✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
निर्वाण - हमारी सोच से कहीं गुना बेहतर! मुख्य > देसना 5. प्रवचन निब्बाण

Nibbana Is Better than You Think

निर्वाण

— हमारी सोच से कहीं गुना बेहतर! —

लेखक: थानिस्सरो भिक्खु
| १० मिनट



बुद्ध ने साफ़-साफ़ कहा था कि वो केवल दो बातें सिखाते हैं—एक ‘दुख’ और दूसरा ‘दुख का अंत’।

उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा यही दुख था, और इस दुख को जड़ से ख़त्म कर देना ही इसका एकमात्र समाधान था। पहले उन्होंने खुद के भीतर इस समस्या को सुलझाया, फिर दूसरों को राह दिखाई कि तुम भी अपने भीतर इसे ऐसे ही सुलझा सकते हो।

देखा जाए तो बात बड़ी सीधी और सरल लगती है। दुनिया में चारों तरफ फैले इस दुख-दर्द को देखकर कोई भी कह देगा कि यार, काश लोगों को ये सब न झेलना पड़ता। कहीं जंग छिड़ी है, कहीं भुखमरी है, तो कहीं जानबूझकर तबाही मचाई जा रही है। इंसानी दुनिया का हाल ही इतना बुरा है, और कुछ योनियाँ तो ऐसी हैं जहाँ इससे भी बदतर नरक है। ऐसे में जो कोई भी इस दुख से परमानेंट छुट्टी दिलाने की बात करेगा, उसकी बात तो सबको अच्छी लगनी चाहिए।

लेकिन अजीब बात है कि जब बुद्ध इस दुख के अंत यानी ‘निर्वाण’ के असली मायने समझाते हैं, तो कई लोगों को यह बात कुछ ख़ास जमती नहीं।

बरसों पहले, जब कैलिफ़ोर्निया में मैंने चार आर्य सत्यों पर अपना पहला सेमिनार किया था, तो चौथे सत्य पर पहुँचने से पहले हमें तीसरे सत्य—यानी ‘दुख के अंत’—पर बात करनी थी। हमने इस पर थोड़ी चर्चा की, फिर चौथे सत्य पर आए। जब बात ध्यान की उस गहरी अवस्था पर पहुँची जहाँ पूरे शरीर में एक असीम आनंद और सुकून महसूस होता है, तो कई लोग बोल पड़े, “महाराज, इस मंज़िल से तो यह रास्ता ही ज़्यादा मज़ेदार लग रहा है!”

जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि अभी हम रास्ते के इस पार खड़े हैं। हमने अभी सफ़र पूरा नहीं किया है, हम मंज़िल तक पहुँचे नहीं हैं। बुद्ध इसीलिए कहते हैं कि अभी से कोई फैसला मत सुनाओ, क्योंकि अभी तुम चीज़ों को अपनी धुंधली आँखों से देख रहे हो।

हम जिस दुनिया में जी रहे हैं, वहाँ कदम-कदम पर दुख है। इसीलिए हमारा दिमाग हमेशा भाग-दौड़ में लगा रहता है कि इस दुख से कैसे बचें। हम हमेशा नफ़े-नुकसान का हिसाब लगाते रहते हैं—“अगर मैं इतनी मेहनत कर रहा हूँ, तो बदले में मुझे क्या मिलेगा?” जब हमें लगता है कि मेहनत का फल मीठा है, तभी हमें अपनी ज़िंदगी सार्थक लगती है।

लेकिन निर्वाण में ऐसा कोई गुणा-भाग नहीं है। वहाँ कोई हलचल नहीं है, कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है। इसलिए वहाँ इस बात का कोई हिसाब ही नहीं लगाना पड़ता कि कितनी मेहनत की और क्या मिला। वहाँ पहुँचकर ‘सार्थकता’ या ‘मतलब’ जैसे सवाल ही बेमानी हो जाते हैं।

