बुद्ध के द्वारा
— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

१. मूलपरियाय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!


२. सामञ्ञफलसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइस सूत्र में भगवान उजागर करते हैं कि धर्म वास्तव में क्या है। पुर्णिमा की रोमहर्षक रात में राजा अजातशत्रु भगवान के पास पहुँचकर मन की शान्ति पाता है।

३. अम्बट्ठसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइस तीखी बहस में भगवान घमंडी ब्राह्मण युवक की जाति पुछकर उसकी स्वघोषित श्रेष्ठता को सीधी चुनौती देते है, और अहंकार चूर कर देते है।

३. धम्मदायाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान बुद्ध के सच्चे वारिस कौन हैं? भगवान के द्वारा बताने पर सारिपुत्त भन्ते भी उसे और उजागर करते हैं।

४. भयभेरव सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायबोधिसत्व ने जंगल में अकेले रहकर डर और आतंक का सामना करते हुए संबोधि कैसे पायी?

४. सोणदण्डसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या जाति से कोई ब्राह्मण होता है या कर्म से? भरी ब्राह्मणी सभा में हुई इस ज्वलंत संवाद में भगवान ब्राह्मणों को ‘ब्राह्मणत्व’ की परिभाषा समझाकर हलचल मचा देते है।

५. कूटदन्तसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायमहायज्ञ की अभिलाषा लिए सैकड़ों ब्राह्मणों संग आए कूटदंत को भगवान सबसे प्राचीन और सबसे फलदायी यज्ञ-पद्धति उजागर कर बताते हैं—एक ऐसा यज्ञ, जिसमें हिंसा त्यागकर जरूरतमंदों की सहायता की जाए।

६. आकङ्खेय्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभिक्षु की आकांक्षा लौकिक हो या अलौकिक, भगवान उन्हें पूरा करने का मार्ग बताते हैं।

६. महालिसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायइसमें भगवान विभिन्न उपासकों को दिव्य-रूप देखने और दिव्य-आवाज सुनने के बारे में बताते हैं। किन्तु उसके परे की उत्कृष्ठ चीजों को साक्षात्कार करने का मार्ग भी बताते हैं।

७. जालियसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या जीव और शरीर एक ही है, अथवा भिन्न-भिन्न हैं? परिव्राजक के द्वारा पूछे जाने पर भगवान अनुपूर्वीशिक्षा के माध्यम से उस प्रश्न की निरर्थकता सिद्ध करते हैं।

७. वत्थ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमैले चित्त को धोना किसी मैले वस्त्र को धोने के समान ही है। बस जान लें कि 'मैल' क्या हैं।

८. महासीहनादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक नंगे साधु को काया का कठोर तप करने में ही राग है। किन्तु भगवान उसे बताते हैं कि तब भी उसका मन दूषित रह सकता है।

८. सल्लेख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

९. पोट्ठपादसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक घुमक्कड़ संन्यासी को भगवान संज्ञाओं की गहन अवस्थाओं के बारे में बताते हैं कि किस तरह वे गहरी ध्यान-अवस्थाओं से उत्पन्न होते हैं।

१०. सतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है।

११. केवट्टसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या भिक्षुओं के द्वारा चमत्कार दिखाना उचित है, ताकि लोगों में श्रद्धा बढ़ जाएँ? भगवान का इस पर अविस्मरणीय उत्तर।

११. चूळसीहनाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान प्रेरित करते हैं कि उनके शिष्य जाकर दूसरे संन्यासियों के सामने दहाड़े।

१२. महासीहनाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक पूर्व शिष्य के द्वारा निंदा होने पर, भगवान ऐसा उत्तर देते हैं कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए।

१२. लोहिच्चसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायक्या किसी की अध्यात्मिक सहायता नहीं करनी चाहिए? एक ब्राह्मण की दृष्टि का भगवान निवारण करते हैं।

१३. तेविज्जसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायकुछ सच्चे त्रिवेदी ब्राह्मण युवक ब्रह्मा के साथ समागम करने के मार्ग पर उलझन में हैं। किन्तु वे भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान पास ही रहते हैं।

१३. महादुक्खक्खन्ध सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपरधम्मी परिव्राजकों को लगता हैं कि उनका और बुद्ध का धम्म एक जैसा ही है। तब, भगवान ऐसा धम्म बताते हैं, जो उनके लिए ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो।

१४. चूळदुक्खक्खन्ध सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने चचेरे भाई महानाम को कामुकता के बारे में बताते हैं। साथ ही, जैन साधकों से हुए वार्तालाप का उल्लेख भी करते हैं।

१४. महापदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुर्लभ ही होता है कि जब भगवान भिक्षुसंघ को बैठकर कोई कथा सुनाए। यह कथा पिछले सात सम्यक-सम्बुद्धों की महाकथा हैं। किन्तु, प्रश्न उठता है कि भगवान को यह महाकथा भला कैसे पता है?

