45 दुनिया की हर चीज़ बस इसलिए वजूद में है क्योंकि वह बदल रही है। तुम इस बदलाव को रोक नहीं सकते। ज़रा सोचो, क्या तुम साँस अंदर लिए बिना साँस बाहर छोड़ सकते हो? क्या वह तुम्हें अच्छा लगेगा? या क्या तुम सिर्फ साँस अंदर खींचते ही रह सकते हो?
हम चाहते हैं कि चीज़ें कभी न बदलें, पर ऐसा हो नहीं सकता। यह नामुमकिन है।
46 अगर तुम यह जान लो कि हर चीज़ एक दिन मिट जाने वाली है, तो तुम्हारे ख्यालों का उलझा हुआ धागा धीरे-धीरे खुद ही खुलने लगेगा और तुम्हें बहुत ज्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
जब भी कोई नई परेशानी या विचार उठे, तो तुम्हें बस इतना कहना है— “ओह! एक और!” बस इतना ही!
47 ऐसी कोई भी बात जिसमें इस सच को झुठलाया गया हो कि “यहाँ कुछ भी पक्का नहीं है”, किसी ज्ञानी की बात नहीं हो सकती।
48 अगर तुम इस ‘अनिश्चितता’ (कि कुछ भी तय नहीं है) को साफ-साफ देख लो, तो तुम्हें वह दिख जाएगा जो ‘निश्चित’ (तय) है। तय बस यही है कि चीज़ों का बदलना और अनिश्चित होना अटल है, इसके सिवा कुछ हो ही नहीं सकता। क्या तुम समझे?
सिर्फ इतना जान लेने से ही तुम बुद्ध को जान सकते हो, तुम सच्चे अर्थों में उनके आगे सिर झुका सकते हो।
49 अगर तुम्हारा मन तुम्हें यह भरम दे कि तुम ‘श्रोतापन्न’ बन चुके हो, तो जाओ और किसी सच्चे श्रोतापन्न के आगे सिर झुकाओ। वह तुम्हें खुद बता देगा कि सब कुछ अनिश्चित है।
अगर तुम किसी ‘सकदागामी’ से मिलो, तो उसे प्रणाम करो। वह तुम्हें देखते ही कहेगा, “कुछ भी पक्का नहीं है!”
अगर कोई ‘अनागामी’ हो, तो उसके पास जाओ। वह सिर्फ एक ही बात कहेगा, “सब अनिश्चित है!”
और अगर तुम किसी ‘अर्हत’ से भी मिलो, तो वह तुम्हें और भी सख्ती से कहेगा, “यह सब कुछ और भी ज्यादा अनिश्चित है!”
तुम इन परम ज्ञानियों के मुँह से बस यही सुनोगे: “यहाँ कुछ भी पक्का नहीं है। किसी भी चीज़ को पकड़ कर मत बैठो!”
50 कभी-कभी मैं पुराने मंदिरों और प्राचीन धार्मिक जगहों को देखने जाता था। कुछ जगहों पर दीवारों में दरारें पड़ी होती थीं। शायद मेरा कोई दोस्त कह उठता, “कितने दुख की बात है न? इसमें दरार आ गई है।”
तब मेरा जवाब होता, “अगर इनमें दरार न आती, तो बुद्ध जैसा कोई वजूद में ही न आता। न ही कोई धम्म होता। इसमें दरार इसलिए आई है क्योंकि यह बुद्ध की सीख के बिल्कुल सही और सटीक रास्ते पर है।”
51 चीज़ें अपने कुदरती रास्ते पर ही चलती हैं। हम उनके लिए हँसें या रोएँ, वे अपना ही रास्ता चुनती हैं। और विज्ञान के पास ऐसा कोई ज्ञान नहीं जो कुदरत के इस बहाव को रोक सके।
तुम किसी डेंटिस्ट से अपने दांत ठीक करवा सकते हो, पर भले ही वह उन्हें कुछ वक्त के लिए ठीक कर दे, आख़िरकार वे अपना कुदरती रास्ता ही लेंगे। एक दिन उस डेंटिस्ट को भी इसी तकलीफ से गुज़रना होगा। आख़िर में सब कुछ ढह ही जाता है।
52 हम किस चीज़ को पक्का या हमेशा के लिए मान सकते हैं? किसी को नहीं! यहाँ एहसासों के सिवा और कुछ नहीं है। दुख उठता है, कुछ देर ठहरता है, और फिर मिट जाता है। फिर दुख की जगह खुशी ले लेती है— बस इतना ही। इसके बाहर और कुछ नहीं है।
लेकिन हम भटके हुए लोग हैं, जो लगातार भाग-भाग कर बस इन एहसासों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं। एहसास कोई सच नहीं हैं, वे तो बस लगातार होने वाला बदलाव हैं।
