✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
शील मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

शील पर

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अपने शील (नियमों) का पालन करने में सावधान रहो। शील असल में कुछ गलत करने की ‘शर्म’ (हया) का नाम है। जिस बात पर हमें शक हो; उसे न तो हमें करना चाहिए और न ही कहना चाहिए। यही शील है। ‘पवित्रता’ का मतलब है हर तरह के शकों के पार चले जाना।

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साधना के दो स्तर होते हैं। पहला स्तर नींव रखता है, जो कि शील और नियमों का विकास है, ताकि लोगों के बीच खुशी और सद्भाव बना रहे। दूसरा स्तर धम्म की वह साधना है जिसका इकलौता मकसद दिल को आज़ाद करना है। यही आज़ादी ‘समझ’ (प्रज्ञा) और ‘करुणा’ का सोता है, और यही बुद्ध की सीख का असली मकसद है। इन दोनों स्तरों को समझना ही सच्ची साधना की बुनियाद है।

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शील (सदाचार) और नैतिकता हमारे भीतर पनप रहे धम्म के माता-पिता की तरह हैं। वे उसे सही खुराक देते हैं और सही रास्ता दिखाते हैं।

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शील एक ऐसी दुनिया की बुनियाद है जहाँ लोग आपस में प्यार से रह सकें, सच्चे इंसानों की तरह, न कि जानवरों की तरह। शील को अपने भीतर जगाना ही हमारी साधना का दिल है। नियमों (पंचशील) का पालन करो। हर तरह की ज़िंदगी के लिए करुणा और सम्मान जगाओ। अपने कामों और अपनी बोली में पूरे होश में रहो। अपने जीवन को सीधा और पवित्र बनाने के लिए शील का इस्तेमाल करो। जब तुम्हारे हर काम की बुनियाद शील होगी, तो तुम्हारा मन दयालु, साफ़ और शांत हो जाएगा। इस माहौल में ‘ध्यान’ बहुत आसानी से पनपेगा।

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अपने शील की देखभाल ऐसे करो जैसे कोई माली अपने पौधों की करता है। क्या बड़ा है या क्या छोटा, क्या ज़रूरी है या क्या गैर-ज़रूरी— इन बातों से मत चिपको। कुछ लोग छोटा रास्ता (शॉर्टकट) ढूँढते हैं। वे कहते हैं, “समाधि को छोड़ो, हम सीधे विपश्यना की तरफ़ जाएँगे; शील को छोड़ो, हम सीधे ‘समाधि’ से शुरुआत करेंगे।” हमारे पास अपने लगाव और आदतों को सही ठहराने के कितने सारे बहाने हैं न!

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सम्यक व्यायाम और शील इस बात पर निर्भर नहीं करते कि तुम बाहर से क्या कर रहे हो, बल्कि इस बात पर करते हैं कि तुम भीतर से लगातार कितने सजग हो और ख़ुद पर कितना काबू रखते हो। इसी तरह, ‘दान’ अगर अच्छी नीयत से दिया जाए, तो वह ख़ुद को और दूसरों को खुशी दे सकता है। पर दान के पूरी तरह पवित्र होने के लिए, उसकी जड़ में शील का होना बहुत ज़रूरी है।

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बुद्ध ने हमें सिखाया कि जो बुरा है उससे दूर रहो, अच्छे काम करो, और अपने दिल को साफ़ करो। तो हमारी साधना का मतलब हुआ— जो बेमानी है उसे निकाल फेंकना और जो कीमती है उसे सँभाल कर रखना। क्या अब भी तुम्हारे दिल में कुछ बुरा या ग़लत बचा है? बेशक बचा होगा! तो फिर घर की सफ़ाई क्यों नहीं करते?

पर सच्ची साधना सिर्फ़ बुरे को निकाल फेंकना और अच्छे को अपनाना ही नहीं है। यह तो बस उसका एक हिस्सा है। आख़िर में हमें अच्छे और बुरे, दोनों के ही पार जाना होगा। अंत में एक ऐसी आज़ादी है जिसमें सब कुछ समा जाता है, एक ऐसी ‘इच्छारहित’ अवस्था जहाँ से प्यार और ज्ञान अपने आप किसी झरने की तरह फूट पड़ते हैं।

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हमें ठीक वहीं से और उसी वक़्त शुरुआत करनी होगी जहाँ हम अभी खड़े हैं, एकदम सीधे और सरल तरीके से। जब साधना के पहले दो कदम— ‘शील’ और ‘सम्यक दृष्टि’— पूरे हो जाते हैं, तो तीसरा कदम, यानी ‘विकारों को जड़ से उखाड़ फेंकना’, बिना किसी कोशिश के ख़ुद-ब-ख़ुद होने लगता है। जब रोशनी आ जाती है, तो हम अँधेरे को दूर करने की फ़िक्र नहीं करते, न ही यह सोचते हैं कि अँधेरा कहाँ चला गया। हम बस इतना जानते हैं कि अब यहाँ रोशनी है।

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नियमों (शील) को मानने के तीन स्तर होते हैं। पहला— उन्हें उस तरह मानना जैसे गुरुओं ने हमें सिखाया हो। दूसरा— जब हम उन्हें ख़ुद अपने भीतर उतार लेते हैं और उनके हिसाब से जीने लगते हैं। लेकिन जो सबसे ऊँचे स्तर पर हैं, जो ‘आर्य’ बन चुके हैं, उनके लिए शील या सही-ग़लत की बात करने की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती। उनका यह सच्चा शील उस प्रज्ञा से पैदा होता है जो दिल में ‘चार आर्य सत्यों’ को जान चुका होता है और उसी समझ के साथ हर काम करता है।

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कुछ भिक्षु चीवर उतारकर युद्ध के मोर्चे पर चले जाते हैं जहाँ हर रोज़ उनके पास से गोलियाँ सनसनाती हुई गुज़रती हैं। उन्हें वही पसंद है। वे सच में वहाँ जाना चाहते हैं। ख़तरा चारों तरफ़ से उन्हें घेरे रहता है, फिर भी वे वहाँ जाने के लिए तैयार रहते हैं। वे उस ख़तरे को क्यों नहीं देख पाते? वे बंदूक की गोली से मरने को तो तैयार हैं, पर कोई भी शील (सदाचार) की राह पर चलकर अपने अहंकार को मारने को तैयार नहीं है। यह सच में कितनी अजीब बात है, है न?