१५. महानिदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायआयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होंने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।

१६. चेतोखिल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान चित्त की बंजरता और उसके जंजीरों के बारे में अवगत कराते हैं।

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

१७. महासुदस्सन सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

१७. वनपत्थ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—भिक्षुओं को कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।

१८. जनवसभ सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

१८. मधुपिण्डिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान के मुख से निकला 'प्रपंच' पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

१९. द्वेधावितक्क सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।

२०. महासमय सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध का दर्शन लेने के लिए दूसरी दुनियाओं के अनेक देवतागण एकत्र हुए। तब, भगवान ने उनका वर्णन कर, भिक्षुओं का उनसे परिचय कराया।

२०. वितक्कसण्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।

२१. ककचूपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायआलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।

२१. सक्कपञ्ह सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदेवताओं का राजा होने के कारण, इन्द्र सक्क, सद्धर्म सुनने से वंचित रहता था। जब भी वह ऋषियों ने धर्म पुछने जाता, ऋषि ही उनसे पुछने लगते। अंततः उसने भगवान से भेंट की और धर्म के उत्तर सुनकर श्रोतापन्न बना।

२२. अलगद्दूपम सुत
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

२२. महासतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

२३. वम्मिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक देवता आकर भिक्षु को रहस्यमयी पहेलियाँ देता है, जिसका समाधान भगवान करते हैं।

२४. पाथिक सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुनक्खत भिक्षु को तमाशेबाज निर्वस्त्र तपस्वियों से आकर्षण है। किन्तु, तप का ऐसा तमाशा न भगवान करते हैं, न ही उनका भिक्षुसंघ। उसके भिक्षुत्व छोड़ने की बात पर, भगवान उसकी अक्ल ठिकाने लगाने की नाकाम कोशिश करते हैं।

२५. उदुम्बरिक सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह सूत्र विभिन्न धर्मों के बीच होने वाले संवाद का एक बेहतरीन उदाहरण है। बुद्ध का आशय किसी को ‘बौद्ध’ बनाना नहीं, बल्कि उन्हें दुःखों से मुक्त करना है।

२५. निवाप सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमार के चारे से कौन-से साधक बच सकते हैं? हिरणों की उपमा से भगवान समझाते हैं।

२६. चक्कवत्ति सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुनिया का पतन भी अनेक चरणों में होता है, और दुनिया का उद्धार भी। पतन और उद्धार के इस प्रक्रिया के बीच बुद्ध अवतरित होते हैं। आगे, मेत्तेय बुद्ध भी आएंगे।

२६. पासरासि/अरियपरियेसना सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।

२७. अग्गञ्ञ सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुनिया की शुरुवात कैसे हुई? अनेक पौराणिक कथाओं के बीच, बुद्ध एक भिन्न विवरण देते हैं, जिसमें मानव-कर्म और नैतिकता दुनिया के संतुलन से जुड़ा है।

२७. चूळहत्थिपदोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायक्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

२९. पासादिकसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायमहावीर जैन के निधन होने पर उनके संघ में ‘कत्लेआम’ मचा। उसे सुनकर, बुद्ध अपने संघ में स्थिरता और प्रौढ़ता का भाव व्यक्त करते है। और, भिक्षुओं को संगीति के लिए प्रेरित भी करते है।

२९. महासारोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान ब्रह्मचर्य का सार बताते हैं, साथ ही उसके बाहरी छिलकों को भी उजागर करते हैं।

३०. चूळसारोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययह पिछले सूत्र की तरह ही ब्रह्मचर्य का सार बताता है, लेकिन अंतिम भाग में मिलावट नजर आती है।

३०. लक्खणसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायपहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।

३१. सिङ्गालसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायएक युवा पुरुष अपने मृत पिता के आदेशानुसार व्यर्थ कर्मकांड करता है। किन्तु, बुद्ध उसे उसका गहरा महत्व समझाते हुए गृहस्थों के व्रत और जिम्मेदारियों पर प्रकाश डालते है।

३२. महागोसिङ्ग सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय‘किस तरह का भिक्षु शानदार गोसिङ्ग वन की शोभा होगा?’ प्रसिद्ध भिक्षुओं का अलग-अलग उत्तर।

