(१९ अक्तूबर २००१ को धम्मलोक बुद्धिस्ट सेंटर (नोल्लामरा, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया) में उपासकों के सामने दिया गया एक प्रवचन)
कुछ समय पहले, मुझे पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (पर्थ) की एक वेधशाला (Observatory) में ‘हमारा ब्रह्मांड में स्थान’ विषय पर एक कार्यक्रम में बुलाया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य सवाल यह था कि भविष्य विज्ञान का होगा या धर्म का? पैनल में खगोल-विज्ञानी (Astronomer), भौतिक विज्ञानी (Physicist), और ईसाई धर्म के प्रतिनिधि थे, और बौद्ध धर्म की तरफ से मैं था। मज़ेदार बात यह थी कि उन लोगों को यह नहीं पता था कि संन्यासी बनने से पहले मैं खुद एक ‘थियोरेटिकल फिजिसिस्ट’ (Theoretical Physicist) रह चुका हूँ!
इसलिए, मुझे पता था कि बौद्ध धर्म क्या जानता है और विज्ञान क्या जानता है। यह एक बहुत ही रोचक चर्चा थी। आज मैं आपसे वही साझा करना चाहता हूँ कि कैसे विज्ञान और धर्म, दोनों की अपनी सीमाएँ और खतरे हैं, लेकिन अगर इनका सही इस्तेमाल हो, तो ये जीवन को करुणा, प्रज्ञा और शांति से भर सकते हैं।
ब्रह्मांड का अंत कहाँ है?
मैं लोगों को अक्सर ऐसी बातें बताता हूँ जो उन्होंने बौद्ध धर्म के बारे में कभी नहीं सुनीं। जैसे, क्या आप जानते हैं कि अंतरिक्ष में जाने वाला पहला इंसान कौन था? नहीं, वो यूरी गागरिन नहीं थे। वो थे भिक्षु रोहितास!
अगर आप ध्यान-साधना में बहुत गहरे उतर जाएं, तो शरीर का हवा में उठना (Levitation) संभव है। हमारे प्राचीन सुत्तों में एक ऐसे ही योगी की कहानी है जिसने इस विधा में महारत हासिल कर ली थी। उसकी गति तीर से भी तेज़ थी। उसने सोचा, “क्यों न मैं उड़कर इस ब्रह्मांड का अंत खोज आऊँ?” वह उड़ा, और बरसों तक उड़ता रहा। सौर मंडलों को पार करते हुए वह गहरे अंतरिक्ष में चला गया। वह उड़ता रहा और अंततः रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसे ब्रह्मांड का कोई अंत नहीं मिला। लोग कहेंगे कि यह सिर्फ एक कहानी है, लेकिन आगे मैं विज्ञान के कुछ ऐसे तथ्य बताऊंगा जो इसे सच साबित कर सकते हैं।
अगले जन्म में जब रोहितास एक देवता बने, तो वह भगवान बुद्ध के पास आए और अपनी पिछली ज़िंदगी की कहानी सुनाई कि कैसे वह ‘अंतरिक्ष-यात्री’ (एस्ट्रोनॉट) या कह लें ‘साधु-यात्री’ (भिक्खुनॉट) बने थे। इस पर बुद्ध ने उन्हें समझाया कि ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत बाहर अंतरिक्ष में उड़कर नहीं खोजा जा सकता। इसे केवल अपने भीतर, अपने मन और शरीर की गहराई में उतरकर ही जाना जा सकता है।
विज्ञान पूछता है, “इस ब्रह्मांड को किसने बनाया?” बुद्ध का जवाब है- इसके रचयिता आप स्वयं हैं!
