भिक्षु के लिए
— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

१. ब्रह्मजालसुत्तं
सुत्तपिटक / दीघनिकायसुत्तपिटक का पहला सूत्र स्पष्ट करता है कि क्या धर्म ‘नहीं’ है। भगवान इसमें दुनिया के विविध धार्मिक-अधार्मिक ६२ मान्यताओं के मायाजाल को तोड़ते हैं।

१. मूलपरियाय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस निकाय के पहले ही धमाकेदार सूत्र को सुनकर कोई खुश नहीं हुआ! “क्या ब्रह्मांड का कोई मूल या जड़ है?” भगवान का उत्तर!


५. अनङ्गण सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते यादगार उपमाओं के साथ चित्त के दाग-धब्बों का रहस्य खोलते हैं।

६. आकङ्खेय्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभिक्षु की आकांक्षा लौकिक हो या अलौकिक, भगवान उन्हें पूरा करने का मार्ग बताते हैं।

७. वत्थ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमैले चित्त को धोना किसी मैले वस्त्र को धोने के समान ही है। बस जान लें कि 'मैल' क्या हैं।

८. सल्लेख सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

९. सम्मादिट्ठि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते सम्यक-दृष्टि को अनोखे अंदाज में, गहरे प्रतीत्य समुत्पाद के आधार पर परिभाषित करते हैं।

१०. सतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस लोकप्रिय सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है।

११. चूळसीहनाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान प्रेरित करते हैं कि उनके शिष्य जाकर दूसरे संन्यासियों के सामने दहाड़े।

१२. महासीहनाद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक पूर्व शिष्य के द्वारा निंदा होने पर, भगवान ऐसा उत्तर देते हैं कि सुनने वाले के रोंगटे खड़े हो जाए।

१३. महादुक्खक्खन्ध सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपरधम्मी परिव्राजकों को लगता हैं कि उनका और बुद्ध का धम्म एक जैसा ही है। तब, भगवान ऐसा धम्म बताते हैं, जो उनके लिए ‘आउट ऑफ सिलेबस’ हो।

१४. महापदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुर्लभ ही होता है कि जब भगवान भिक्षुसंघ को बैठकर कोई कथा सुनाए। यह कथा पिछले सात सम्यक-सम्बुद्धों की महाकथा हैं। किन्तु, प्रश्न उठता है कि भगवान को यह महाकथा भला कैसे पता है?

१५. अनुमान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमहामोग्गल्लान भन्ते अपने भिक्षु साथियों को दुर्वचो और सुवचो पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं।

१५. महानिदान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायआयुष्मान आनन्द को लगता है कि उन्होंने प्रतीत्य समुत्पाद को गहराई से जान लिया। भगवान उन्हें चेताते हैं कि इतना आत्मविश्वास मत पालो। और, तब दुःख के विविध कारण और निर्भर घटकों का गहराई से वर्णन करते है।

१६. चेतोखिल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान चित्त की बंजरता और उसके जंजीरों के बारे में अवगत कराते हैं।

१६. महापरिनिब्बान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह पालि साहित्य का सबसे लंबा सूत्र है, जो बुद्ध की परिनिर्वाण कथा को विवरण के साथ बताता है। भगवान बुद्ध के अंतिम दिनों के बारे में यहाँ लंबा ब्योरा मिलता है, जिससे बुद्ध के व्यक्तित्व की गहराई झलकती है।

१७. महासुदस्सन सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

१७. वनपत्थ सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—भिक्षुओं को कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।

१८. जनवसभ सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध के एक पूर्वजन्म की प्रेरणादायी और रोमांचकारी कथा, जिसमें वे एक महान चक्रवर्ती सम्राट बने। सुदर्शन महाराज की महानता उनकी सहजता में घुल-मिलकर इस जातक कथा को अत्यंत रोचक और कभी न भूलनेवाली बनाती है।

१८. मधुपिण्डिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान के मुख से निकला 'प्रपंच' पर एक अत्यंत सारगर्भित और संक्षिप्त धम्म। लेकिन उसका अर्थ कौन बताए?