अब इस पार बैठकर जब हम ऐसी बातें सुनते हैं, तो लगता है कि यार, यह तो बड़ी सूनी और उबाऊ चीज़ होगी। लेकिन बुद्ध ने साफ़ कहा था कि अगर तुम निर्वाण के बारे में ज़रा भी नकारात्मक सोचते हो, तो तुम्हारी समझ ही ग़लत है। इसलिए अपनी राय को अभी थामकर रखो। बस इतना मानकर चलो कि दुख का पूरी तरह से मिट जाना एक कमाल की बात होगी—एक बेहद ख़ूबसूरत चीज़। जब वहाँ पहुँच जाओगे, तो खुद अपनी आँखों से देख लेना।

बुद्ध का कहना था कि उनका काम तुम्हें उस पार तक का रास्ता दिखाना है। वहाँ पहुँचने के बाद तुम पूरी तरह आज़ाद हो—जो जी में आए करो। एक बार जब तुमने ज़िंदगी की इस सबसे बड़ी गुत्थी को सुलझा लिया, तो तुम उस पार से, एक बिल्कुल नई नज़र से चीज़ों को देखोगे और तब अपना फ़ैसला खुद करोगे।

आराम की लत और संसार का जाल

लेकिन इस पार रहते हुए हमें एक बात का बड़ा ध्यान रखना होगा। कभी-कभी जब ज़िंदगी में थोड़ी सुख-सुविधा आ जाती है, तो हम बड़े आलसी हो जाते हैं। इस संसार की यही तो सबसे बड़ी विडंबना है। हम दिन-रात एक करके ऐश-ओ-आराम की चीज़ें जुटाते हैं, और जैसे ही आराम मिलता है, हम चैन की बंशी बजाकर सो जाते हैं। इसके लिए स्वर्ग जाने की ज़रूरत नहीं है, अपने आस-पास इंसानों को ही देख लो। इंसानों को छोड़ो, गली के कुत्तों को देख लो—पेट भरा हो तो ऐसे पसर कर सो जाते हैं जैसे ज़िंदगी में इससे बड़ा कोई काम ही न बचा हो।

इंसानों में भी यही होता है; जैसे ही हम आलसी और बेपरवाह होते हैं, वे अच्छे गुण घटने लगते हैं जिनकी बदौलत हम इस सुखी मुकाम तक पहुँचे थे।

स्वर्ग की दुनिया में तो यह खेल और भी साफ़ दिखता है। ज़रा सोचो, वहाँ क्या माहौल होगा—जो चाहा, पलक झपकते ही सामने हाज़िर! ऐसी ज़िंदगी किसी का भी मिज़ाज बिगाड़ देगी। इंसान आलसी हो जाता है, नखरेबाज़ हो जाता है और समझने लगता है कि सब कुछ मुफ्त में मिलना उसका हक़ है।

पर यह ठाठ-बाट हमेशा नहीं रहने वाला। जब पुण्य कर्मों का बैंक बैलेंस ख़त्म होता है, तो धड़ाम से नीचे गिरना पड़ता है। यही वजह है कि जब बुद्ध गृहस्थ लोगों को चार आर्य सत्य समझाते थे, तो शुरुआत दान-पुण्य और अच्छे आचरण (शील) की भलाई से करते थे। वो बताते थे कि इन चीज़ों का अपना एक मोल है।

लेकिन जब इन अच्छे कामों का फल मिलता है, तो लोग स्वर्ग पहुँच जाते हैं। वहाँ जाकर वे मजे में डूब जाते हैं, लापरवाह होते हैं और फिर उनका पतन हो जाता है।

इसीलिए बुद्ध इसके बाद ‘इंद्रियों के सुख’ की कमियों और उनकी खोखली सच्चाई को उजागर करते थे, ताकि लोगों को समझ आए कि इन बंधनों से छूटना (“नेक्खम्म”) कितनी बड़ी बात है। ‘त्याग’ का मतलब यह नहीं कि आप सारे सुख छोड़ दें। इसका सीधा सा मतलब है कि आप ऐसा आनंद ढूँढें जो इन बाहरी भोग-विलास से परे हो। मन को उस गहरे सुकून का स्वाद चखाएँ जो वासनाओं और बुरे विचारों से दूर रहने पर मिलता है।