पिछले जन्मों की यादें और ‘बिग बैंग’
बौद्ध धर्म पूरी तरह से ध्यान पर टिका है। गहरे ध्यान में आप केवल हवा में ही नहीं उठते, बल्कि अपने पिछले जन्मों को भी याद कर सकते हैं। जब मन ध्यान की गहराइयों (जिन्हें हम ‘झान’ कहते हैं) में प्रवेश करता है, तो शरीर, दृष्टि, और श्रवण सब शांत हो जाते हैं। मन इतनी अपार ऊर्जा और स्पष्टता से भर जाता है कि वह समय में पीछे जा सकता है—बचपन में, माँ के गर्भ में, और यहाँ तक कि पिछले जन्म में भी।
यह कोई कल्पना नहीं होती। यह वैसी ही पक्की याद होती है जैसे आपको याद है कि आज सुबह आपने नाश्ते में क्या खाया था। बुद्ध ने तो 91 कल्पों (Aeons) तक की यादें ताज़ा कर ली थीं। 91 कल्पों का मतलब है 91 ‘बिग बैंग’ (Big Bangs)! इसीलिए बुद्ध ने कहा था कि सिर्फ एक ब्रह्मांड नहीं है, बल्कि अनगिनत ब्रह्मांड हैं। यह पैरेलल यूनिवर्स (समानांतर ब्रह्मांड) नहीं, बल्कि एक के बाद एक बनने और नष्ट होने वाले ब्रह्मांड हैं। सुत्तों में इसे ‘संवट्टति विवट्टति’ (सिकुड़ना और फैलना) कहा गया है।
जब मैं फिजिसिस्ट था, तब मेरा विषय यही था—पार्टिकल फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स। विज्ञान मानता है कि हमारे ब्रह्मांड की उम्र करीब 17-18 अरब साल है। आपको हैरानी होगी कि हमारे प्राचीन बौद्ध ग्रंथों में एक ब्रह्मांड की पूरी उम्र 37 अरब साल बताई गई है! जब मैंने यह बात राज्य के खगोल विज्ञानी को बताई, तो उन्होंने माना कि यह आंकड़ा विज्ञान के बिल्कुल करीब है। सोचिए, 2500 साल पहले बिना किसी टेलीस्कोप के, बुद्ध ने गैलेक्सीज़ (Galaxies) को ‘चक्र प्रणाली’ (Wheel systems) कहा था। आज हम जानते हैं कि हमारी आकाशगंगा (Milky Way) एक घूमते हुए पहिए जैसी ही तो है!
यहाँ तक कि सुत्तों में एलियंस (परग्रही जीवन) का भी ज़िक्र है। वहाँ स्पष्ट लिखा है कि ऐसे अन्य सौर मंडल हैं जहाँ अलग सूरज, अलग ग्रह और अलग जीव रहते हैं।
मशीन में बैठा भूत: चेतना और क्वांटम फिजिक्स
उस कार्यक्रम में एक ईसाई महिला ने पूछा, “जब मैं टेलीस्कोप से ब्रह्मांड को देखती हूँ, तो मुझे डर लगता है क्योंकि यह मेरे धर्मग्रंथों से मेल नहीं खाता।” मैंने इसका जवाब वैज्ञानिकों की तरफ मोड़ते हुए कहा, “अगर आप टेलीस्कोप का मुँह उल्टा कर दें और खुद को देखने लगें कि ‘यह सब देख कौन रहा है?’ तो आप वैज्ञानिकों को डर लगने लगेगा!”
