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देवता के लिए
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२१. सक्कपञ्ह सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदेवताओं का राजा होने के कारण, इन्द्र सक्क, सद्धर्म सुनने से वंचित रहता था। जब भी वह ऋषियों ने धर्म पुछने जाता, ऋषि ही उनसे पुछने लगते। अंततः उसने भगवान से भेंट की और धर्म के उत्तर सुनकर श्रोतापन्न बना।

३७. चूळतण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान से धम्म सुनने पर भी देवराज इन्द्र मदहोश रहता है। तब महामोग्गल्लान भन्ते उसके रोंगटे खड़े कर उसे होश दिलाते हैं।

४९. ब्रह्मनिमन्तनिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक हैरतअंगेज सूत्र, जिसमें भगवान जाकर ब्रह्मा की दृष्टि सुधारने का प्रयास करते हैं।