जैसे अभी हम अपनी ‘साँस’ पर ध्यान लगा रहे हैं। साँस लेने-छोड़ने में कोई वासना या भोग नहीं है। शारीरिक रूप से यह बहुत अच्छा महसूस करा सकती है, लेकिन बुद्ध इसे ‘सेंसुअलिटी’ नहीं कहते। सेंसुअलिटी तो वो मानसिक खुजली है जिसमें हम घंटों ख्याली पुलाव पकाते रहते हैं—“ऐसा मिल जाए तो मज़ा आ जाए, नहीं-नहीं, वैसा होता तो और अच्छा होता।” हम मन ही मन भोग-विलास की कहानियाँ गढ़ते रहते हैं।

यहाँ हम मन को इस काल्पनिक दुनिया से आज़ाद करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि हमें पता है कि आज नहीं तो कल यह हमें नीचे गिरा देगी। हम इस बात पर ध्यान लगा रहे हैं कि शरीर के भीतर का अहसास कैसा है—साँस की ऊर्जा कैसी चल रही है, शरीर की गर्मी-सर्दी, उसका भारीपन या हल्कापन कैसा है। अपने भीतर के इस वजूद को महसूस करो और यहीं आनंद ढूँढो, क्योंकि इस आनंद से मन के अच्छे गुण कभी ख़राब नहीं होते।

चार आर्य सत्य और इस खेल का अंत

जब आप इस नज़रिए से देखना शुरू करते हैं, तब बुद्ध चार आर्य सत्यों की शिक्षा देते हैं। अब आपको समझ आता है कि अगर मन को एक ऐसा सुख मिल जाए जिससे किसी का रत्ती भर भी नुकसान न हो और जिसका कोई बुरा नतीजा न निकले, तो उससे बेहतर और क्या ही होगा! चार आर्य सत्य इसी बारे में हैं।

बौद्ध धर्म जब पश्चिमी देशों में गया, तो वहाँ के लोगों ने रोना रोना शुरू कर दिया कि बुद्ध तो बड़े निराशावादी (दुःखवादी) थे, हर समय दुख-दुख-दुख की रट लगाए रहते थे—चारों के चारों सत्य दुख पर ही बना दिए!

अरे भाई, उन्होंने सिर्फ दुख की बात नहीं की। दूसरा सत्य बताता है कि दुख की वजह क्या है। तीसरा सत्य बताता है कि दुख का अंत मुमकिन है। और चौथा सत्य वो रास्ता दिखाता है जिस पर चलकर दुख को हमेशा के लिए ख़त्म किया जा सकता है। अगर यह रास्ता न हो, तो हमारे पास बचेगा ही क्या? वही पुराना ढर्रा—वही थोड़े समय का सुख और उसके पीछे-पीछे आने वाला अंतहीन दुख।

जब आप इस चक्र को बार-बार चलते देखते हैं, तो ज़िंदगी की तथाकथित ‘सार्थक’ चीज़ें भी बेमानी लगने लगती हैं। आप अपने माता-पिता की सेवा करते हैं ताकि उनके उपकारों का बदला चुका सकें, लेकिन फिर वो चले जाते हैं, आप भी चले जाते हैं, और सब बिछड़ जाते हैं। अगले जन्म में आपको नए माता-पिता मिलते हैं, आप फिर वही कोशिश करते हैं, फिर बिछड़ जाते हैं।

यह सिलसिला बिना रुके अनंत काल से चला आ रहा है। ज़रा पीछे मुड़कर सोचिए—अनंत काल पहले जो आपके माता-पिता थे, वे आज कहाँ हैं? उस रिश्ते का आज क्या मोल रह गया है? जो चीज़ें बहुत पास से देखने पर बड़ी सार्थक लगती हैं, जब आप उन्हें एक बड़ी दूरी से देखते हैं, तो वे अपनी अहमियत खोने लगती हैं।