१९. द्वेधावितक्क सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने विचारों से कैसे निपटें? और उन्हें लाँघकर संबोधि कैसे पाएँ? प्रस्तुत हैं, बोधिसत्व का व्यावहारिक तरीका।

२०. महासमय सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान बुद्ध का दर्शन लेने के लिए दूसरी दुनियाओं के अनेक देवतागण एकत्र हुए। तब, भगवान ने उनका वर्णन कर, भिक्षुओं का उनसे परिचय कराया।

२०. वितक्कसण्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायअपने बुरे विचारों को अच्छाई की तरफ कैसे मोड़ें? यादगार उपमाओं के साथ पाँच तरीके सुनें।

२१. ककचूपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायआलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।

२२. अलगद्दूपम सुत
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

२२. महासतिपट्ठान सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह साधना करने वालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। इस सूत्र में स्मृति स्थापित करने की विधि विस्तार से बतायी गयी है। किन्तु, सति का अर्थ और मकसद क्या है, और वह आतापी के साथ कैसे जुड़ी हुई है, यह समझना अनिवार्य है।

२३. वम्मिक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक देवता आकर भिक्षु को रहस्यमयी पहेलियाँ देता है, जिसका समाधान भगवान करते हैं।

२४. रथविनीत सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदो प्रतिभाशाली अरहंत भिक्षु, आपस में धम्मचर्चा करते हुए, विशुद्धिमार्ग के चरणों को उजागर करते हैं।

२५. निवाप सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमार के चारे से कौन-से साधक बच सकते हैं? हिरणों की उपमा से भगवान समझाते हैं।

२६. चक्कवत्ति सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुनिया का पतन भी अनेक चरणों में होता है, और दुनिया का उद्धार भी। पतन और उद्धार के इस प्रक्रिया के बीच बुद्ध अवतरित होते हैं। आगे, मेत्तेय बुद्ध भी आएंगे।

२६. पासरासि/अरियपरियेसना सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।

२७. अग्गञ्ञ सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुनिया की शुरुवात कैसे हुई? अनेक पौराणिक कथाओं के बीच, बुद्ध एक भिन्न विवरण देते हैं, जिसमें मानव-कर्म और नैतिकता दुनिया के संतुलन से जुड़ा है।

२८. महाहत्थिपदोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

२९. महासारोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान ब्रह्मचर्य का सार बताते हैं, साथ ही उसके बाहरी छिलकों को भी उजागर करते हैं।

३०. लक्खणसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायपहले ब्राह्मणों के वेदों में ‘बत्तीस महापुरुष लक्षण’ का लंबा विवरण दर्ज था, जो आज दिखाई नहीं देता। यह सूत्र बताता है कि बुद्ध के पूर्वजन्म में किस कर्म के परिणामस्वरूप आज कौन-सा लक्षण उपजा।

३२. आटानाटियसुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायदुनिया में अनेक तरह के अदृश्य सत्व हैं, और हर कोई हमारा हितकांक्षी नहीं है। कई सत्व हिंसक भी हैं। यह सूत्र रक्षामंत्र के तौर पर उनसे बचने का मार्ग बताता है।

३३. महागोपालक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक चरवाहे के गुणों की उपमा देकर भिक्षुओं को सारगर्भित धम्म बताते हैं।

३३. सङ्गीति सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकायभगवान ने भिक्षुओं को महत्वपूर्ण सूत्रों का संगायन करने के लिए प्रेरित किया था। उसके उत्तर में सारिपुत्त भन्ते ने महत्वपूर्ण बौद्ध शिक्षाओं का अनुक्रम से संगायन किया।

३४. चूळगोपालक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान एक यादगार उपमा के साथ हमें पार आने के लिए पुकारते हैं।

३४. दसुत्तर सुत्त
सुत्तपिटक / दीघनिकाययह सूत्र अपनी सूचियों को घटक संख्या के अनुसार एक से दस तक सूचीबद्ध करता है, मानो एक छोटा-सा अंगुत्तरनिकाय ही हो।