विज्ञान की समस्या यह है कि वह सब कुछ ‘बाहर’ खोजता है, पर ‘देखने वाले’ (Observer) को भूल जाता है।
- क्वांटम थ्योरी: इसके अनुसार, जब तक कोई ‘देखने वाला’ (चेतना/जीवन) न हो, तब तक वास्तविकता आकार नहीं लेती।
- थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम: यह नियम कहता है कि ब्रह्मांड में हमेशा अव्यवस्था (Entropy) बढ़ती है। लेकिन हाल ही में एक नोबेल पुरस्कार विजेता ने साबित किया कि जहाँ ‘जीवन’ होता है, वहाँ अव्यवस्था कम होती है और सिस्टम बनता है। जीवन के कारण ही इस ब्रह्मांड में एक व्यवस्था है।
मेरे यूनिवर्सिटी के दिनों में, भौतिक विज्ञानी जीवन या चेतना को ‘मशीन में बैठा भूत’ (The Ghost in the machine) कहते थे। यह ‘भूत’ उनके सारे बाहरी और भौतिक सिद्धांतों को गड़बड़ कर देता था, और आज भी कई वैज्ञानिक इससे घबराते हैं।
अंधी आस्था: धर्म और विज्ञान दोनों की बीमारी
हम मानते हैं कि सिर्फ धर्म में कट्टरपन (Dogmatism) होता है, लेकिन विज्ञान भी इससे अछूता नहीं है। पुरानी मान्यताओं से चिपके रहना और नए अनुभवों को नकार देना दोनों जगह होता है।
बौद्ध धर्म की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सवाल पूछने को बढ़ावा देता है। एक बार बुद्ध ने अपने प्रमुख शिष्य सारिपुत्र को कुछ ज्ञान दिया और पूछा, “सारिपुत्र, क्या तुम्हें मेरी बात पर विश्वास है?” सारिपुत्र ने बेझिझक कहा, “नहीं, क्योंकि मैंने अभी तक इसका खुद अनुभव नहीं किया है।” बुद्ध ने खुश होकर कहा, “साधु! साधु! साधु!” यही असली वैज्ञानिक सोच है—अंधविश्वास मत करो, खुले दिमाग से खुद प्रयोग करो।
जब हम किसी नए सत्य का सामना करते हैं, तो अक्सर अपने अहंकार और पुरानी धारणाओं के कारण उसे नकार देते हैं। लोग मुझसे कहते हैं कि हवा में उठना (Levitation) एक मिथक है। मैं कहता हूँ, “ज़रा रुको, जब तक तुम खुद किसी को ऐसा करते न देख लो!” (हम भिक्षु सार्वजनिक रूप से चमत्कार नहीं दिखाते, क्योंकि फिर लोग धर्म सुनने नहीं, जादू देखने आएंगे और हमारा मंदिर एक सर्कस बन जाएगा।) लेकिन अगर हम चमत्कार दिखा भी दें, तो जो लोग नहीं मानना चाहते, वे कहेंगे कि यह कोई ‘कैमरा ट्रिक’ है। जो आप नहीं देखना चाहते, आपका दिमाग उसे नकार देता है।
बिना दिमाग वाला प्रतिभाशाली लड़का
चलिए, आधुनिक विज्ञान के एक ऐसे मामले की बात करते हैं जिसने मेडिकल साइंस की नींव हिला दी। शेफील्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोलॉजिस्ट प्रोफेसर जॉन लॉर्बर के पास एक छात्र आया जिसका सिर सामान्य से थोड़ा बड़ा था। जब उसका सीटी स्कैन (CT Scan) किया गया, तो डॉक्टर हैरान रह गए। उस लड़के की खोपड़ी के अंदर दिमाग (Brain) था ही नहीं! वहाँ सिर्फ ‘सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड’ (एक तरह का तरल पदार्थ) भरा था और दिमाग का केवल एक बहुत ही शुरुआती हिस्सा (Reptilian brain stem) मौजूद था।
हैरानी की बात यह थी कि उस लड़के का IQ 126 था, वह मैथ्स का टॉपर था और पूरी तरह से सामान्य ज़िंदगी जी रहा था! विज्ञान के अनुसार, बिना विकसित दिमाग (Cortex) के इंसान बोल भी नहीं सकता, गणित का टॉपर होना तो दूर की बात है। लेकिन यह सच है। दवा कंपनियों और कई वैज्ञानिकों ने इस रिसर्च को फाइलों के नीचे दबा दिया, क्योंकि यह उनके इस सिद्धांत को चुनौती देता है कि आपकी बुद्धिमानी या अवसाद पूरी तरह से आपके ‘दिमाग के रसायनों’ पर निर्भर है। सत्य यह है कि एक बेहतरीन मन (Mind) होने के लिए बहुत ज़्यादा दिमाग (Brain) की ज़रूरत नहीं है!
