✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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संवेगजन्य उपदेश

— इस श्रेणी से संबंधित संपूर्ण संकलन —

  • ३. धम्मदायाद सुत्त

    ३. धम्मदायाद सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान बुद्ध के सच्चे वारिस कौन हैं? भगवान के द्वारा बताने पर सारिपुत्त भन्ते भी उसे और उजागर करते हैं।

  • ६. आकङ्खेय्य सुत्त

    ६. आकङ्खेय्य सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भिक्षु की आकांक्षा लौकिक हो या अलौकिक, भगवान उन्हें पूरा करने का मार्ग बताते हैं।

  • ८. सल्लेख सुत्त

    ८. सल्लेख सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान बताते हैं कि साधक को, सुख और शान्ति में रमने के बजाय, अपने क्लेशों को ‘घिस-घिसकर मिटाने’ की तपश्चर्या करनी चाहिए।

  • १६. चेतोखिल सुत्त

    १६. चेतोखिल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान चित्त की बंजरता और उसके जंजीरों के बारे में अवगत कराते हैं।

  • १७. वनपत्थ सुत्त

    १७. वनपत्थ सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान एक अत्यंत व्यावहारिक बात बताते हैं—भिक्षुओं को कहाँ रहना चाहिए, और कहाँ नहीं।

  • २१. ककचूपम सुत्त

    २१. ककचूपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    आलोचना कैसे झेलें? भगवान जीवंत और यादगार उपमाओं के साथ बताते हैं।

  • २२. अलगद्दूपम सुत

    २२. अलगद्दूपम सुत

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक भिक्षु अपनी पापी धारणा बनाता है। तब भगवान प्रसिद्ध उपमाओं के साथ अत्यंत गहरा धम्म बताया हैं।

  • २५. निवाप सुत्त

    २५. निवाप सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    मार के चारे से कौन-से साधक बच सकते हैं? हिरणों की उपमा से भगवान समझाते हैं।

  • २६. पासरासि/अरियपरियेसना सुत्त

    २६. पासरासि/अरियपरियेसना सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    दुनिया के सभी लोग, दरअसल, दो तरह की खोज में जुटे हैं। भगवान विस्तार से स्वयं की खोज भी बताते हैं।

  • २७. चूळहत्थिपदोपम सुत्त

    २७. चूळहत्थिपदोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    क्या हमें श्रद्धा से तुरंत मान लेना चाहिए? भगवान यहाँ उपमा देकर हमें सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।

  • २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    २८. महाहत्थिपदोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते धम्म के तमाम प्रमुख सिद्धान्तों को चार आर्य सत्यों में पिरो देते हैं।

  • २९. महासारोपम सुत्त

    २९. महासारोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान ब्रह्मचर्य का सार बताते हैं, साथ ही उसके बाहरी छिलकों को भी उजागर करते हैं।

  • ३३. महागोपालक सुत्त

    ३३. महागोपालक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान एक चरवाहे के गुणों की उपमा देकर भिक्षुओं को सारगर्भित धम्म बताते हैं।

  • ३४. चूळगोपालक सुत्त

    ३४. चूळगोपालक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    यहाँ भगवान एक यादगार उपमा के साथ हमें पार आने के लिए पुकारते हैं।

  • ३७. चूळतण्हासङ्खय सुत्त

    ३७. चूळतण्हासङ्खय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान से धम्म सुनने पर भी देवराज इन्द्र मदहोश रहता है। तब महामोग्गल्लान भन्ते उसके रोंगटे खड़े कर उसे होश दिलाते हैं।

  • ३९. महाअस्सपुर सुत्त

    ३९. महाअस्सपुर सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान श्रमण को श्रमण बनाने वाले धम्म, और ब्राह्मण को ब्राह्मण बनाने वाले धम्म को उजागर करते हैं।

  • ४०. चूळअस्सपुर सुत्त

    ४०. चूळअस्सपुर सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    श्रमण्यता के अनेक अनुचित व्रत और मार्ग हैं। भगवान उनकी निरर्थकता का खुलासा कर उचित मार्ग दिखाते हैं।

  • ४१. सालेय्यक सुत्त

    ४१. सालेय्यक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान साल गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

  • ४२. वेरञ्जक सुत्त

    ४२. वेरञ्जक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान गाँव के लोगों को ‘सम’ और ‘विषम’ आचरण के माध्यम से सद्गति और दुर्गति के कारणों को स्पष्ट करते हैं।

  • ४५. चूळधम्मसमादान सुत्त

    ४५. चूळधम्मसमादान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान चार प्रकार के धम्ममार्ग बताते हैं, जिनसे वर्तमान का अनुभव और भविष्य के फल भिन्न होते हैं।

  • ४८. कोसम्बिय सुत्त

    ४८. कोसम्बिय सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    कौशाम्बी के झगड़ालू भिक्षुओं को भगवान स्नेहभाव और एकता का महत्व समझाते हैं।

  • ६६. लटुकिकोपम सुत्त

    ६६. लटुकिकोपम सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान का उपकार अनुभव करने वाले भिक्षु को भगवान बंधन तोड़ने और उपाधियों से परे जाने का धम्म सिखाते हैं।

  • ६८. नळकपान सुत्त

    ६८. नळकपान सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान प्रसिद्ध नवभिक्षुओं को उनके आध्यात्मिक कर्तव्यों की स्पष्टता देते हुए अपनी घोषणाओं का कारण बताते हैं।

  • ८१. घटिकार सुत्त

    ८१. घटिकार सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    भगवान अपने पुराने मित्र घटिकार कुम्हार की प्रेरणादायी और भावनात्मक जातक कथा सुनाते हैं।

  • ८२. रट्ठपाल सुत्त

    ८२. रट्ठपाल सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    एक नवयुवक, प्रव्रज्या की अनुमति पाने के लिए माता-पिता से संघर्ष करता है, और अरहंत बनकर लौटकर धूम मचाता है।

  • ८७. पियजातिक सुत्त

    ८७. पियजातिक सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    प्रियजनों से आखिर क्या मिलता है? भगवान के शब्द सहज बुद्धि के विपरीत जाते हैं, और समाज में हंगामा मचाते हैं।

  • ९७. धनञ्जानि सुत्त

    ९७. धनञ्जानि सुत्त

    सुत्तपिटक / मज्झिमनिकाय

    सारिपुत्त भन्ते एक मदहोश ब्राह्मण को पापकर्म से धम्म में लाते हैं और मृत्यु-क्षण में उसकी सद्गति सुनिश्चित करते हैं।