत्त

    १५. महानिदान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    आयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होंने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • १८. मधुपिण्डिक सुत्त

    १८. मधुपिण्डिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान के मुख से निकला 'प्रपंच' पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

  • २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

  • २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

  • ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    ३८. महातण्हासङ्खय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

  • ४३. महावेदल्ल सुत्त

    ४३. महावेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

  • ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ उपासक के गहरे सवालों का उत्तर एक प्रसिद्ध भिक्षुणी देती हैं। और क्या ही लाजवाब उत्तर देती हैं!

  • ५४. पोतलिय सुत्त

    ५४. पोतलिय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।

  • ५९. बहुवेदनीय सुत्त

    ५९. बहुवेदनीय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    दो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

  • ६०. अपण्णक सुत्त

    ६०. अपण्णक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

  • ६४. महामालुक्य सुत्त

    ६४. महामालुक्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

  • ७४. दीघनख सुत्त

    ७४. दीघनख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके परिव्राजक भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।

  • ७८. समणमुण्डिक सुत्त

    ७८. समणमुण्डिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक परिव्राजक भगवान के उपासक को “अजेय श्रमण” के चार गुण बताता है, पर भगवान उसका खंडन कर दस गुण बताते हैं।

  • १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    १०२. पञ्चत्तय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

  • १०५. सुनक्खत्त सुत्त

    १०५. सुनक्खत्त सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    जो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।

  • १०६. आनेञ्जसप्पाय सुत्त

    १०६. आनेञ्जसप्पाय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान कामुकता से परे जाने के ठोस साधना-मार्ग बताते हैं, और अंततः उन्हें भी लाँघने की प्रेरणा देते हैं।

  • १०९. महापुण्णम सुत्त

    १०९. महापुण्णम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे भगवान भिक्षुओं से घिरे होते हैं। ऐसे रोमहर्षक अवसर को भाँपकर एक भिक्षु भगवान से प्रश्नोत्तर करता है।

  • ११०. चूळपुण्णम सुत्त

    ११०. चूळपुण्णम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे, भगवान स्वयं रोमहर्षक अवसर को भाँपकर, सत्पुरुष और असत्पुरुष की व्याख्या करते हैं।

  • १११. अनुपद सुत्त

    १११. अनुपद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान सारिपुत्त भन्ते की धम्म-विपश्यना की कथा बताते हैं, जो समाधि की सभी अवस्थाओं से गुजरते हुए निरोध अवस्था तक पहुँचती है।

  • ११३. सप्पुरिस सुत्त

    ११३. सप्पुरिस सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान यहाँ विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से असत्पुरुष भिक्षु और सत्पुरुष भिक्षु के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।

  • ११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त

    ११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान यहाँ धम्म की जटिलता को हटाकर एक सीधा मापदंड सामने रखते हैं—कि कौन-सी बात अपनाने योग्य है और कौन-सी नहीं।

  • ११५. बहुधातुक सुत्त

    ११५. बहुधातुक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस दुनिया को ख़तरा मूर्ख से है, ज्ञानी से नहीं—और विवेकशील ज्ञानी वही है जो धातुओं, आयामों, प्रतित्य-समुत्पाद और संभव–असंभव में कुशल हो।

  • ११७. महाचत्तारीसक सुत्त

    ११७. महाचत्तारीसक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस सूत्र में भगवान आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों की 'लौकिक' और 'आर्य' परिभाषाएँ देते हैं और उनके आपसी संबंध को स्पष्ट करते हैं।

  • ११८. आनापानस्सति सुत्त

    ११८. आनापानस्सति सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।

  • १३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त

    १३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    महाकच्चान भन्ते अपने अनूठे अंदाज में ‘भद्देकरत्त’ कविता के गहरे अर्थों को भिक्षुओं के सामने खोलते हैं।