३८. महातण्हासङ्खय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु अपने दृष्टिकोण पर अड़ा हुआ है। तब भगवान, संवादात्मक शैली में, प्रतीत्य समुत्पाद के सिद्धांत पर प्रतिप्रश्न करते हुए भिक्षुओं को गहरा अर्थ बताते हैं।

३९. महाअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।

४०. चूळअस्सपुर सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायश्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।

४३. महावेदल्ल सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ दो भिक्षुओं के सवाल-जवाब से धम्म के गहरे पहलू एक खिलते हुए फूल की तरह खुलते हैं।

४५. चूळधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।

४६. महाधम्मसमादान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान चार धम्ममार्गों का वर्णन करते हैं, प्रत्येक के लिए यादगार उपमाओं का प्रयोग करते हुए।

४७. वीमंसक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायसाधक को गुरु की कड़ी छानबीन करनी चाहिए और श्रद्धा रखने से पहले आँख और कान खुले रखने चाहिए। भगवान बताते हैं कि यह कैसे करना है।

५१. कन्दरक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय'पशुओं का स्वभाव सीधा होता है, जबकि मानव स्वभाव का कोई भरोसा नहीं!' इस बात पर भगवान चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन करते हैं।

५९. बहुवेदनीय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायदो लोग वेदना की गिनती में उलझे रहते हैं, वहीं भगवान उनसे आगे बढ़कर सुखों के विविध प्रकार गिनाते हैं।

६३. चूळमालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक भिक्षु जाकर भगवान को धमकी देता है—दार्शनिक उत्तर न मिले तो संन्यास छोड़ देगा।

६४. महामालुक्य सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान निचली पाँच बेड़ियों को तोड़कर अनागामी अवस्था पाने का मार्ग उजागर करते हैं?

६६. लटुकिकोपम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

६८. नळकपान सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।

६९. गोलियानि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजब एक असभ्य अरण्यवासी भिक्षु संघ में आया, तो सारिपुत्त भन्ते ने आचार और साधना का वास्तविक अर्थ समझाया।

७०. कीटागिरि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक गाँव के दो हठी भिक्षु—जिन्हें भगवान पहले सहमत करते हैं, फिर करुणा में लिपटी फटकार देते हैं।

८१. घटिकार सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान अपने पुराने मित्र घटिकार कुम्हार की प्रेरणादायी और भावनात्मक जातक कथा सुनाते हैं।

८३. मघदेव सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान की जातक कथा, जिसमें वे ऐसी कल्याणकारी प्रथा स्थापित करते हैं, जो इसके अनुसरणकर्ताओं को ब्रह्मलोक में सद्गति प्रदान करती है।

१०२. पञ्चत्तय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपाँच और तीन—यह सूत्र प्रसिद्ध ब्रह्मजालसुत्त के समान है, केवल मध्यम-लंबाई का है।

१०५. सुनक्खत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायजो भिक्षु स्वयं को ऊँचा आँक कर, अरहंत मानकर, साधना छोड़ देता है, उस पर भगवान का धम्मोपदेश।

१०६. आनेञ्जसप्पाय सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययहाँ भगवान कामुकता से परे जाने के ठोस साधना-मार्ग बताते हैं, और अंततः उन्हें भी लाँघने की प्रेरणा देते हैं।

१०९. महापुण्णम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे भगवान भिक्षुओं से घिरे होते हैं। ऐसे रोमहर्षक अवसर को भाँपकर एक भिक्षु भगवान से प्रश्नोत्तर करता है।

११०. चूळपुण्णम सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायपूर्णिमा की रात खुले आकाश के नीचे, भगवान स्वयं रोमहर्षक अवसर को भाँपकर, सत्पुरुष और असत्पुरुष की व्याख्या करते हैं।

१११. अनुपद सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान सारिपुत्त भन्ते की धम्म-विपश्यना की कथा बताते हैं, जो समाधि की सभी अवस्थाओं से गुजरते हुए निरोध अवस्था तक पहुँचती है।

