✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
दिल और मन मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

दिल और मन पर

30

पढ़ने लायक बस एक ही किताब है— अपना खुद का मन।

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बुद्ध ने हमें सिखाया कि साधना करते वक्त जो चीज़ हमें सबसे ज्यादा बेचैन करती है, वही सीधे सही जगह पर चोट करती है। असल में बेचैनी मन की नहीं, मन के विकारों (कचरे) की होती है। हम मन और विकारों के बीच का फर्क ही नहीं जानते। जिस चीज़ से हमें खुशी नहीं मिलती, हम उससे दूर भागने लगते हैं।

ज़िंदगी जीना मुश्किल नहीं है। मुश्किल है हमारी असंतुष्टि, उस सच को स्वीकार न करना। हमारी असल मुश्किल हमारे अपने ही विकार हैं।

32

दुनिया अभी जैसे किसी तेज़ ज्वर में तप रही है। दुनिया की इस तपिश के साथ ही हमारा मन भी पसंद और नापसंद के बीच झूलता रहता है। अगर हम बस अपने मन को शांत करना सीख लें, तो यह दुनिया के लिए हमारी सबसे बड़ी मदद होगी।

33

अगर तुम्हारा मन खुश है, तो तुम जहाँ भी जाओगे, खुश ही रहोगे। जब तुम्हारे भीतर की समझ (प्रज्ञा) जाग जाती है, तो तुम जहाँ भी देखोगे, तुम्हें सिर्फ सच ही दिखाई देगा। क्योंकि सच के सिवा और कुछ है ही नहीं।

यह बिल्कुल वैसा है जैसे तुमने पढ़ना सीख लिया हो— एक बार पढ़ना आ गया, तो फिर तुम कहीं भी, कुछ भी पढ़ सकते हो।

34

अगर तुम्हें किसी एक जगह से घुटन होती है, तो तुम्हें हर जगह से घुटन होगी। क्योंकि परेशानी बाहर की उस जगह में नहीं है। वह परेशानी तुम्हारे ‘भीतर की जगह’ में है।

35

ज़रा अपने मन को तो देखो। जो बोझ ढो रहा है, उसे लगता है कि उसके पास बहुत कुछ है, लेकिन दूर से देखने वाला सिर्फ उस बोझ को देखता है। चीज़ों को फेंक दो, उन्हें छूट जाने दो, और फिर उस हल्केपन को महसूस करो।

36

मन अपने मूल रूप में बिल्कुल शांत है। इसी शांति में से बेचैनी और उलझनें पैदा होती हैं। अगर कोई इस उलझन को देख ले और समझ ले, तो मन एक बार फिर लौटकर उसी शांति में डूब जाता है।

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बौद्ध धर्म सिर्फ मन और दिल का धर्म है। बस और कुछ नहीं। जो अपने दिल को सँवारने की साधना करता है, असल में वही बौद्ध धर्म को जीता है।

38

जब रोशनी मद्धिम होती है, तो कमरे के कोनों में लगे पुराने जाले दिखाई नहीं देते। पर जब रोशनी तेज़ होती है, तो तुम उन्हें साफ-साफ देख पाते हो और हटा सकते हो। जब तुम्हारा मन पूरी तरह से जगमगा उठता है, तो तुम अपने भीतर के विकारों (मैलेपन) को भी साफ देख पाते हो, और उन्हें झाड़ कर मिटा सकते हो।

39

शरीर को मज़बूत करने के लिए उसे खूब दौड़ाना-भागना पड़ता है, पर मन को मज़बूत करने का तरीका बिल्कुल उल्टा है। मन को मज़बूत करने के लिए उसे एक जगह ठहराना पड़ता है, उसे विश्राम देना होता है।

40

लोग तरह-तरह के पाप और गलत काम इसलिए कर पाते हैं क्योंकि वे खुद को नहीं देखते। वे अपने ही मन में नहीं झाँकते।

जब लोग कुछ गलत करने जाते हैं, तो पहले इधर-उधर देखते हैं कि कोई देख तो नहीं रहा: “क्या मेरी माँ मुझे देख लेगी?” “क्या मेरा पति देख लेगा?” “क्या मेरे बच्चे देख लेंगे?” “क्या मेरी पत्नी देख लेगी?” अगर कोई नहीं देख रहा होता, तो वे बेझिझक वह काम कर गुज़रते हैं।

यह अपनी ही नज़रों में खुद का अपमान करना है। वे कहते हैं कि कोई नहीं देख रहा, इसलिए कोई देखे उससे पहले अपना गलत काम झटपट निबटा लें। पर उनका खुद का क्या? क्या जो भीतर से देख रहा है, वह ‘कोई’ नहीं है?

41

धम्म की सीख को अपने कानों से नहीं, अपने दिल से सुनो।

42

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने भीतर के विकारों से जंग लड़ते हैं और उन्हें जीत लेते हैं। इसे ‘भीतर की लड़ाई’ कहते हैं। जो बाहर लड़ते हैं, वे बम और बंदूकें उठाते हैं। वे दूसरों को हराते हैं और खुद भी हार जाते हैं। दूसरों को जीतना तो दुनिया का तरीका है।

धम्म के रास्ते पर हमें दूसरों से नहीं लड़ना होता, बल्कि पूरे सब्र के साथ अपनी भावनाओं और मिज़ाज का सामना करते हुए, खुद के मन को जीतना होता है।

43

बारिश कहाँ से आती है? यह ज़मीन से भाप बनकर उड़ने वाले गंदे पानी से ही तो बनती है— जैसे पेशाब या वह पानी जिससे तुमने अपने पैर धोकर फेंक दिए हों। क्या यह कमाल की बात नहीं है कि आसमान उस गंदे पानी को सोख लेता है और उसे बिल्कुल साफ, मीठे पानी में बदल देता है?

अगर तुम अपने मन को आज़ाद छोड़ दो, तो वह भी तुम्हारे भीतर के मैलेपन और विकारों के साथ ठीक ऐसा ही कर सकता है।

44

बुद्ध ने कहा था कि सिर्फ खुद को परखो, दूसरों को नहीं, चाहे वे कितने ही अच्छे या बुरे क्यों न हों। बुद्ध तो बस रास्ता दिखाते हैं और कहते हैं, “सच कुछ ऐसा है।” अब यह हमें देखना है कि क्या हमारा मन उस सच जैसा हुआ है या नहीं?