मन और मस्तिष्क (Mind and Brain) अलग हैं
बौद्ध धर्म में शुरू से ही पाँच नहीं, बल्कि छह इंद्रियां (Senses) मानी गई हैं। छठी इंद्री है—आपका मन। और यह मन, आपके भौतिक दिमाग (Brain) से पूरी तरह स्वतंत्र है। अगर विज्ञान इतनी तरक्की कर ले कि मेरा दिमाग निकालकर आपके शरीर में और आपका दिमाग मेरे शरीर में लगा दिया जाए, तब भी ‘मैं’ अजान ब्रह्म ही रहूंगा और ‘आप’ आप ही रहेंगे।
आजकल ‘आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियंस’ (शरीर से बाहर निकलने का अनुभव) एक वैज्ञानिक तथ्य बन चुका है। डॉ. सैम पर्निया (Dr. Sam Parnia) जैसे वैज्ञानिकों ने रिसर्च की है जहाँ हार्ट अटैक के बाद क्लीनिकली डेड (मृत घोषित) हो चुके लोगों ने ऑपरेशन टेबल के ऊपर से डॉक्टरों की बातचीत और प्रक्रियाओं को बिल्कुल सटीक रूप से बताया है। दिमाग काम नहीं कर रहा था, फिर भी ‘कोई’ देख और सुन रहा था। वह मन था!
विज्ञान और बौद्ध धर्म की प्रयोगशाला
बौद्ध धर्म आपसे किसी ईश्वर या आत्मा (Soul) पर आँख मूंदकर विश्वास करने को नहीं कहता। बुद्ध ने कालाम सुत्त में स्पष्ट कहा है: “किसी बात को सिर्फ इसलिए मत मानो क्योंकि वह किताबों में लिखी है, परंपरा है, या मैंने कही है। उसे अपने अनुभव की कसौटी पर कसो।”
अगर आप जानना चाहते हैं कि कर्म कैसे काम करता है, पुनर्जन्म होता है या नहीं, या हमारे भीतर कोई स्थायी ‘आत्मा’ है या नहीं—तो आपको खुद प्रयोग करना होगा। यह बौद्ध धर्म की प्रयोगशाला है, और इस प्रयोग की विधि बहुत स्पष्ट है:
शील: नैतिकता और अनुशासन.
अपने आचरण को शुद्ध करें। यही आपकी प्रयोगशाला की सफाई है।
समाधि: गहरा ध्यान.
अपने मन को एकाग्र और शांत करें (झान की अवस्था में जाएं), जिससे मन की शक्ति जागृत हो सके।
प्रज्ञा: अन्तर्ज्ञान और अंतर्दृष्टि.
इस शांत मन से अपने भीतर झांकें और सत्य (अनात्म, कर्म, पुनर्जन्म) का सीधा अनुभव करें।
बुद्ध ने इसी विधि का प्रयोग बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे किया था, और जो परिणाम उन्हें मिला, उसे हम ‘संबोधि’ कहते हैं। सदियों से अरहंतों ने इस प्रयोग को दोहराया है और वही परिणाम पाया है।
खुशी कहाँ रहती है? (क्लोनिंग और स्टेम सेल)
कुछ समय पहले कुछ स्कूली बच्चे हमारे विहार में आए। मैंने उनसे पूछा, “तुम में से कौन खुश है?” कुछ ने हाथ उठाए। मैंने कहा, “क्या तुम अपनी उंगली से इशारा करके बता सकते हो कि शरीर के किस हिस्से में वह खुशी रखी है?” वे नहीं बता पाए। इसी तरह, क्या आप बता सकते हैं कि ‘डिप्रेशन’ शरीर में कहाँ है?