ये जो बार-बार बनने और उजड़ने का खेल है—आप कुछ खड़ा करते हैं, और वक्त उसे मिटा देता है; फिर खड़ा करते हैं, फिर मिट जाता है—इसके बारे में सोचना ज़रूरी है।

खासकर तब, जब ज़िंदगी बड़ी आराम से कट रही हो। यहाँ तक कि जो लोग इस आध्यात्मिक रास्ते पर थोड़े आगे बढ़ चुके हैं (जैसे स्रोतापन्न), उनके भीतर भी ढिलाई आ सकती है। भले ही वे सुरक्षित हैं और ज़्यादा से ज़्यादा सात जन्मों में मुक्त हो जाएँगे, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि तब तक उन्हें कोई कष्ट ही नहीं झेलना पड़ेगा।

इसलिए ‘अप्रमाद’ यानी सतर्कता और सावधानी को कभी मत छोड़ो। अपने हर कदम के दूरगामी नतीजों के बारे में सोचो। ज़रा याद करो कि आज आप जहाँ हैं, वहाँ पहुँचने के लिए आपने कितनी मेहनत की थी। और आज जब यह अमूल्य मानव जीवन मिला है, तो आप इसका क्या कर रहे हैं? क्या इसे फालतू की चीज़ों में गँवा रहे हैं? अपने गुज़रे हुए कल के उस ‘आप’ पर थोड़ी तरस खाइए जिसने आज के ‘आपको’ यह जीवन दिलाने के लिए इतनी कड़ी मेहनत की थी। आज आपके पास धर्म को जानने और उसका अभ्यास करने का सुनहरा मौक़ा है। यह अवसर हाथ से न जाने पाए।

वह स्वतंत्रता, जो बयानों से परे है

रही बात इस दुख के पूरी तरह मिट जाने की, तो जब ऐसा सच में होगा, तो आपकी पूरी सोच ही बदल जाएगी। अभी हमारी ज़िंदगी का मतलब क्या है? “मैंने बहुत मेहनत की, बहुत दर्द सहा, लेकिन जो मिला वो उस लायक था।” लेकिन ज़रा सोचिए, अगर कोई ऐसी चीज़ मिल जाए जिसके बाद किसी मेहनत की ज़रूरत ही न रहे, जिसमें ज़रा भी दर्द न हो, जिसे सँभालने या मरम्मत करने की कोई चिंता ही न हो—जो बस अपने आप में पूर्ण हो… तो क्या आपको फिर किसी ‘मतलब’ या ‘सार्थकता’ की तलाश रहेगी?

एक बार जब मैं यूरोप में था, तो मैंने किसी दूसरे पंथ के गुरु की किताब पढ़ी। वे लिख रहे थे कि तीसरा आर्य सत्य (दुख का निरोध) कुछ और नहीं, बस हमारी सामान्य जागरूकता है—जहाँ कोई सोच-विचार न हो, बस जो हो रहा है उसे चुपचाप देखते रहो। उन्होंने आगे लिखा कि इस ‘तीसरे सत्य’ में बस एक ही गड़बड़ है कि यह बहुत उबाऊ है।

अब भला यह भी कोई बात हुई! निर्वाण जैसी परम स्थिति में पहुँचकर कोई बोर कैसे हो सकता है? वहाँ बोर होने का समय ही नहीं है, क्योंकि वहाँ आप समय और स्थान के दायरे से ही बाहर निकल चुके होते हैं।

लेकिन जहाँ कुछ करना न पड़े, जहाँ कोई दुख न हो—वह स्थिति कैसी होगी, यह हमारी कल्पना से इतनी परे है कि हम इसका अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

इसीलिए बुद्ध ने कहा था कि इसके बारे में ख्याली पुलाव मत पकाओ, बल्कि इसे खुद महसूस करो। जो करना ज़रूरी है वो करो, वहाँ पहुँचो और फिर खुद तय करो। बुद्ध तो बस वहीं तक ले जाएँगे, उसके आगे आप पूरी तरह आज़ाद हैं। निर्वाण में कोई कैद नहीं होता, क्योंकि निर्वाण ही सबसे बड़ी और परम आज़ादी है।

