✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
समझ और प्रज्ञा मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

प्रज्ञा पर

136

तुम्हारी अपनी समझ के सिवा, कोई इंसान या कोई चीज़ तुम्हें आज़ाद नहीं कर सकती।

137

एक पागल आदमी और एक ‘अर्हत’ (परम ज्ञानी) दोनों मुस्कुराते हैं, लेकिन अर्हत जानता है कि वह क्यों मुस्कुरा रहा है, जबकि पागल नहीं जानता।

138

एक चालाक आदमी दूसरों पर नज़र रखता है, लेकिन वह अपनी समझ (ज्ञान) के साथ देखता है, नासमझी (अज्ञानता) के साथ नहीं। अगर कोई समझ के साथ देखे, तो वह बहुत कुछ सीख सकता है। पर अगर कोई नासमझी के साथ देखे, तो वह सिर्फ़ कमियाँ ही ढूँढता रह जाएगा।

139

आजकल लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे जानते तो हैं, पर फिर भी उस पर अमल नहीं करते। अगर कोई इसलिए कुछ नहीं करता क्योंकि वह जानता नहीं है, तो यह दूसरी बात है। पर अगर वे पहले से जानते हैं और फिर भी नहीं करते, तो फिर इसमें क्या किया जा सकता है?

140

किताबों या धर्मग्रंथों का बाहरी ज्ञान कोई अहमियत नहीं रखता। बेशक, धम्म की किताबों में जो लिखा है वह ‘सही’ है, पर वे सच में ‘सही’ नहीं हैं। वे तुम्हें सच्ची समझ नहीं दे सकतीं। पन्नों पर छपा “गुस्सा” शब्द पढ़ना और असल में ‘गुस्सा’ महसूस करना— दोनों एक बात नहीं है। सिर्फ़ ख़ुद से महसूस करके ही तुम सच्चा विश्वास हासिल कर सकते हो।

141

अगर तुम चीज़ों को सच्ची अंतर्दृष्टि (विपश्यना) के साथ देखते हो, तो उनसे जुड़ने में कोई ‘चिपचिपाहट’ (लगाव) नहीं होती। चीज़ें आती हैं— अच्छी और बुरी दोनों— तुम उन्हें देखते हो, और उनसे कोई मोह नहीं होता। वे आती हैं और गुज़र जाती हैं। यहाँ तक कि अगर सबसे बुरे विकार भी उभर आएं, जैसे लालच या गुस्सा, तो भी तुम्हारे भीतर इतनी समझ होती है कि तुम उनकी ‘नश्वरता’ (कि वे टिकने वाले नहीं हैं) को देख सको और उन्हें धीरे-धीरे धुंधला होकर मिट जाने दो। पर अगर तुम उनके प्रति ‘पसंद’ या ‘नापसंद’ दिखाकर प्रतिक्रिया करते हो, तो वह समझ (प्रज्ञा) नहीं है। तुम बस अपने लिए और ज़्यादा दुख पैदा कर रहे हो।

142

जब हम सच को जान लेते हैं, तो हम ऐसे लोग बन जाते हैं जिन्हें बहुत ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती, हम ज्ञान (प्रज्ञा) वाले लोग बन जाते हैं। अगर हम सच नहीं जानते, तो हमारे पास ज्ञान से ज़्यादा सोच (विचार) होते हैं, या फिर कोई ज्ञान होता ही नहीं। ज्ञान के बिना बहुत ज़्यादा सोचना एक भयंकर दुख है।

143

आजकल लोग सच की तलाश नहीं करते। लोग बस इतना ज्ञान पाने के लिए पढ़ते हैं जिससे वे गुज़ारा कर सकें, अपना परिवार पाल सकें और अपनी देखभाल कर सकें, बस इतना ही। उनके लिए ‘समझदार’ (ज्ञानी) होने से ज़्यादा ‘चालाक’ होना अहम हो गया है।