खुशी और दुख का कोई भौतिक आकार (Coordinates in space) नहीं होता। वे मन के आकाश (Mind-space) में रहते हैं। मन अंतरिक्ष या भौतिक शरीर में स्थित नहीं है। इसीलिए मृत्यु के बाद चेतना तुरंत कहीं भी प्रकट हो सकती है।
यही कारण है कि बौद्ध धर्म को क्लोनिंग (Cloning) से कोई दिक्कत नहीं है। आप चाहें तो मेरी क्लोनिंग कर लें! दिखने में वह बिलकुल मेरे जैसा होगा, लेकिन उसकी पसंद, उसकी पर्सनालिटी और उसका ज्ञान एकदम अलग होगा। शरीर सिर्फ एक कार (Toyota) की तरह है, लेकिन उसे चलाने वाला ड्राइवर (पिछली ज़िंदगियों से आई चेतना) अलग होता है। इसी तरह, स्टेम सेल रिसर्च (Stem Cell Research) से भी हमें ऐतराज़ नहीं है, क्योंकि शुरुआती भ्रूण में जब तक चेतना (Stream of consciousness) प्रवेश नहीं करती, तब तक उसमें कोई ‘जीव’ नहीं होता।
अगर आप पुनर्जन्म का वैज्ञानिक प्रमाण चाहते हैं, तो प्रोफेसर इयान स्टीवेंसन (Prof. Ian Stevenson) की जीवन भर की रिसर्च पढ़ें। उनके पास ऐसे 3000 से ज़्यादा मामले दर्ज हैं जहाँ बच्चों ने अपने पिछले जन्मों की बिल्कुल सटीक और प्रमाणित जानकारी दी।
निष्कर्ष
विज्ञान बौद्ध धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है। अगर कल विज्ञान यह साबित कर दे कि पुनर्जन्म नहीं होता, तो बौद्धों को पुनर्जन्म मानना छोड़ देना चाहिए। अगर विज्ञान साबित कर दे कि ‘आत्मा’ (Self) होती है, तो हम अपनी ‘अनात्म’ की थ्योरी छोड़ देंगे। बौद्ध धर्म में कोई भी चीज़ आलोचना से परे (Sacred cow) नहीं है।
लेकिन मेरा अनुभव और मेरा दावा है कि आप ध्यान का प्रयोग करके देखिए, आप पाएंगे कि बुद्ध सही थे।
लोग विज्ञान की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि इसने हमें बेहतरीन ‘तकनीक’ दी है। और आज बौद्ध धर्म दुनिया भर में इसलिए फैल रहा है क्योंकि यह ‘मन की तकनीक’ (Technology of the mind) है। यह काम करती है! अगर आप इस बौद्ध ‘तकनीक’ (ध्यान और माइंडफुलनेस) का इस्तेमाल करेंगे, तो यह आपके भीतर के दुखों और उलझनों को हमेशा के लिए सुलझा देगी।
आगे क्या पढ़ें?
यदि यह प्रवचन आपकी जिज्ञासा की कसौटी पर खरा उतरा है, और आप अध्यात्म के व्यावहारिक व वैज्ञानिक पक्षों को अधिक गहराई से समझना चाहते हैं, तो हमारी इस विशेष मार्गदर्शिका का अवलोकन अवश्य करें:
इसी प्रवचन की तरह अजान ब्रह्म की एक और धमाकेदार लेख:
अक्सर बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने वाले नए जिज्ञासु इसकी तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभावित होकर कदम बढ़ाते हैं। परंतु, जब उनका सामना धर्म के कुछ ऐसे गूढ़ पक्षों से होता है जो विशुद्ध तर्क की सीमा में नहीं बंधते, तो वे उन्हें सहज ही नकार देते हैं। तर्क और आस्था के इसी अंतर्विरोध को समझने के लिए हमारा यह विश्लेषणात्मक लेख अवश्य पढ़ें:
अजान ब्रह्म

अजान (=आचार्य) ब्रह्म, एक थेरवादी बौद्ध भिक्षु, अपनी बुद्धिमत्ता और हास्यपूर्ण शैली के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इंग्लैंड में जन्मे, उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी वैज्ञानिक (Theoretical Physicist – Scientist) थे, लेकिन गहरी आध्यात्मिक खोज ने उन्हें थाईलैंड में अजान चाह के शिष्य बनने के लिए प्रेरित किया। बाद में, वे ऑस्ट्रेलिया में बोधिन्याण विहार के प्रमुख बने। उनकी शिक्षाएँ गहरी प्रज्ञा और हल्के हास्य का अनूठा संगम हैं, जो ध्यान और जीवन के अर्थ को सरलता से समझाने में मदद करती हैं।
