✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • सम्बोधि क्या है?

    सम्बोधि क्या है?

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    दुनिया के अधिकतर धर्म 'विश्वास' पर टिके हैं। वे कहते हैं—'इस किताब पर भरोसा करो,' या 'ईश्वर पर भरोसा करो।' लेकिन बुद्ध का धम्म 'खोज' पर टिका है।

  • सम्बोधि इतिहास

    सम्बोधि इतिहास

    लेख

    बुद्ध के समय का जम्बूद्वीप (भारत) केवल ऋषियों की भूमि नहीं थी, बल्कि एक 'बौद्धिक युद्धक्षेत्र' था। गणित और खगोलशास्त्र की नई खोजों ने लोगों की नींद उड़ा दी थी।

  • गोतम बुद्ध - एक विस्मृत महामानव

    गोतम बुद्ध - एक विस्मृत महामानव

    लेख

    भारत के इतिहास ने हमें कई राजा दिए, कई योद्धा दिए, और कई दार्शनिक दिए। किन्तु 'तथागत' केवल एक ही दिया...

  • बुद्ध का क्रमिक उपदेश

    बुद्ध का क्रमिक उपदेश

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    बुद्ध ने कभी धर्म को एक ही साँचे में नहीं ढाला। वे श्रोता की क्षमता, उसकी जिज्ञासा और उसके मन की स्थिति को ध्यान में रखकर ही, क्रमबद्ध रूप से, धर्म को प्रकट करते—इसी को 'अनुपुब्बिकथा' कहा गया है।

  • भिक्षु का क्रमिक प्रशिक्षण

    भिक्षु का क्रमिक प्रशिक्षण

    लेख

    आध्यात्मिक विकास कोई जोशीला और आवेगजन्य निर्णय नहीं, बल्कि जागरूक, क्रमबद्ध, और सूझबूझ से भरी एक यात्रा है। 'अनुपुब्बिसिक्खा', यानी क्रमिक प्रशिक्षण, वह साधना-पथ है जिसे स्वयं बुद्ध ने गढ़ा।

  • क्या बौद्ध धर्म में मिलावट हुई है?

    क्या बौद्ध धर्म में मिलावट हुई है?

    लेख

    आज हम जिसे 'बुद्ध वचन' के रूप में सुनते, पढ़ते और पूजते हैं—क्या वह सचमुच बुद्ध की अपनी वाणी है? या फिर यह सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में लिपटी हुई कोई और गूंज है?

  • क्या मांसाहार पाप है?

    क्या मांसाहार पाप है?

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    भारत में जब कोई धम्म की शरण में आता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक दुविधा भोजन को लेकर खड़ी होती है। एक तरफ हमारे मन में हज़ारों सालों का 'शाकाहार ही पवित्रता है' वाला गहरा भारतीय संस्कार है, तो दूसरी तरफ बुद्ध का अहिंसा का सन्देश है।

  • क्या बौद्ध धर्म निराशावादी है?

    क्या बौद्ध धर्म निराशावादी है?

    लेख

    आपने अक्सर सुना होगा कि बौद्ध धर्म एक 'निराशावादी' धर्म है। यह गलतफहमी इतनी गहरी है कि हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और महान दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी इसे 'दुःखवाद' के चश्मे से देखने से नहीं बच सके।

  • तर्क बनाम विवेक

    तर्क बनाम विवेक

    लेख

    तर्क आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आधुनिक दुनिया में तर्क एक अतिरंजित और अनिवार्य गुण बन चुका है।

  • पारमिता का मिथक

    पारमिता का मिथक

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    प्रारंभिक सूत्रों की कसौटी पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पारमि की यह पूरी अवधारणा बुद्ध के मूल वचनों से एक ऐतिहासिक भटकाव है। आइए, इसकी विकास-यात्रा और इसके प्रभावों की पड़ताल करें।

  • निर्वाण का खौफ़

    निर्वाण का खौफ़

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    हम सभी जानते हैं कि जब दीये की लौ बुझती है तो क्या होता है—अग्नि शांत होकर खत्म हो जाती है। इसलिए जब हमें पता चलता है कि बौद्ध साधना का अंतिम लक्ष्य 'निर्वाण' है—जिसका शाब्दिक अर्थ है 'बुझ जाना'—तो मन में एक सिहरन दौड़ जाती है।

  • अरिय सङ्घ १

    अरिय सङ्घ १

    लेख

    विचरण करों, भिक्षुओं—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!

  • अरिय सङ्घ २

    अरिय सङ्घ २

    लेख

    विचरण करों, भिक्षुओं—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!

  • अर्हंत बनाम बोधिसत्व

    अर्हंत बनाम बोधिसत्व

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    आज १५०० साल बाद, हमारे पास 'बुद्ध के नाम पर खिचड़ी पक चुकी है। थेरवाद, महायान, वज्रयान—सब दावा करते हैं कि वे सही हैं। एक आम साधक कैसे पहचाने कि शुद्ध घी कौन सा है और डालडा कौन सा?

