✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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पटिपदा

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • अकुसलप्पहान - अकुशल का त्याग

    अकुसलप्पहान - अकुशल का त्याग

    लेख

    अकुशल का त्याग करो! अकुशल का त्याग किया जा सकता है। यदि अकुशल का त्याग नहीं किया जा सकता, तो मैं तुमसे यह न कहता—अकुशल का त्याग करो!

  • कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म

    कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म

    लेख

    कुशल स्वभाव को बढ़ाओ! कुशल को बढ़ाया जा सकता है। यदि कुशल को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो मैं तुमसे न कहता...

  • ध्यान-साधना कैसे करें?

    ध्यान-साधना कैसे करें?

    लेख

    कुछ साधक शांत प्रकृति के होते हैं, जो सीधे श्वास पर ध्यान केंद्रित कर सहज रूप से समाधि प्राप्त कर लेते हैं। दूसरी ओर, कुछ साधक स्वभाव से उग्र होते हैं, उनके लिए उपयुक्त मार्ग है—दुक्खा पटिपदा।

  • सुखा पटिपदा - मूल आनापान

    सुखा पटिपदा - मूल आनापान

    लेख

    आनापान : श्वास साधना केवल श्वास को देखने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह समथ और विपस्सना का एक अद्भुत संगम है, जो चित्त को स्थूल से सूक्ष्म और अंततः परम शून्यता व मुक्ति तक ले जाता है।

  • दुक्खा पटिपदा - संज्ञा का खेल!

    दुक्खा पटिपदा - संज्ञा का खेल!

    लेख

    क्या किसी कौए को कोई मानवीय स्त्री खूबसूरत लग सकती है? या क्या किसी कुत्ते के भीतर किसी गाय को देखकर काम-वासना जाग सकती है?

  • अनत्त सञ्ञा - अनात्म संज्ञा!

    अनत्त सञ्ञा - अनात्म संज्ञा!

    लेख

    रूप आत्म नहीं होता है! यदि रूप आत्म होता, तो वह हमें पीड़ा में न डालता। और, हम उसे कह पाते कि—‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो!

  • अशुभ भावना - काया सुंदर नहीं है!

    अशुभ भावना - काया सुंदर नहीं है!

    लेख

    अशुभ भावना शरीर से नफरत करना नहीं है, बल्कि उस 'सम्मोहन' को तोड़कर यथार्थ को देखना है जो कामराग को जन्म देता है। यह सम्मोहन तोड़ने वाली अचूक औषधि है।

  • आदीनव सञ्ञा - अवगुण देखना!

    आदीनव सञ्ञा - अवगुण देखना!

    लेख

    अवगुण देखना क्या है? कोई भिक्षु जंगल में, पेड़ के तले, या ख़ालीगृह में जाता है, और चिंतन करता है—‘बड़ी पीड़ाएँ है इस शरीर की! बहुत अवगुण है! इस शरीर में विविध बीमारियां उपजती है, जैसे, आँख का रोग, कान का रोग...

  • आनापान - शीघ्र श्वास साधना - दस मिनिट

    आनापान - शीघ्र श्वास साधना - दस मिनिट

    लेख

    आनापान - चार कदमों वाली श्वास साधना

  • आनापान - श्वास साधना - चार कदम

    आनापान - श्वास साधना - चार कदम

    लेख

    आनापान - चार कदमों वाली श्वास साधना

  • आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना

    आर्य अष्टांगिक मार्ग की भावना

    लेख

    इसे 'आर्य' इसलिए कहा गया है क्योंकि जब इसके आठों अंग पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तब यह किसी भी साधारण मनुष्य को पूर्णतः बदलकर संबोधि के प्रथम सोपान—श्रोतापत्ति—पर खड़ा कर देता है और उसे 'आर्य-जन' बना देता है।

  • आहार प्रतिकूल संज्ञा - आहार के प्रति विपरीत संज्ञा!

    आहार प्रतिकूल संज्ञा - आहार के प्रति विपरीत संज्ञा!