११२. छब्बिसोधन सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाययदि कोई भिक्षु अरहंत होने का दावा करें, तो न तो जश्न मनाएँ और न ही उसे नकार दें। बल्कि उससे ये पाँच प्रश्न पूछें।

११३. सप्पुरिस सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ विभिन्न परिस्थितियों के माध्यम से असत्पुरुष भिक्षु और सत्पुरुष भिक्षु के बीच का अंतर स्पष्ट करते हैं।

११४. सेवितब्बासेवितब्ब सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ धम्म की जटिलता को हटाकर एक सीधा मापदंड सामने रखते हैं—कि कौन-सी बात अपनाने योग्य है और कौन-सी नहीं।

११५. बहुधातुक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस दुनिया को ख़तरा मूर्ख से है, ज्ञानी से नहीं—और विवेकशील ज्ञानी वही है जो धातुओं, आयामों, प्रतित्य-समुत्पाद और संभव–असंभव में कुशल हो।

११६. इसिगिलि सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायऋषियों को निगलने वाले “इसिगिलि” पर्वत पर निवास करते हुए, भगवान भिक्षुओं को पाँच सौ प्रत्येक-बुद्धों की नाम-कीर्ति बताते हैं।

११७. महाचत्तारीसक सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायइस सूत्र में भगवान आर्य अष्टांगिक मार्ग के सात अंगों की 'लौकिक' और 'आर्य' परिभाषाएँ देते हैं और उनके आपसी संबंध को स्पष्ट करते हैं।

११८. आनापानस्सति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान सबकी पसंदीदा आनापान-स्मृति सिखाते हैं, दिखाते हुए कि वह कैसे चारों स्मृतिप्रस्थान, सातों संबोध्यंग, तथा विद्या-विमुक्ति को पूर्ण करती है।

११९. कायगतासति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान कायागत-स्मृति को अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली ढंग से, अनेक सटीक उपमाओं के सहारे प्रस्तुत करते हैं।

१२०. सङ्खारुपपत्ति सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ भिक्षुओं को पुनर्जन्म चुनने की आजादी देते प्रतीत होते हैं—‘जिसे जहाँ जाना हो, यह उसका रास्ता है! जाओ!’

१२१. चूळसुञ्ञत सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान यहाँ आयुष्मान आनन्द को शून्यता की सुखद ध्यान-अवस्था में प्रवेश करने का एक अत्यंत सरल मार्ग बताते हैं।

१२३. अच्छरियब्भुत सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायक्या आप जानते हैं बोधिसत्व के जन्म के समय कौन-से अद्भुत चमत्कार हुए थे? आनंद भन्ते उनका मनमोहक वर्णन करते हैं।

१२९. बालपण्डित सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमूर्ख के लिए नर्क की भयंकर यातनाएं और ज्ञानी के लिए स्वर्ग के सुखों का रोंगटे खड़े कर देने वाला सजीव वर्णन!

१३१. भद्देकरत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायभगवान एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रेरणादायक गाथा के माध्यम से वर्तमान में जीने का सूत्र देते हैं।

१३२. आनन्दभद्देकरत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय‘भद्देकरत्त’ गाथा का आनंद भन्ते द्वारा किया गया सुंदर विश्लेषण, जिसे सुनकर स्वयं भगवान साधुवाद देते हैं।

१३३. महाकच्चानभद्देकरत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायमहाकच्चान भन्ते अपने अनूठे अंदाज में ‘भद्देकरत्त’ कविता के गहरे अर्थों को भिक्षुओं के सामने खोलते हैं।

१३४. लोमसकङ्गियभद्देकरत्त सुत्त
सुत्तपिटक / मज्झिमनिकायएक देवता के आग्रह पर, एक भिक्षु भगवान के पास जाते हैं और भगवान उन्हें वही ‘भद्देकरत्त’ गाथा और उसका अर्थ समझाते हैं।