✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
गुरु मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

गुरु पर

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तुम ख़ुद अपने गुरु हो। गुरुओं को ढूँढने से तुम्हारे अपने शक दूर नहीं हो सकते। सच को ढूँढने के लिए ख़ुद के भीतर झाँको— बाहर नहीं। ख़ुद को जानना ही सबसे ज़रूरी है।

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मेरे एक गुरु बहुत तेज़-तेज़ खाते थे। खाते वक़्त उनके मुँह से आवाज़ें भी आती थीं। पर वे हमें हमेशा धीरे-धीरे और पूरे होश में खाने की सीख देते थे। मैं उन्हें देखता और बहुत परेशान होता था। मैं दुखी था, पर वे नहीं थे! मैं सिर्फ़ ‘बाहर’ देख रहा था।

बाद में मैंने जाना कि कुछ लोग बहुत तेज़ गाड़ी चलाते हैं पर बहुत संभल कर; जबकि कुछ धीरे चलाते हैं पर फिर भी कई एक्सीडेंट कर बैठते हैं। नियमों या बाहरी दिखावे से मत चिपक कर रहो। अगर तुम अपना दस फ़ीसदी वक़्त दूसरों को देखने में और नब्बे फ़ीसदी वक़्त ख़ुद को देखने में लगाते हो, तो तुम्हारी साधना ठीक चल रही है।

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शिष्यों को सिखाना बहुत मुश्किल है। कुछ ऐसे होते हैं जो सब जानते हैं, पर साधना करने की ज़हमत नहीं उठाते। कुछ ऐसे हैं जो नहीं जानते, और जानने की कोशिश भी नहीं करते। मुझे समझ नहीं आता कि उनका क्या करूँ। आख़िर इंसानों का मन ऐसा क्यों होता है? नासमझ बने रहना अच्छी बात नहीं है, पर मैं उन्हें बताता भी हूँ, तो भी वे नहीं सुनते।

लोग अपनी साधना को लेकर इतने शकों से भरे होते हैं। वे हमेशा शक करते हैं। वे ‘निर्वाण’ तो पाना चाहते हैं, पर उस रास्ते पर चलना नहीं चाहते। यह बहुत हैरान करने वाली बात है। जब मैं उन्हें ध्यान करने को कहता हूँ, तो वे डर जाते हैं, और अगर डरते नहीं, तो बस ऊंघने लगते हैं। ज़्यादातर वे वही सब करना पसंद करते हैं जो मैं नहीं सिखाता। एक गुरु होने का यही तो दर्द है।

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अगर हम बुद्ध की सीख का सच इतनी आसानी से देख पाते, तो हमें इतने सारे गुरुओं की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। जब हम सीख को समझ लेते हैं, तो हम बस वही करते हैं जो हमसे कहा जाता है। पर लोगों को सिखाना इतना मुश्किल इसलिए हो जाता है क्योंकि वे सीख को अपनाते नहीं हैं और गुरु और उसकी सीख से ही बहस करने लगते हैं। गुरु के सामने वे थोड़ा सलीके से पेश आते हैं, पर उसकी पीठ पीछे वे फिर से चोर बन जाते हैं! लोगों को सिखाना सच में बहुत मुश्किल काम है।

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मैं अपने शिष्यों को लापरवाही से जीना या साधना करना नहीं सिखाता। पर जब मैं आसपास नहीं होता, तो वे ठीक यही करते हैं। जब तक पुलिसवाला सामने होता है, चोर सीधे बने रहते हैं। जब वह पूछता है कि क्या आस-पास कोई चोर है, तो बेशक सब कहते हैं कि यहाँ कोई चोर नहीं है; उन्होंने तो कभी कोई चोर देखा ही नहीं। पर जैसे ही पुलिसवाला जाता है, वे फिर से अपने पुराने काम में लग जाते हैं। बुद्ध के समय में भी ऐसा ही था। इसलिए बस ख़ुद पर नज़र रखो और इस बात की फिक्र मत करो कि दूसरे क्या कर रहे हैं।

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एक सच्चा गुरु हमेशा ‘ख़ुद को मिटाने’ या ‘मैं’ (अहंकार) को छोड़ने की उस मुश्किल साधना के बारे में ही बात करेगा। चाहे जो हो जाए, अपने गुरु का साथ मत छोड़ना। उसे तुम्हारा रास्ता दिखाने दो, क्योंकि रास्ते को भूल जाना बहुत आसान है।

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अपने गुरु को लेकर तुम्हारे मन में उठने वाले शक तुम्हारी मदद कर सकते हैं। अपने गुरु से वह ले लो जो अच्छा है, और अपनी ख़ुद की साधना के प्रति सजग रहो। अपनी समझ को परखना और उसे बढ़ाना तुम्हारे ख़ुद के हाथ में है।

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सिर्फ़ इसलिए गुरु की बात मत मान लो कि वह कह रहा है कि कोई फल बहुत मीठा और मज़ेदार है। उसे ख़ुद चख कर देखो और तब तुम्हारे सारे शक ख़त्म हो जाएंगे।

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गुरु वो होते हैं जो रास्ते की दिशा दिखाते हैं। गुरु को सुनने के बाद, हम ख़ुद उस रास्ते पर चलकर साधना करते हैं या नहीं, और उस साधना का फल पाते हैं या नहीं— यह पूरी तरह से हम में से हर एक पर निर्भर करता है।

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कभी-कभी सिखाना एक बहुत भारी काम बन जाता है। एक गुरु ‘कचरे के उस डिब्बे’ की तरह होता है जिसमें लोग अपनी सारी कुंठाएं और परेशानियां फेंकते रहते हैं। तुम जितने ज़्यादा लोगों को सिखाओगे, तुम्हारे पास कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या उतनी ही बढ़ती जाएगी। पर सिखाना, धम्म की साधना करने का एक बहुत ही कमाल का तरीका है। जो लोग सिखाते हैं, उनके भीतर का सब्र और उनकी समझ भी उतनी ही गहरी होती जाती है।

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एक गुरु असल में हमारी सारी उलझनें नहीं सुलझा सकता। वह बस रास्ते को खोजने का एक ज़रिया है। वह उसे पूरी तरह साफ नहीं कर सकता। सच कहूँ तो, वह जो कहता है, वह सुनने लायक भी नहीं होता। बुद्ध ने कभी दूसरों पर यकीन करने की तारीफ नहीं की। हमें ख़ुद पर यकीन करना होगा। हाँ, यह मुश्किल ज़रूर है, पर असलियत यही है। हम हमेशा बाहर देखते हैं, पर कभी ‘सच’ नहीं देख पाते। हमें तय करना होगा कि हम सच में साधना करेंगे। शक दूसरों से पूछने से नहीं मिटते, बल्कि हमारी अपनी कभी न रुकने वाली साधना से मिटते हैं।