✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
शांति मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

शांति पर

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सवाल: शांति कैसी होती है?

जवाब: उलझन क्या होती है? खैर, शांति बस उलझनों का ख़त्म हो जाना है।

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शांति इंसान के अपने ही भीतर उसी जगह मिलती है, जहाँ बेचैनी और दुख होते हैं। यह किसी जंगल या पहाड़ की चोटी पर नहीं मिलती, न ही कोई गुरु तुम्हें यह दे सकता है। जहाँ तुम दुख महसूस करते हो, ठीक वहीं तुम्हें दुखों से आज़ादी भी मिल सकती है। दुखों से भागने की कोशिश करना, असल में दुखों की तरफ़ ही भागना है।

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अगर तुम थोड़ा छोड़ोगे, तो तुम्हें थोड़ी शांति मिलेगी। अगर तुम ज़्यादा छोड़ोगे, तो तुम्हें ज़्यादा शांति मिलेगी। अगर तुम पूरी तरह छोड़ दोगे, तो तुम्हें पूरी (परम) शांति मिल जाएगी।

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सच तो यह है कि इंसानों के भीतर असल में कुछ भी ‘स्थायी’ नहीं है। हम जो कुछ भी हैं, वह सिर्फ़ ‘दिखावे’ की दुनिया (माया) है। लेकिन अगर हम इस दिखावे के पार जाकर सच को देखें, तो हम पाएंगे कि वहाँ ‘कुदरत के नियमों’ के सिवा और कुछ नहीं है— शुरुआत में जन्म, बीच में बदलाव, और आख़िर में अंत। बस यही है जो सच है। अगर हम यह देख लें कि हर चीज़ बस ऐसी ही है, तो कोई परेशानी ही खड़ी नहीं होगी। अगर हम यह समझ लें, तो हमें संतोष और गहरी शांति मिल जाएगी।

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यह जानो कि क्या अच्छा है और क्या बुरा, चाहे तुम सफ़र कर रहे हो या एक जगह टिक कर रह रहे हो। तुम किसी पहाड़ या गुफ़ा में शांति नहीं ढूँढ सकते। तुम उस जगह भी चले जाओ जहाँ बुद्ध को ज्ञान मिला था, तो भी तुम सच के करीब नहीं पहुँच पाओगे, जब तक कि तुम अपने भीतर न झाँको।

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ख़ुद के बाहर ढूँढना सिर्फ़ तुलना करना और भेद करना है। उस रास्ते पर तुम्हें कभी खुशी नहीं मिलेगी। और अगर तुम अपना ज़्यादातर वक़्त एक ‘परफेक्ट’ इंसान या ‘परफेक्ट’ गुरु ढूँढने में बिता दोगे, तो भी तुम्हें शांति नहीं मिलेगी। बुद्ध ने हमें ‘धम्म’ और ‘सच’ को देखने के लिए कहा था, न कि दूसरे लोगों को।

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लकड़ी और ईंटों से घर तो कोई भी बना सकता है, पर बुद्ध ने हमें सिखाया कि उस तरह का घर हमारा असली घर नहीं है। वह इस दुनिया का घर है और दुनिया के ही तौर-तरीकों पर चलता है। हमारा असली घर हमारे ‘भीतर की शांति’ है।

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जंगल शांत है, पर तुम क्यों नहीं हो? तुम उन चीज़ों को पकड़ कर बैठे हो जो तुम्हारी उलझनों की वजह हैं। कुदरत को तुम्हें सिखाने दो। पक्षी का गाना सुनो और फिर उसे गुज़र जाने दो। अगर तुम कुदरत को जान लोगे, तो तुम धम्म को जान लोगे। अगर तुम धम्म को जान लोगे, तो तुम कुदरत को जान लोगे।

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शांति की तलाश करना ऐसा है जैसे ‘मूँछों वाले कछुए’ को ढूँढना। तुम उसे कभी नहीं ढूँढ पाओगे। लेकिन जब तुम्हारा दिल तैयार होगा, तो शांति ख़ुद तुम्हें ढूँढती हुई तुम्हारे पास आएगी।

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शील, समाधि और प्रज्ञा मिलकर वह ‘रास्ता’ बनाते हैं। पर यह रास्ता अभी वह सच्ची सीख नहीं है, वह नहीं है जो गुरु सच में तुम्हें देना चाहता है; यह तो बस वह ‘रास्ता’ है जो तुम्हें वहाँ तक ले जाएगा।

मिसाल के तौर पर, मान लो तुम बैंकॉक से वट पा पोंग के लिए निकले। तुम्हारे सफ़र के लिए वह सड़क ज़रूरी थी, पर तुम्हारी मंज़िल वट पा पोंग (मठ) थी, न कि वह सड़क। इसी तरह, हम कह सकते हैं कि शील, समाधि और प्रज्ञा बुद्ध के उस परम सत्य के ‘बाहर’ हैं, पर ये वो सड़क हैं जो उस सच तक ले जाती हैं। जब तुम इन तीनों को अपने भीतर जगा लेते हो, तो उसका नतीजा एक बहुत ही अद्भुत शांति होता है।