मार्गदर्शिका
— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

सम्बोधि क्या है?
लेखदुनिया के अधिकतर धर्म 'विश्वास' पर टिके हैं। वे कहते हैं—'इस किताब पर भरोसा करो,' या 'ईश्वर पर भरोसा करो।' लेकिन बुद्ध का धम्म 'खोज' पर टिका है।

सम्बोधि इतिहास
लेखबुद्ध के समय का जम्बूद्वीप (भारत) केवल ऋषियों की भूमि नहीं थी, बल्कि एक 'बौद्धिक युद्धक्षेत्र' था। गणित और खगोलशास्त्र की नई खोजों ने लोगों की नींद उड़ा दी थी।

गोतम बुद्ध - एक विस्मृत महामानव
लेखभारत के इतिहास ने हमें कई राजा दिए, कई योद्धा दिए, और कई दार्शनिक दिए। किन्तु 'तथागत' केवल एक ही दिया...

बुद्ध का क्रमिक उपदेश
लेखबुद्ध ने कभी धर्म को एक ही साँचे में नहीं ढाला। वे श्रोता की क्षमता, उसकी जिज्ञासा और उसके मन की स्थिति को ध्यान में रखकर ही, क्रमबद्ध रूप से, धर्म को प्रकट करते—इसी को 'अनुपुब्बिकथा' कहा गया है।

भिक्षु का क्रमिक प्रशिक्षण
लेखआध्यात्मिक विकास कोई जोशीला और आवेगजन्य निर्णय नहीं, बल्कि जागरूक, क्रमबद्ध, और सूझबूझ से भरी एक यात्रा है। 'अनुपुब्बिसिक्खा', यानी क्रमिक प्रशिक्षण, वह साधना-पथ है जिसे स्वयं बुद्ध ने गढ़ा।

क्या बौद्ध धर्म में मिलावट हुई है?
लेखआज हम जिसे 'बुद्ध वचन' के रूप में सुनते, पढ़ते और पूजते हैं—क्या वह सचमुच बुद्ध की अपनी वाणी है? या फिर यह सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं में लिपटी हुई कोई और गूंज है?

क्या मांसाहार पाप है?
लेखभारत में जब कोई धम्म की शरण में आता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक दुविधा भोजन को लेकर खड़ी होती है। एक तरफ हमारे मन में हज़ारों सालों का 'शाकाहार ही पवित्रता है' वाला गहरा भारतीय संस्कार है, तो दूसरी तरफ बुद्ध का अहिंसा का सन्देश है।

क्या बौद्ध धर्म निराशावादी है?
लेखआपने अक्सर सुना होगा कि बौद्ध धर्म एक 'निराशावादी' धर्म है। यह गलतफहमी इतनी गहरी है कि हमारे देश के प्रथम उपराष्ट्रपति और महान दार्शनिक डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी इसे 'दुःखवाद' के चश्मे से देखने से नहीं बच सके।

तर्क बनाम विवेक
लेखतर्क आवश्यक है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन आधुनिक दुनिया में तर्क एक अतिरंजित और अनिवार्य गुण बन चुका है।

पारमिता का मिथक
लेखप्रारंभिक सूत्रों की कसौटी पर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि पारमि की यह पूरी अवधारणा बुद्ध के मूल वचनों से एक ऐतिहासिक भटकाव है। आइए, इसकी विकास-यात्रा और इसके प्रभावों की पड़ताल करें।

निर्वाण का खौफ़
लेखहम सभी जानते हैं कि जब दीये की लौ बुझती है तो क्या होता है—अग्नि शांत होकर खत्म हो जाती है। इसलिए जब हमें पता चलता है कि बौद्ध साधना का अंतिम लक्ष्य 'निर्वाण' है—जिसका शाब्दिक अर्थ है 'बुझ जाना'—तो मन में एक सिहरन दौड़ जाती है।

अरिय सङ्घ १
लेखविचरण करों, भिक्षुओं—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!

अरिय सङ्घ २
लेखविचरण करों, भिक्षुओं—बहुजनों के हित के लिए, बहुजनों के सुख के लिए, इस दुनिया पर उपकार करते हुए, देव और मानव के कल्याण, हित और सुख के लिए!