    लेख

    भगवान कहते हैं—आहार-प्रतिकूल संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।

  • इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना

    इद्धिपाद - ऋद्धिपद की भावना

    लेख

    यह सच है कि ध्यान में कुछ लोग इन शक्तियों को प्राप्त करते हैं। उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है कि इन शक्तियों का उपयोग कैसे करें ताकि ये मार्ग में बाधा नहीं, बल्कि सहायक बनें।

  • इन्द्रिय की भावना

    इन्द्रिय की भावना

    लेख

    इन पाँच इन्द्रियों का अंतिम उद्देश्य यही 'अमृत' प्राप्त कराना है। ये पाँच इन्द्रियाँ नदी पार कराने वाली एक मज़बूत नाव की तरह हैं; ये साधना के परम उपकरण हैं, स्वयं लक्ष्य नहीं।

  • उद्धच्चकुकुच्च - बेचैनी-पश्चाताप और उसका त्याग

    उद्धच्चकुकुच्च - बेचैनी-पश्चाताप और उसका त्याग

    लेख

    बेचैनी और पश्चाताप चित्त में उठा एक ऐसा तूफान है, जो हमारी अतिरिक्त और असंतुलित ऊर्जा का परिणाम है। जैसे उच्च रक्तचाप शरीर को थका देता है, वैसे ही चंचलता और अतीत का पछतावा चित्त को रोगी बना देते हैं।

  • कामछन्द - कामेच्छा और उसका त्याग

    कामछन्द - कामेच्छा और उसका त्याग

    लेख

    जो व्यक्ति जितना कामुकता में डूबता है, उसकी संवेदनाएँ उतनी ही मरती जाती हैं। उसका चित्त सूक्ष्म से गिरकर इतना स्थूल हो जाता है कि एक समय बाद उसे साधारण जीवन नीरस और बेजान लगने लगता है। तब और मज़ा निचोड़ने के लिए वह घिनौने कर्मों और नशे की दलदल में उतर जाता है।

  • थिनमिद्ध - सुस्ती-तंद्रा और उसका त्याग

    थिनमिद्ध - सुस्ती-तंद्रा और उसका त्याग

    लेख

    सुस्ती कोई साधारण नींद नहीं है; यह यथार्थ से भागने का चित्त का एक रक्षातंत्र है। जब चित्त वर्तमान क्षण की चुनौतियों या नीरसता का सामना नहीं कर पाता, तो वह खुद को 'शट डाउन' करने लगता है। व्यक्ति को लगता है कि उसे शारीरिक विश्राम चाहिए, लेकिन असल में उसका चित्त सत्य से आँखें चुरा रहा होता है।

  • धातु मनसिकार - धातु चिंतन!

    धातु मनसिकार - धातु चिंतन!

    लेख

    जब इतनी विशाल बाहरी पृथ्वीधातु की भी अनित्यता दिख पड़ती है, विनाश-स्वभाव दिख पड़ता है, पतन-स्वभाव दिख पड़ता है, बदलाव-स्वभाव दिख पड़ता है, तो इस अल्पकालिक काया का कहना ही क्या?

  • नवसिवथिक - नौ प्रकार के श्मशान

    नवसिवथिक - नौ प्रकार के श्मशान

    लेख

    कोई भिक्षु श्मशान में पड़ी लाश देखता है—एक दिन पुरानी, दो दिन पुरानी, तीन दिन पुरानी—फूल चुकी, नीली पड़ चुकी, पीब रिसती हुई।

  • पटिकुल मनसिकार - प्रतिकूल चिंतन!

    पटिकुल मनसिकार - प्रतिकूल चिंतन!

    लेख

    अच्छा होगा, यदि साधक ‘घिनौनी परिस्थिति’ में रहकर भी, सही समय पर 'घिनरहित पक्ष' को देखते हुए विहार करें।

  • बल की भावना

    बल की भावना

    लेख

    साधना के मार्ग पर जो पाँच इन्द्रियाँ अभ्यास की भट्टी में तपकर पूरी तरह परिपक्व हो जाती हैं, तो वे ही 'बल' बन जाती हैं।

  • बोज्झङ्ग की भावना

    बोज्झङ्ग की भावना

    लेख

    बोध्यङ्ग, अर्थात 'संबोधि' के सात आवश्यक अंग। ये वे सात परम गुण हैं, जो जब एक साथ पूर्ण रूप से विकसित हो जाते हैं, तो साधक के चित्त के सभी अज्ञान रुपी जालों को काटकर उसे सीधे अंतिम विमुक्ति के द्वार पर खड़ा कर देते हैं।

  • ब्यापाद - दुर्भावना और उसका त्याग

    ब्यापाद - दुर्भावना और उसका त्याग

    लेख

    दुर्भावना, दरअसल, आत्मरक्षा की एक अंधी प्रतिक्रिया है। जब हम किसी मामूली बात को भी अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान बैठते हैं, तो यह तुच्छ-सी बात भीतर धधकती आग बन जाती है। जो ऊर्जा दूसरों को जलाने उठती है, वह सबसे पहले स्वयं को ही राख कर देती है।

