✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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प्रश्नोत्तर

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • १३. अतिरित्त भावना

    १३. अतिरित्त भावना

    ग्रन्थ / पटिपदा

    अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनौनी स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनरहित पक्ष देखते हुए रहे। अच्छा होगा यदि भिक्षु ‘घिनरहित स्थिति’ में रहते हुए, सही समय पर घिनौना पक्ष देखते हुए रहे...

  • २. सामञ्ञफलसुत्तं

    २. सामञ्ञफलसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

  • ४. भयभेरव सुत्त

    ४. भयभेरव सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    बोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?

  • ४. सोणदण्डसुत्तं

    ४. सोणदण्डसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

  • ५. कूटदन्तसुत्तं

    ५. कूटदन्तसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    महायज्ञ की अभिलाषा लिए सैकड़ों ब्राह्मणों संग आए कूटदंत को भगवान सबसे प्राचीन और सबसे फलदायी यज्ञ-पद्धति उजागर कर बताते हैं—एक ऐसा यज्ञ, जिसमें हिंसा त्यागकर जरूरतमंदों की सहायता की जाए।

  • ६. महालिसुत्तं

    ६. महालिसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    इसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।

  • ७. जालियसुत्तं

    ७. जालियसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।

  • ८. महासीहनादसुत्तं

    ८. महासीहनादसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही राग है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

  • ९. पोट्ठपादसुत्तं

    ९. पोट्ठपादसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    एक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

  • १०. सुभसुत्तं

    १०. सुभसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    भगवान के परिनिर्वाण के पश्चात, आनन्द भन्ते को भगवान की शिक्षाओं को स्पष्ट करने के लिए बुलाया गया।

  • ११. केवट्टसुत्तं

    ११. केवट्टसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या भिक्षुओं के द्वारा चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ? भगवान का इस पर अविस्मरणीय उत्तर।

  • १२. लोहिच्चसुत्तं

    १२. लोहिच्चसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    क्या किसी की अध्यात्मिक सहायता नहीं करनी चाहिए? एक ब्राह्मण की दृष्टि का भगवान निवारण करते हैं।

  • १३. तेविज्जसुत्तं

    १३. तेविज्जसुत्तं

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    कुछ सच्चे त्रिवेदी ब्राह्मण युवक ब्रह्मा के साथ समागम करने के मार्ग पर उलझन में हैं। किन्तु वे भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान पास ही रहते हैं।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • २१. सक्कपञ्ह सुत्त

    २१. सक्कपञ्ह सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    देवताओं का राजा होने के कारण, इन्द्र सक्क, सद्धर्म सुनने से वंचित रहता था। जब भी वह ऋषियों ने धर्म पुछने जाता, ऋषि ही उनसे पुछने लगते। अंततः उसने भगवान से भेंट की और धर्म के उत्तर सुनकर श्रोतापन्न बना।

  • २२. अलगद्दूपम सुत

    २२. अलगद्दूपम सुत

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

  • २४. रथविनीत सुत्त

    २४. रथविनीत सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    दो प्रतिभाशाली अरहंत भिक्षु, आपस में धम्मचर्चा करते हुए, विशुद्धिमार्ग के चरणों को उजागर करते हैं।

  • ३०. चूळसारोपम सुत्त

    ३०. चूळसारोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यह पिछले सूत्र की तरह ही ब्रह्मचर्य का सार बताता है, लेकिन अंतिम भाग में मिलावट नजर आती है।

  • ३१. चूळगोसिङ्ग सुत्त

    ३१. चूळगोसिङ्ग सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    कलह के समय, भगवान उन तीन भिक्षुओं से मिलते हैं जो स्नेहपूर्वक वन में साधनारत हैं।

  • ४३. महावेदल्ल सुत्त

    ४३. महावेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

  • ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    ४४. चूळवेदल्ल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ उपासक के गहरे सवालों का उत्तर एक प्रसिद्ध भिक्षुणी देती हैं। और क्या ही लाजवाब उत्तर देती हैं!

  • ५५. जीवक सुत्त

    ५५. जीवक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    क्या बुद्ध अपने लिए मारे गए प्राणी का मांस खाते हैं? भगवान का स्पष्ट उत्तर!

  • ५७. कुक्कुरवतिक सुत्त

    ५७. कुक्कुरवतिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    प्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।

  • ६४. महामालुक्य सुत्त

    ६४. महामालुक्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

  • ६८. नळकपान सुत्त

    ६८. नळकपान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।

  • ७१. तेविज्जवच्छ सुत्त

    ७१. तेविज्जवच्छ सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस छोटे सूत्र में एक संन्यासी भगवान से उनके “सर्वज्ञ और सर्वदर्शी” होने के दावे के बारे में पूछता है।

  • ७२. अग्गिवच्छ सुत्त

    ७२. अग्गिवच्छ सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    वह संन्यासी अब भगवान से दुनिया की दस प्रमुख दार्शनिक मान्यताओं के बारे में प्रश्न करता है।

  • ७३. महावच्छ सुत्त

    ७३. महावच्छ सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    वह संन्यासी अब अपनी शंका का अंतिम समाधान पूछता है और भिक्षुत्व स्वीकार करता है।

  • ७४. दीघनख सुत्त

    ७४. दीघनख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके परिव्राजक भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।

  • ७५. मागण्डिय सुत्त

    ७५. मागण्डिय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान को ‘भ्रूण हत्यारा’ कहने वाला परिव्राजक, भगवान से मिलकर भिक्षुत्व स्वीकार कर अरहंत बनता है।

  • ७६. सन्दक सुत्त

    ७६. सन्दक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    आनन्द भन्ते परिव्राजक गुरु से चर्चा करते हैं, तो वह अपने सभी शिष्यों को भिक्षु बनने भेज देते हैं।

  • ७९. चूळसकुलुदायि सुत्त

    ७९. चूळसकुलुदायि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस रोचक और मजेदार चर्चा से परिव्राजकों का गुरु भिक्षु बनने का मन बनाता है, लेकिन उसके शिष्य उसे रोक देते हैं।

  • ८०. वेखनस सुत्त

    ८०. वेखनस सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    पिछले सूत्र के परिव्राजक सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।

  • ८५. बोधिराजकुमार सुत्त

    ८५. बोधिराजकुमार सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    राजकुमार मानता है कि परमसुख कठिन तप से मिलता है, सुखद मार्ग से नहीं! इसी पर भगवान का उत्तर।

  • ८८. बाहितिक सुत्त

    ८८. बाहितिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    राजा प्रसेनजित आयुष्मान आनंद से भगवान के कर्मों पर प्रश्न पूछता है, और प्रसन्न होकर अपना विदेशी वस्त्र दान करता है।

  • ९०. कण्णकत्थल सुत्त

    ९०. कण्णकत्थल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    राजा प्रसेनजित, भगवान की ‘सर्वज्ञ-सर्वदर्शी’ बात की अफवाह सुनकर, सत्य जानने के लिए स्वयं भगवान के पास पहुँचता है।

  • ९४. घोटमुख सुत्त

    ९४. घोटमुख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    टहलते हुए आया एक अनजान ब्राह्मण भिक्षु से कह उठता है, “प्रव्रज्या अधार्मिक है!” तब भन्ते उसे धम्म बताते हैं।

  • १००. सङ्गारव सुत्त

    १००. सङ्गारव सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक ब्राह्मण स्त्री के भगवान को याद करते ही चिढ़ा युवा ब्राह्मण, भगवान से मिलकर स्वयं उपासक बन जाता है।