अर्हंत बनाम बोधिसत्व
लेखआज १५०० साल बाद, हमारे पास 'बुद्ध के नाम पर खिचड़ी पक चुकी है। थेरवाद, महायान, वज्रयान—सब दावा करते हैं कि वे सही हैं। एक आम साधक कैसे पहचाने कि शुद्ध घी कौन सा है और डालडा कौन सा?

त्रिशरण क्या है?
लेखशरण जाने का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि 'मैं अपने विकारों से हार रहा हूँ, और अब मुझे एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता है जिसने इन शत्रुओं को परास्त किया हो।'

कर्म और हम
लेखकर्म दुनिया का सबसे चर्चित, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा गया विषय बन गया है। आईये, सदियों पुरानी धूल हटाते हैं और कर्म को ठीक वैसे समझते हैं, जैसा बुद्ध ने अपने असीम ज्ञान के आधार पर समझाया।

इदप्पच्चयता - कारण कार्य सिद्धान्त
लेखयह ब्रह्मांड का 'ऑपरेटिंग सिस्टम' है। ये वह धम्म नियम है जिससे ब्रह्मांड के अणु-अणु से लेकर आकाशगंगाएँ और हमारे मन का हर एक विचार संचालित होता है। इसी में पूरी सृष्टि गुंथी हुई है।

अत्ता-अनत्ता - क्या 'आत्मा' है, या नहीं?
लेखसमस्या तब आती है जब 'अनत्त' का दूसरा अर्थ निकाला जाता है—आत्मा का न होना।' यानी यह मान लेना कि आत्मा जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में ही नहीं है। यही वह मोड़ है जहाँ से सारा विवाद और दुविधा जन्म लेती है।

प्रतीत्य समुत्पाद
लेखयह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि हमारा अस्तित्व किसी सीधी रेखा में चलने वाली घटना नहीं है, और न ही यह किसी शाश्वत 'आत्मा' की यात्रा है। यह हेतु और फल का एक जटिल ताना-बाना है। हम एक बंद कमरे में नहीं हैं, बल्कि एक प्रक्रिया का हिस्सा हैं जो निरंतर अपने आप को 'पका' रही है और 'खा' रही है।

मूल बुद्ध वचन - चेकलिस्ट
लेखबौद्ध धर्म के इतिहास में 'मूल बुद्ध वचन' और बाद में विकसित हुए 'थेरवाद' के बीच के अंतर को समझना एक संवेदनशील लेकिन आवश्यक यात्रा है।

बौद्ध स्थल - संवेग स्थल
लेखइन स्थलों पर पहुँचकर बुद्ध का अस्तित्व केवल एक सुनी-सुनाई कथा नहीं रह जाता—वह स्पंदित होने लगता है, सजीव हो उठता है, और संस्पर्श होते अनुभूति में बदल जाता है। इन स्थलों के वातावरण में ही वह प्रशांति और ऊर्जा महसूस होती है, जो संसार के परे हो। ऐसा लगता है जैसे बुद्ध और उनके अरहंत शिष्य आज भी उसी धरती …

अध्यात्म जीवन क्यों?
लेखअनन्त कामभोग की खोज में कुछ लोग डूब जाते हैं, कुछ ऊब जाते हैं—और तभी विवेकशील व्यक्ति जीवन के वास्तविक उद्देश्य और उसकी सार्थकता की खोज आरंभ करता है।


बुद्ध धर्म ही क्यों?
लेखबुद्ध का मार्ग भला क्यों चुना जाना चाहिए? और यह अन्य आध्यात्मिक पथों से किस प्रकार भिन्न और श्रेष्ठ है?

शुरुवात कैसे करें - पहला कदम - त्रिशरण
लेखजब किसी को बुद्ध पर विश्वास होने लगे, तो शुरुवाती पहला कदम क्या होता है?

कुशल भावना - बोधिपक्खिय धम्म
लेखकुशल (स्वभाव) को बढ़ाओ! कुशल को बढ़ाया जा सकता है। यदि कुशल को बढ़ाया नहीं जा सकता, तो मैं तुमसे न कहता...


शब्दावली - मूल अर्थ और संदर्भ
धम्म के तकनीकी शब्दों को उनके सही अर्थ और संदर्भ में समझना आवश्यक है, जिस संदर्भ में स्वयं भगवान बुद्ध उनका प्रयोग करते थे। इसी उद्देश्य से यह शब्दावली तैयार है।