  • त्रिशरण क्या है?

    त्रिशरण क्या है?

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    शरण जाने का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि 'मैं अपने विकारों से हार रहा हूँ, और अब मुझे एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता है जिसने इन शत्रुओं को परास्त किया हो।'

  • कर्म और हम

    कर्म और हम

    लेख

    कर्म दुनिया का सबसे चर्चित, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा गया विषय बन गया है। आईये, सदियों पुरानी धूल हटाते हैं और कर्म को ठीक वैसे समझते हैं, जैसा बुद्ध ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर समझाया।

  • इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

    इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त

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    यह ब्रह्मांड का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' है। ये वह धम्म नियम है जिससे ब्रह्मांड के अणु-अणु से लेकर आकाशगंगाएँ और हमारे मन का हर एक विचार संचालित होता है। इसी में पूरी सृष्टि गुंथी हुई है।

  • अत्ता-अनत्ता - क्या 'आत्मा' है, या नहीं?

    अत्ता-अनत्ता - क्या 'आत्मा' है, या नहीं?

    लेख

    समस्या तब आती है जब 'अनत्त' का दूसरा अर्थ निकाला जाता है—आत्मा का न होना।' यानी यह मान लेना कि आत्मा जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में ही नहीं है। यही वह मोड़ है जहाँ से सारा विवाद और दुविधा जन्म लेती है।

  • प्रतीत्य समुत्पाद

    प्रतीत्य समुत्पाद

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    यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

  • मूल बुद्ध वचन - चेकलिस्ट

    मूल बुद्ध वचन - चेकलिस्ट

    लेख

    बौद्ध धर्म के इतिहास में 'मूल बुद्ध वचन' और बाद में विकसित हुए 'थेरवाद' के बीच के अंतर को समझना एक संवेदनशील लेकिन आवश्यक यात्रा है।

  • बौद्ध स्थल - संवेग स्थल

    बौद्ध स्थल - संवेग स्थल

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    इन स्थलों पर पहुँचकर बुद्ध का अस्तित्व केवल एक सुनी-सुनाई कथा नहीं रह जाता—वह स्पंदित होने लगता है, सजीव हो उठता है, और संस्पर्श होते अनुभूति में बदल जाता है। इन स्थलों के वातावरण में ही वह प्रशांति और ऊर्जा महसूस होती है, जो संसार के परे हो। ऐसा लगता है जैसे बुद्ध और उनके अरहंत शिष्य आज भी उसी धरती …

  • २०२६ उपोसथ कलेंडर

    लेख

    वर्ष २०२६ की उपोसथ तिथियाँ

  • अध्यात्म जीवन क्यों?

    अध्यात्म जीवन क्यों?

    लेख

    अनन्त कामभोग की खोज में कुछ लोग डूब जाते हैं, कुछ ऊब जाते हैं—और तभी विवेकशील व्यक्ति जीवन के वास्तविक उद्देश्य और उसकी सार्थकता की खोज आरंभ करता है।

  • गुरु

    गुरु

    लेख

    आज अध्यात्म भी एक प्रतिस्पर्धा बन चुका है। चमत्कारी बाबाओं और आकर्षक दावों की भीड़ में विवेक खो जाना सहज है, जबकि सच्चे कल्याणमित्र प्रायः शांत और अल्पप्रचारित होते हैं।

  • बुद्ध धर्म ही क्यों?

    बुद्ध धर्म ही क्यों?

    लेख

    बुद्ध का मार्ग भला क्यों चुना जाना चाहिए? और यह अन्य आध्यात्मिक पथों से किस प्रकार भिन्न और श्रेष्ठ है?

  • शुरुवात कैसे करें - पहला कदम - त्रिशरण

    शुरुवात कैसे करें - पहला कदम - त्रिशरण

    लेख

    जब किसी को बुद्ध पर विश्वास होने लगे, तो शुरुवाती पहला कदम क्या होता है?

  • कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म

    कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म

    लेख

    कुशल (स्वभाव) को बढ़ाओ! कुशल को बढ़ाया जा सकता है। यदि कुशल को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो मैं तुमसे न कहता...

  • त्रिपिटक

    त्रिपिटक

    सुत्तपिटक

    आज जब हम इन ताड़पत्रों की ओर लौटते हैं, तो हम अपनी खोई हुई विरासत और अपनी जड़ों की ओर लौट रहे होते हैं।

  • शब्दावली - मूल अर्थ और संदर्भ

    शब्दावली - मूल अर्थ और संदर्भ

    धम्म के तकनीकी शब्दों को उनके सही अर्थ और संदर्भ में समझना आवश्यक है, जिस संदर्भ में स्वयं भगवान बुद्ध उनका प्रयोग करते थे। इसी उद्देश्य से यह शब्दावली तैयार है।