  • मरणसञ्ञा - मौत का नजरिया

    मरणसञ्ञा - मौत का नजरिया

    लेख

    मौत के स्मरण की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।

  • विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग

    विचिकिच्छा - उलझन और उसका त्याग

    लेख

    उलझन या शंका बाहरी जानकारी की कमी से नहीं, बल्कि भीतर की अस्पष्टता से जन्म लेती है। जब चित्त का अपना कोई ठोस आधार नहीं होता, तो वह मानसिक गुलामी, अंधविश्वास और अनिश्चितता के रेगिस्तान में भटकने लगता है।

  • शुरुवात कैसे करें - छठा कदम - भावना

    शुरुवात कैसे करें - छठा कदम - भावना

    लेख

    भावना' का अर्थ है—अच्छे गुण बढ़ाना, जैसे मेत्ता (सद्भावना), करुणा, शांति, एकाग्रता और अंतर्ज्ञान, जो हमारे भीतर की पुरानी, अकुशल प्रवृत्तियों को कम करते-करते अंततः उन्हें समाप्त तक कर देते हैं।

  • सतिपट्ठान - स्मृतिप्रस्थान की मूल साधना

    सतिपट्ठान - स्मृतिप्रस्थान की मूल साधना

    लेख

    यहाँ हमारा उद्देश्य उन व्यावहारिक और सीधी स्मृति साधनाओं को सामने रखना है, जिन्हें कोई भी आम व्यक्ति अपने कमरे में बैठकर तुरंत शुरू कर सके।

  • सब्बलोके अनभिरति - सभी लोक के प्रति नीरस!

    सब्बलोके अनभिरति - सभी लोक के प्रति नीरस!

    लेख

    सभी लोक-विश्व के प्रति निरस नज़रिया क्या है? यदि साधक को किसी लोक (=कामलोक, ब्रह्मलोक) के प्रति आसक्ति हो, या उसके चित्त का स्थिराव, टिकाव, या झुकाव होता हो—तब उसे त्यागकर, वह अनासक्त रहता है।

  • सब्बसङ्खारेसु अनिच्चानुसञ्ञा - अनित्य नजरिया!

    सब्बसङ्खारेसु अनिच्चानुसञ्ञा - अनित्य नजरिया!

    लेख

    अनित्य संज्ञा क्या है? साधक पाँच उपादान-स्कंध को अनित्य देखते हुए विहार करता है।

  • सम्मपधान - सम्यक परिश्रम की भावना

    सम्मपधान - सम्यक परिश्रम की भावना

    लेख

    बौद्ध साधना में सम्मपधान का सिद्धांत आज ध्यान के बारे में प्रचलित कई मिथकों और धारणाओं को पूरी तरह से तोड़ देता है।

  • परिचय

    परिचय

    ग्रन्थ / पटिपदा

    मेरे सब्रह्मचारी भिक्षुओं के साथ वर्षों से धर्माभ्यास करते हुए, धर्मचर्चा करते हुए, धर्म समझकर साधना कर, धर्म-प्रतिपादन करते हुए, मुझे अक़्सर एक ऐसे पुस्तक की ज़रूरत महसूस होती थी...

  • १. संवेग

    १. संवेग

    ग्रन्थ / पटिपदा

    मैं बताता हूँ कैसे, जागा संवेग मुझे। छटपटाती दिखी जनता, गड्ढे में मछलियों जैसे...

  • २. कम्म

    २. कम्म

    ग्रन्थ / पटिपदा

    सभी सत्व अपने कर्मों के कर्ता हैं। अपने कर्मों के वारिस हैं। अपने कर्मों से योनि पाते हैं। अपने कर्मों द्वारा संबंधी हैं...

  • ३. सेक्ख पटिपदा

    ३. सेक्ख पटिपदा

    ग्रन्थ / पटिपदा

    यहाँ कभी इस दुनिया में तथागत प्रकट होते है—अरहंत, सम्यक-सम्बुद्ध, विद्या व आचरण में संपन्न...

  • ४. वीरियारम्भ

    ४. वीरियारम्भ

    ग्रन्थ / पटिपदा

    अकुशल त्याग दो, भिक्षुओं! अकुशल त्याग सकते है। यदि अकुशल न त्याग सकते, तो मैं तुम्हें न कहता...