३३. महागोपालक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक चरवाहे के गुणों की उपमा देकर भिक्षुओं को सारगर्भित धम्म बताते हैं।

३४. चूळगोपालक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक यादगार उपमा के साथ हमें पार आने के लिए पुकारते हैं।

३५. चूळसच्चक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक प्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज सच्चक, भगवान से सरेआम वाद-विवाद में भिड़ता है।

३६. महासच्चक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायप्रसिद्ध अहंकारी बहसबाज सच्चक, इस बार अकेले में भगवान से वाद-विवाद करता है।

३७. चूळतण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान से धम्म सुनने पर भी देवराज इन्द्र मदहोश रहता है। तब महामोग्गल्लान भन्ते उसके रोंगटे खड़े कर उसे होश दिलाते हैं।

३८. महातण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

३९. महाअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।

४०. चूळअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायश्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।

४१. सालेय्यक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

४२. वेरञ्जक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

४५. चूळधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।

४६. महाधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

४७. वीमंसक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसाधक को गुरु की कड़ी छानबीन करनी चाहिए और श्रद्धा रखने से पहले आँख और कान खुले रखने चाहिए। भगवान बताते हैं कि यह कैसे करना है।

४८. कोसम्बिय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायकौशाम्बी के झगड़ालू भिक्षुओं को भगवान स्नेहभाव और एकता का महत्व समझाते हैं।

४९. ब्रह्मनिमन्तनिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक हैरतअंगेज सूत्र, जिसमें भगवान जाकर ब्रह्मा की दृष्टि सुधारने का प्रयास करते हैं।

५१. कन्दरक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय'पशुओं का स्वभाव सीधा होता है, जबकि मानव स्वभाव का कोई भरोसा नहीं!' इस बात पर भगवान चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं।

५४. पोतलिय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक गृहस्थ जब स्वयं को दुनियादारी से अलग समझता है, तब भगवान उसे सच्चे अर्थ में दुनियादारी से कटने का मार्ग बताते हैं।

५५. जीवक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायक्या बुद्ध अपने लिए मारे गए प्राणी का मांस खाते हैं? भगवान का स्पष्ट उत्तर!

५६. उपालि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक निगण्ठ उपासक वादविवाद के लिए भगवान के पास जाता है, और भगवान के जादू से दीवाना होकर लौटता है।

५७. कुक्कुरवतिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायप्राचीन भारत के अनोखे संन्यासी, जो कुत्ते और गाय का व्रत रखते हैं, भगवान से उसका फल पूछते हैं।

५८. अभयराजकुमार सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअभय राजकुमार को भगवान को दुविधा में डालकर उनका खण्डन करने भेजा जाता है।

५९. बहुवेदनीय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

६०. अपण्णक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययदि आपको किसी पर श्रद्धा न हो तो तर्क का आधार लेकर सुरक्षित दाँव लगाना चाहिए।

६१. अम्बलट्ठिकराहुलोवाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान उपमाओं के माध्यम से अपने बालक पुत्र राहुल को कर्म सुधारने का पहला पाठ पढ़ाते हैं।

६२. महाराहुलोवाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने युवा पुत्र राहुल को विविध प्रकार की साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं।

६३. चूळमालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु जाकर भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।

६४. महामालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

६५. भद्दालि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान भिक्षुओं को एक नया शिक्षापद पालन करने के लिए प्रेरित करते हैं, लेकिन एक भिक्षु साफ मना कर देता है।

६६. लटुकिकोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

६७. चातुम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायविहार में शोर मचाने वाले भिक्षुओं को भगवान निष्कासित कर देते हैं, लेकिन उन्हें वापस स्वीकारने पर वे चार संभावित खतरों से सावधान करते हैं।

६८. नळकपान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।

७०. कीटागिरि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।

७१. तेविज्जवच्छ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस छोटे सूत्र में एक संन्यासी भगवान से उनके “सर्वज्ञ और सर्वदर्शी” होने के दावे के बारे में पूछता है।

७२. अग्गिवच्छ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायवह संन्यासी अब भगवान से दुनिया की दस प्रमुख दार्शनिक मान्यताओं के बारे में प्रश्न करता है।

७३. महावच्छ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायवह संन्यासी अब अपनी शंका का अंतिम समाधान पूछता है और भिक्षुत्व स्वीकार करता है।

७४. दीघनख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस प्रसिद्ध सूत्र में सारिपुत्त भन्ते को अरहंत फल प्राप्त हुआ, जबकि उनके परिव्राजक भांजे में धम्मचक्षु उत्पन्न हुआ।

