पटिपदा
— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —




आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना
लेखइसे 'आर्य' इसलिए कहा गया है क्योंकि जब इसके आठों अंग पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तब यह किसी भी साधारण मनुष्य को पूर्णतः बदलकर संबोधि के प्रथम सोपान—श्रोतापत्ति—पर खड़ा कर देता है और उसे 'आर्य-जन' बना देता है।

आहार प्रतिकूल संज्ञा
लेखभगवान कहते हैं—आहार-प्रतिकूल नज़रिए की साधना करना, उसे विकसित करना — महाफ़लदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है। कैसे साधक आहार-प्रतिकूल नज़रिए की साधना करता है?

इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना
लेखयह सच है कि ध्यान में कुछ लोग इन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि इन शक्तियों का उपयोग कैसे करें ताकि ये मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनें।

इन्द्रिय की भावना
लेखइन पाँच इन्द्रियों का अंतिम उद्देश्य यही 'अमृत' प्राप्त कराना है। ये पाँच इन्द्रियाँ नदी पार कराने वाली एक मज़बूत नाव की तरह हैं; ये साधना के परम उपकरण हैं, स्वयं लक्ष्य नहीं।

कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म
लेखकुशल (स्वभाव) को बढ़ाओ! कुशल को बढ़ाया जा सकता है। यदि कुशल को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो मैं तुमसे न कहता...

ध्यान-साधना कैसे करें?
लेखकुछ साधक शांत प्रकृति के होते हैं, जो सीधे श्वास पर ध्यान केंद्रित कर सहज रूप से समाधि प्राप्त कर लेते हैं। दूसरी ओर, कुछ साधक स्वभाव से उग्र होते हैं, उनके लिए उपयुक्त मार्ग है—दुक्खा पटिपदा।

बल की भावना
लेखसाधना के मार्ग पर जो पाँच इन्द्रियाँ अभ्यास की भट्टी में तपकर पूरी तरह परिपक्व हो जाती हैं, तो वे ही 'बल' बन जाती हैं।

बोज्झङ्ग की भावना
लेखबोध्यङ्ग, अर्थात 'संबोधि' के सात आवश्यक अंग। ये वे सात परम गुण हैं, जो जब एक साथ पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो साधक के चित्त के सभी अज्ञान रुपी जालों को काटकर उसे सीधे अंतिम विमुक्ति के द्वार पर खड़ा कर देते हैं।

शुरुवात कैसे करें - छठा कदम - भावना
लेखभावना' का अर्थ है—अच्छे गुण बढ़ाना, जैसे मेत्ता (सद्भावना), करुणा, शांति, एकाग्रता और अंतर्ज्ञान, जो हमारे भीतर की पुरानी, अकुशल प्रवृत्तियों को कम करते-करते अंततः उन्हें समाप्त तक कर देते हैं।

सतिपट्ठान - स्मृतिप्रस्थान की मूल साधना
लेखयहाँ हमारा उद्देश्य उन व्यावहारिक और सीधी स्मृति साधनाओं को सामने रखना है, जिन्हें कोई भी आम व्यक्ति अपने कमरे में बैठकर तुरंत शुरू कर सके।

सम्मपधान - सम्यक परिश्रम की भावना
लेखबौद्ध साधना में सम्मपधान का सिद्धांत आज ध्यान के बारे में प्रचलित कई मिथकों और धारणाओं को पूरी तरह से तोड़ देता है।




३. सेक्ख पटिपदा
ग्रन्थ / पटिपदायहाँ कभी इस दुनिया में तथागत प्रकट होते है—अरहंत, सम्यक-सम्बुद्ध, विद्या व आचरण में संपन्न...

४. वीरियारम्भ
ग्रन्थ / पटिपदाअकुशल त्याग दो, भिक्षुओं! अकुशल त्याग सकते है। यदि अकुशल न त्याग सकते, तो मैं तुम्हें न कहता...

५. कामच्छन्दप्पहान
ग्रन्थ / पटिपदाकल्पना करो कि एक गीली, रसदार लकड़ी, जल में पड़ी हो, और एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आए (सोचते हुए) ‘मैं अग्नि जलाऊंगा। मैं गर्मी प्रकट करूँगा’...


७. अरियसच्च
ग्रन्थ / पटिपदाएक समय भगवान कौशाम्बी के समीप शीशमवन में रहते थे। उन्होंने शीशम के कुछ पत्ते हाथ में लेकर भिक्षुओं से पूछा—क्या लगता है भिक्षुओं, क्या अधिक है...


