11 अगर यह शरीर बोल पाता, तो यह हमें दिन भर यही कहता रहता, “पता है, तुम मेरे मालिक नहीं हो।”
सच कहूँ तो, यह हर वक्त हमसे यही कह रहा है, लेकिन इसकी भाषा ‘धम्म’ की है, जिसे हम समझ नहीं पाते।
12 परिस्थितियाँ हमारी नहीं होतीं। वे अपने ही कुदरती रास्ते पर चलती हैं। हम इस शरीर के स्वभाव का कुछ नहीं कर सकते। हम इसे थोड़ा सजा-संवार सकते हैं, कुछ वक्त के लिए साफ और सुंदर दिखा सकते हैं— उन जवान लड़कियों की तरह जो होठों पर रंग लगाती हैं और नाखून बढ़ाती हैं।
लेकिन जब बुढ़ापा आता है, तो हर कोई एक ही कतार में खड़ा होता है। शरीर का यही सच है। हम इसे बदल नहीं सकते। लेकिन जिस चीज़ को हम सच में संवार और खूबसूरत बना सकते हैं, वह है हमारा मन।
13 अगर यह शरीर सच में हमारा होता, तो यह हमारे हुक्म मानता। अगर हम कहें, “बूढ़े मत होना,” या “मैं तुम्हें बीमार पड़ने से रोकता हूँ,” तो क्या यह हमारी बात मानता है? नहीं! यह कोई ध्यान नहीं देता।
हमने इस “घर” को सिर्फ किराए पर लिया है, हम इसके मालिक नहीं हैं। अगर हम इसे अपना मान बैठे, तो इसे छोड़ते वक्त हमें ही तड़पना होगा।
लेकिन असलियत में, ‘स्थायी मैं’ जैसी कोई चीज़ नहीं है, ऐसा कुछ भी ठोस या न बदलने वाला नहीं है जिसे हम पकड़ कर रख सकें।