  • ५. कामच्छन्दप्पहान

    ५. कामच्छन्दप्पहान

    ग्रन्थ / पटिपदा

    कल्पना करो कि एक गीली, रसदार लकड़ी, जल में पड़ी हो, और एक पुरुष माचिस की तीली लेकर आए (सोचते हुए) ‘मैं अग्नि जलाऊंगा। मैं गर्मी प्रकट करूँगा’...

  • ६. संवेग

    ६. संवेग

    ग्रन्थ / पटिपदा

    नफ़रत मिटाने के पाँच तरीक़े हैं, मित्रों, जिनका उपयोग कर भिक्षु उत्पन्न नफ़रत पूर्णतः मिटा देता है। कौन-से पाँच?

  • ७. अरियसच्च

    ७. अरियसच्च

    ग्रन्थ / पटिपदा

    एक समय भगवान कौशाम्बी के समीप शीशमवन में रहते थे। उन्होंने शीशम के कुछ पत्ते हाथ में लेकर भिक्षुओं से पूछा—क्या लगता है भिक्षुओं, क्या अधिक है...

  • भावना

    भावना

    ग्रन्थ / पुण्य

    जो पुण्यक्रिया के तमाम आधार आपोआप (स्वर्ग में) उत्पन्न कराते हैं, वे ‘मेत्ता चेतोविमुक्ति’ के सोलहवें हिस्से के बराबर भी नहीं हैं। मेत्ता तमाम पुण्यों से आगे बढ़कर अधिक चमकती है, उजाला करती है, चकाचौंध करती है।

  • ८. अरियसच्च वित्थार

    ८. अरियसच्च वित्थार

    ग्रन्थ / पटिपदा

    जब ‘चित्त की एकाग्रता’ सात-अंगों से परिपूर्ण हो, तब उसे ‘आर्य सम्यकसमाधि’ कहते है। वही सात-अंग उसका आधार बनते है, और वही उसकी पूर्व-आवश्यकता है...

  • ९. सब्बासवादि

    ९. सब्बासवादि

    ग्रन्थ / पटिपदा

    भिक्षुओं, जो स्वयं जानता है, देखता है—मैं कहता हूँ उसके बहाव थमते है। जो स्वयं नहीं जानता, नहीं देखता, उसके बहाव नहीं थमते। क्या स्वयं जानता है, देखता है?

  • १०. सतिपट्ठान

    १०. सतिपट्ठान

    ग्रन्थ / पटिपदा

    यह चार स्मृतिप्रस्थान एकतरफ़ा मार्ग है, भिक्षुओं—सत्वों की विशुद्धि के लिए, शोक विलाप लाँघने के लिए, दर्द व्यथा विलुप्त करने के लिए, सही तरीक़ा पाने के लिए, निर्वाण साक्षात्कार के लिए...

  • ११. ब्रह्मविहारादि

    ११. ब्रह्मविहारादि

    ग्रन्थ / पटिपदा

    ध्येयकुशल सन्तपद-अभिलाषी को यह करना चाहिए—सक्षम, सीधा और स्पष्टवादी हो...

  • १२. दुक्खा पटिपदा

    १२. दुक्खा पटिपदा

    ग्रन्थ / पटिपदा

    चार प्रगतिपथ होते है, भिक्षुओं—कष्टपूर्ण प्रगतिपथ मंद विशिष्ट-ज्ञान, कष्टपूर्ण प्रगतिपथ शीघ्र विशिष्ट-ज्ञान, सुखपूर्ण प्रगतिपथ मंद विशिष्ट-ज्ञान, तथा सुखपूर्ण प्रगतिपथ शीघ्र विशिष्ट-ज्ञान...

  • १३. अतिरित्त भावना

    १३. अतिरित्त भावना

    ग्रन्थ / पटिपदा

    अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनौनी स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनरहित पक्ष देखते हुए रहे। अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनरहित स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनौना पक्ष देखते हुए रहे...

  • १४. समाधिकुसल

    १४. समाधिकुसल

    ग्रन्थ / पटिपदा

    भिक्षुओं, जिस भिक्षु में छह गुण होते है, वह पर्वतराज हिमालय को चकनाचूर कर सकता है। अविद्या का कहना ही क्या! कौन-से छह?

  • १५. संवेग ओवाद

    १५. संवेग ओवाद

    ग्रन्थ / पटिपदा

    भिक्षुओं, दस धर्म होते है, जिनके प्रति प्रवज्यितों को हमेशा चिंतनशील रहना चाहिए। कौन से दस?