८. अरियसच्च वित्थार
ग्रन्थ / पटिपदाजब ‘चित्त की एकाग्रता’ सात-अंगों से परिपूर्ण हो, तब उसे ‘आर्य सम्यकसमाधि’ कहते है। वही सात-अंग उसका आधार बनते है, और वही उसकी पूर्व-आवश्यकता है...

९. सब्बासवादि
ग्रन्थ / पटिपदाभिक्षुओं, जो स्वयं जानता है, देखता है—मैं कहता हूँ उसके बहाव थमते है। जो स्वयं नहीं जानता, नहीं देखता, उसके बहाव नहीं थमते। क्या स्वयं जानता है, देखता है?

१०. सतिपट्ठान
ग्रन्थ / पटिपदायह चार स्मृतिप्रस्थान एकतरफ़ा मार्ग है, भिक्षुओं—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक विलाप लाँघने के लिए, दर्द व्यथा विलुप्त करने के लिए, सही तरीक़ा पाने के लिए, निर्वाण साक्षात्कार के लिए...

११. ब्रह्मविहारादि
ग्रन्थ / पटिपदाध्येयकुशल सन्तपद-अभिलाषी को यह करना चाहिए—सक्षम, सीधा और स्पष्टवादी हो...

१२. दुक्खा पटिपदा
ग्रन्थ / पटिपदाचार प्रगतिपथ होते है, भिक्षुओं—कष्टपूर्ण प्रगतिपथ मंद विशिष्ट-ज्ञान, कष्टपूर्ण प्रगतिपथ शीघ्र विशिष्ट-ज्ञान, सुखपूर्ण प्रगतिपथ मंद विशिष्ट-ज्ञान, तथा सुखपूर्ण प्रगतिपथ शीघ्र विशिष्ट-ज्ञान...

१३. अतिरित्त भावना
ग्रन्थ / पटिपदाअच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनौनी स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनरहित पक्ष देखते हुए रहे। अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनरहित स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनौना पक्ष देखते हुए रहे...

१४. समाधिकुसल
ग्रन्थ / पटिपदाभिक्षुओं, जिस भिक्षु में छह गुण होते है, वह पर्वतराज हिमालय को चकनाचूर कर सकता है। अविद्या का कहना ही क्या! कौन-से छह?

१५. संवेग ओवाद
ग्रन्थ / पटिपदाभिक्षुओं, दस धर्म होते है, जिनके प्रति प्रवज्यितों को हमेशा चिंतनशील रहना चाहिए। कौन से दस?


प्रत्येक श्वास के साथ
ग्रन्थथानिस्सरो भिक्षु की यह प्रसिद्ध कृति ध्यान-साधना पर आधारित एक सरल, स्पष्ट और पूरी तरह व्यावहारिक मार्गदर्शिका है। यह पुस्तक दो भरोसेमंद स्रोतों से प्रेरित है—एक ओर बुद्ध का आनापान, और दूसरी ओर आचार्य 'अजान ली धम्मधरो' की ध्यान-पद्धति।


८. सल्लेख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

१०. सतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है।

१९. द्वेधावितक्क सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।

२०. वितक्कसण्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।

२२. महासतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

२८. सम्पसादनीयसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायपरिनिर्वाण लेने से पूर्व, आयुष्मान सारिपुत्त आकर भगवान से मुलाक़ात करते है, और महान शास्ता के लिए भाव-विभोर बातें कहते हैं।

४६. महाधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

५२. अट्ठकनागर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक गृहस्थ भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात अमृतद्वार ढूँढ रहा था। आनन्द भन्ते ने उसे एक नहीं, ग्यारह अमृतद्वार दिखाते हैं।

५३. सेख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजब भगवान को पीठ दर्द हुआ, तब भन्ते आनन्द ने उपदेश की जिम्मेदारी संभाली और शाक्यों को साधना मार्ग का वर्णन किया।

६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र राहुल को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

६२. महाराहुलोवाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने युवा पुत्र राहुल को विविध प्रकार की साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं।

६४. महामालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

६६. लटुकिकोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

७७. महासकुलुदायि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायविभिन्न पंथों के बीच आपसी संवाद में सभी गुरुओं और उनके शिष्यों के असली चेहरे उजागर होते हैं। भगवान बुद्ध के भी।

११७. महाचत्तारीसक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों की 'लौकिक' और 'आर्य' परिभाषाएँ देते हैं और उनके आपसी संबंध को स्पष्ट करते हैं।

११८. आनापानस्सति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।

११९. कायगतासति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान कायागत-स्मृति को अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली ढंग से, अनेक सटीक उपमाओं के सहारे प्रस्तुत करते हैं।