✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
श्रेणी दर्शन

बुद्ध की आज्ञा

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • ३. धम्मदायाद सुत्त

    ३. धम्मदायाद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान बुद्ध के सच्चे वारिस कौन हैं? भगवान के द्वारा बताने पर सारिपुत्त भन्ते भी उसे और उजागर करते हैं।

  • १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    १६. महापरिनिब्बान सुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    यह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

  • १७. वनपत्थ सुत्त

    १७. वनपत्थ सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—भिक्षुओं को कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।

  • २१. ककचूपम सुत्त

    २१. ककचूपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    आलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।

  • २२. अलगद्दूपम सुत

    २२. अलगद्दूपम सुत

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

  • २९. पासादिकसुत्त

    २९. पासादिकसुत्त

    सुत्तपिटक / दीघनिकाय

    महावीर जैन के निधन होने पर उनके संघ में ‘कत्लेआम’ मचा। उसे सुनकर, बुद्ध अपने संघ में स्थिरता और प्रौढ़ता का भाव व्यक्त करते है। और, भिक्षुओं को संगीति के लिए प्रेरित भी करते है।

  • ४७. वीमंसक सुत्त

    ४७. वीमंसक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    साधक को गुरु की कड़ी छानबीन करनी चाहिए और श्रद्धा रखने से पहले आँख और कान खुले रखने चाहिए। भगवान बताते हैं कि यह कैसे करना है।

  • ४८. कोसम्बिय सुत्त

    ४८. कोसम्बिय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    कौशाम्बी के झगड़ालू भिक्षुओं को भगवान स्नेहभाव और एकता का महत्व समझाते हैं।

  • ६५. भद्दालि सुत्त

    ६५. भद्दालि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान भिक्षुओं को एक नया शिक्षापद पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक भिक्षु साफ मना कर देता है।

  • ७०. कीटागिरि सुत्त

    ७०. कीटागिरि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।

  • १०३. किन्ति सुत्त

    १०३. किन्ति सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    इस सूत्र में भगवान भिक्षुओं को आपसी असहमति या टकराव होने पर उससे निपटने के सही तरीक़े बताते हैं।

  • १०४. सामगाम सुत्त

    १०४. सामगाम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    निगण्ठ नाटपुत्त (महावीर जैन) के निधन पर जैन समुदाय में भारी कलह हुआ। इसी पर भगवान ने आनन्द को संघ में विवाद निपटाने के तरीके बताए।