  • पटिपदा

    पटिपदा

    ग्रन्थ

    यह पुस्तक हर साधक के लिए एक अनिवार्य मार्गदर्शिका है, जो विमुक्ति की ओर ले जाने वाले साधना-संबंधित सूत्रों को उजागर करती है। यह आपके आध्यात्मिक पथ की मौन सहचर बनेगी—मार्गदर्शन देगी, प्रेरित करेगी और आवश्यक होने पर फटकारेगी भी।

  • प्रत्येक श्वास के साथ

    प्रत्येक श्वास के साथ

    ग्रन्थ

    थानिस्सरो भिक्षु की यह प्रसिद्ध कृति ध्यान-साधना पर आधारित एक सरल, स्पष्ट और पूरी तरह व्यावहारिक मार्गदर्शिका है। यह पुस्तक दो भरोसेमंद स्रोतों से प्रेरित है—एक ओर बुद्ध का आनापान, और दूसरी ओर आचार्य 'अजान ली धम्मधरो' की ध्यान-पद्धति।

  • २. सब्बासव सुत्त

    २. सब्बासव सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सभी आस्रवों को खत्म करने के कुल सात उपाय!

  • ८. सल्लेख सुत्त

    ८. सल्लेख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

  • १०. सतिपट्ठान सुत्त

    १०. सतिपट्ठान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है।

  • १९. द्वेधावितक्‍क सुत्त

    १९. द्वेधावितक्‍क सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    अपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।

  • २०. वितक्‍कसण्ठान सुत्त

    २०. वितक्‍कसण्ठान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    अपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।

  • २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    २२. महासतिपट्ठान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

  • २८. सम्पसादनीयसुत्त

    २८. सम्पसादनीयसुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    परिनिर्वाण लेने से पूर्व, आयुष्मान सारिपुत्त आकर भगवान से मुलाक़ात करते है, और महान शास्ता के लिए भाव-विभोर बातें कहते हैं।

  • ४६. महाधम्मसमादान सुत्त

    ४६. महाधम्मसमादान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

  • ५२. अट्ठकनागर सुत्त

    ५२. अट्ठकनागर सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक गृहस्थ भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात अमृतद्वार ढूँढ रहा था। आनन्द भन्ते ने उसे एक नहीं, ग्यारह अमृतद्वार दिखाते हैं।

  • ५३. सेख सुत्त

    ५३. सेख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    जब भगवान को पीठ दर्द हुआ, तब भन्ते आनन्द ने उपदेश की जिम्मेदारी संभाली और शाक्यों को साधना मार्ग का वर्णन किया।

  • ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त

    ६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र राहुल को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

  • ६२. महाराहुलोवाद सुत्त

    ६२. महाराहुलोवाद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान अपने युवा पुत्र राहुल को विविध प्रकार की साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं।

  • ६४. महामालुक्य सुत्त

    ६४. महामालुक्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

  • ६६. लटुकिकोपम सुत्त

    ६६. लटुकिकोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

  • ७७. महासकुलुदायि सुत्त

    ७७. महासकुलुदायि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    विभिन्न पंथों के बीच आपसी संवाद में सभी गुरुओं और उनके शिष्यों के असली चेहरे उजागर होते हैं। भगवान बुद्ध के भी।

  • ११८. आनापानस्सति सुत्त

    ११८. आनापानस्सति सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।

  • ११९. कायगतासति सुत्त

    ११९. कायगतासति सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान कायागत-स्मृति को अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली ढंग से, अनेक सटीक उपमाओं के सहारे प्रस्तुत करते हैं।

  • १२०. सङ्खारुपपत्ति सुत्त

    १२०. सङ्खारुपपत्ति सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान यहाँ भिक्षुओं को पुनर्जन्म चुनने की आजादी देते प्रतीत होते हैं—‘जिसे जहाँ जाना हो, यह उसका रास्ता है! जाओ!’

  • १२१. चूळसुञ्ञत सुत्त

    १२१. चूळसुञ्ञत सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान यहाँ आयुष्मान आनन्द को शून्यता की सुखद ध्यान-अवस्था में प्रवेश करने का एक अत्यंत सरल मार्ग बताते हैं।

  • १२२. महासुञ्ञत सुत्त

    १२२. महासुञ्ञत सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान आनंद भन्ते को भीड़भाड़ से दूर, एकांत और ‘शून्यता’ में विहार करने का अत्यंत गहरा उपदेश देते हैं।

  • १५०. नगरविन्देय्य सुत्त

    १५०. नगरविन्देय्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान गृहस्थों को यह पहचानने का सटीक तरीका बताते हैं कि किन संन्यासियों और ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए और किनका नहीं।