इसलिए जब आप इस रास्ते पर चलें, तो अपने मूल्यों और प्राथमिकताओं को बदलने के लिए तैयार रहें। यह साधना आपके भीतर उन संभावनाओं के द्वार खोल देगी जो पहले कभी खुले ही नहीं थे। हम यहाँ किसी पुराने सीधे-सादे बचपन या समाज के बंधनों से पहले की किसी मासूमियत की तरफ़ वापस नहीं लौट रहे हैं। बुद्ध ने साफ़ कहा था कि हम वो हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं जो आज तक हासिल नहीं हुआ, उस मुकाम को पाने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ हम आज तक पहुँचे ही नहीं। यह अनुभव पूरी तरह से अनूठा और क्रांतिकारी होगा।

और इतिहास गवाह है, आज तक जो कोई भी वहाँ पहुँचा है, उसे इस रास्ते पर चलने का कभी कोई मलाल नहीं हुआ। इसलिए अपने मन को इस अनंत संभावना के लिए खुला रखिए।

साथ ही, मन को संकीर्ण रखने के खतरों को भी पहचानिए। बुद्ध ने कहा था कि सारी अच्छाई और समझदारी सजग रहने (अप्रमाद) से ही जनमती है। ऐसा नहीं है कि हम पैदाइशी बहुत भले हैं। हम कुछ समय के लिए अच्छे रह सकते हैं, लेकिन जैसे ही परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं, हमारा अच्छा व्यवहार बदलते देर नहीं लगती। यह समझिए कि आप जहाँ खड़े हैं, वो ज़मीन बहुत कच्ची और डाँवाडोल है; जबकि इस रास्ते पर चलकर आपको एक ऐसी परम स्थिरता और सुरक्षा मिल सकती है जो कभी नहीं डिगेगी।

बस, पूरे समर्पण और पूरी सजगता के साथ इस रास्ते को अपने दिल और दिमाग में उतर जाने दीजिए।

आगे क्या पढ़ें?

इसी विषय पर हमारी मार्गदर्शिका का यह लेख पढ़ें:

निर्वाण का खौफ़

थानिस्सरो भिक्खु

पूज्य गुरुजी थानिस्सरो भिक्खु

आप एक प्रतिष्ठित थेरवादी भिक्षु और ध्यानसाधना के आचार्य हैं, जिन्हें स्नेहपूर्वक “अजान जेफ़” के नाम से भी जाना जाता है। आप अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया स्थित “मेत्ता अरण्य विहार” (Metta Forest Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने गहन ध्यान साधना, धर्म-विनय के अनुशासित पालन, और प्राचीन पाली सूत्रों के अध्ययन व शिक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाया है।

धर्म और विनय पर आपकी गहरी पकड़ और तर्कसम्मत व्याख्यानों से दुनियाभर के भिक्षु और साधक प्रेरित हुए हैं। आपने सुत्तपिटक और विनयपिटक के अधिकांश सूत्रों का अंग्रेज़ी में सरल व सटीक अनुवाद किया है, जिससे पाली बौद्ध सूत्रों की मौलिकता और गहराई जनसामान्य तक सहज रूप से पहुँच सके। आपके ध्यान और बौद्ध दर्शन पर दिए गए प्रवचन आधुनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं, जिससे असंख्य साधकों को आध्यात्मिक दिशा मिली है।

आपका योगदान धम्मदीप.com से जुड़े सभी भिक्षुओं के आध्यात्मिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण रहा है, और आप ही इस मंच के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। आप की शिक्षाएँ और अनुवाद dhammatalks.org पर अँग्रेजी में निःशुल्क उपलब्ध हैं।

आप के लेखों को हिन्दी में यहाँ पढ़ा जा सकता हैं।

इस प्रवचन को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: Nibbana Is Better than You Think