७५. मागण्डिय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान को ‘भ्रूण हत्यारा’ कहने वाला परिव्राजक, भगवान से मिलकर भिक्षुत्व स्वीकार कर अरहंत बनता है।

७७. महासकुलुदायि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायविभिन्न पंथों के बीच आपसी संवाद में सभी गुरुओं और उनके शिष्यों के असली चेहरे उजागर होते हैं। भगवान बुद्ध के भी।

७८. समणमुण्डिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक परिव्राजक भगवान के उपासक को “अजेय श्रमण” के चार गुण बताता है, पर भगवान उसका खंडन कर दस गुण बताते हैं।

७९. चूळसकुलुदायि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस रोचक और मजेदार चर्चा से परिव्राजकों का गुरु भिक्षु बनने का मन बनाता है, लेकिन उसके शिष्य उसे रोक देते हैं।

८०. वेखनस सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपिछले सूत्र के परिव्राजक सकुलुदायी के आचार्य इस बार अपनी बात की रक्षा करने आते हैं, लेकिन भगवान का शिष्य बन जाते हैं।

८१. घटिकार सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने पुराने मित्र घटिकार कुम्हार की प्रेरणादायी और भावनात्मक जातक कथा सुनाते हैं।

८३. मघदेव सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान की जातक कथा, जिसमें वे ऐसी कल्याणकारी प्रथा स्थापित करते हैं, जो इसके अनुसरणकर्ताओं को ब्रह्मलोक में सद्गति प्रदान करती है।

८५. बोधिराजकुमार सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायराजकुमार मानता है कि परमसुख कठिन तप से मिलता है, सुखद मार्ग से नहीं! इसी पर भगवान का उत्तर।

८७. पियजातिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायप्रियजनों से आखिर क्या मिलता है? भगवान के शब्द सहज बुद्धि के विपरीत जाते हैं, और समाज में हंगामा मचाते हैं।

९०. कण्णकत्थल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायराजा प्रसेनजित, भगवान की ‘सर्वज्ञ-सर्वदर्शी’ बात की अफवाह सुनकर, सत्य जानने के लिए स्वयं भगवान के पास पहुँचता है।

९१. ब्रह्मायु सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय१२० वर्ष का वृद्ध ब्राह्मण अपने शिष्य को भगवान के लक्षण देखने भेजता है, और गहन रिपोर्ट पाकर परम-समर्पण करता है।

९२. सेल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक जटाधारी, जो ब्राह्मण गुरु के प्रति समर्पित है, उसके यहाँ भोजन निमंत्रण पर भगवान उसी गुरु और उसके शिष्यों को भिक्षु बनाकर वहाँ जाते हैं।

९३. अस्सलायन सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायब्राह्मणों के प्रोत्साहन पर एक प्रतिभाशाली युवा ब्राह्मण जातिवाद पर भगवान से उलझने की भूल करता है।

९५. चङ्की सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजम्बुद्वीप के प्रमुख ब्राह्मणों में गिने जाने वाले चङ्की के समक्ष भगवान ब्राह्मणों के सभी दावों को एक-एक कर ध्वस्त करते हैं।

९६. एसुकारी सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक ब्राह्मण भगवान से ब्राह्मण-व्यवस्था पर राय माँगता है, और भगवान खुलकर जवाब देते हैं।

९८. वासेट्ठ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायब्राह्मण जन्म से होता है या कर्म से?—इस प्रश्न पर उलझे दो युवा ब्राह्मण अपना मतभेद सुलझाने के लिए भगवान के पास पहुँचते हैं।

९९. सुभ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक विख्यात ब्राह्मण-पुत्र भगवान से मिलने आता है, और गाली-गलौच तक करने के बाद अंततः शरण ग्रहण करता है।

१००. सङ्गारव सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक ब्राह्मण स्त्री के भगवान को याद करते ही चिढ़ा युवा ब्राह्मण, भगवान से मिलकर स्वयं उपासक बन जाता है।

१०१. देवदह सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान बुद्ध उन निगण्ठ (जैन) सिद्धांतों का खण्डन करते हैं, जिन्हें दुर्भाग्य से आज कई लोग बौद्ध मत समझ बैठे हैं।

१०२. पञ्चत्तय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

१०३. किन्ति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान भिक्षुओं को आपसी असहमति या टकराव होने पर उससे निपटने के सही तरीक़े बताते हैं।

१०४. सामगाम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायनिगण्ठ नाटपुत्त (महावीर जैन) के निधन पर जैन समुदाय में भारी कलह हुआ। इसी पर भगवान ने आनन्द को संघ में विवाद निपटाने के तरीके बताए।

१०५. सुनक्खत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।