✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
ध्यान साधना मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

ध्यान-साधना पर

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अगर तुम भविष्य में आने वाले बुद्ध से मिलना चाहते हो, तो बस साधना करना छोड़ दो। तुम शायद इस संसार में इतने लंबे समय तक भटकते रहोगे कि जब वे आएँगे, तुम उन्हें यहीं मिल जाओगे।

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मैंने लोगों को यह कहते सुना है, “ओह! यह साल मेरे लिए बहुत बुरा रहा।”

मैं पूछता हूँ, “ऐसा क्यों?”

वे कहते हैं, “मैं साल भर बीमार पड़ा रहा, बिल्कुल ध्यान नहीं कर सका।”

ओह! अगर मौत के इतने करीब होकर भी वे साधना नहीं कर सकते, तो आख़िर कब करेंगे? असल में, वे सिर्फ खुशियों में खो जाना जानते हैं। जब दुख आता है, तब भी वे साधना नहीं करते; वे बस उस दुख में डूब जाते हैं। मुझे नहीं पता कि ये लोग आख़िर कब साधना करने की सोचते हैं।

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मैंने विहार के नियम और दिनचर्या पहले ही तय कर दिए हैं। इन नियमों को मत तोड़ो। जो ऐसा करता है, वह यहाँ सच्ची लगन से साधना करने नहीं आया है। ऐसा इंसान भला क्या पाने की उम्मीद कर सकता है?

भले ही वह हर रोज़ मेरे पास सोए, पर वह मुझे कभी देख नहीं पाएगा। अगर वह साधना नहीं करता, तो भले ही वह बुद्ध के पास ही क्यों न सोए, वह बुद्ध को भी कभी नहीं देख पाएगा।

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यह मत सोचो कि सिर्फ़ आँखें बंद करके बैठना ही साधना है। अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो अपनी यह सोच तुरंत बदल डालो। सच्ची साधना वह है जो उठते, बैठते, चलते या लेटते— हर अवस्था में पूरी तरह से होश में रहे। ध्यान से उठने का मतलब यह नहीं कि तुमने ध्यान करना बंद कर दिया, बल्कि इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि तुमने अपने शरीर की अवस्था बदली है।

अगर तुम इस तरह से सोचोगे, तो तुम्हारे भीतर गहरी शांति उतरेगी। तुम जहाँ भी रहोगे, साधना का यह भाव तुम्हारे साथ हमेशा रहेगा। तुम्हारे भीतर एक अटूट सजगता बनी रहेगी।

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“जब तक मुझे परम ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो जाती, मैं इस जगह से नहीं उठूंगा, भले ही मेरे शरीर का सारा खून क्यों न सूख जाए।” किताबों में ऐसा पढ़कर शायद तुम भी इसे आज़माने की सोचो। तुम भी बिल्कुल बुद्ध की तरह करना चाहोगे।

लेकिन तुमने यह नहीं सोचा कि तुम्हारी ‘गाड़ी’ अभी बहुत छोटी है। बुद्ध की गाड़ी बहुत बड़ी थी। वे उस लंबी मंज़िल को एक ही बार में तय कर सकते थे। अपनी इस छोटी सी गाड़ी से तुम एक ही छलांग में वहाँ तक कैसे पहुँच सकते हो? यह बिल्कुल अलग ही बात है।

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मैं ध्यान करने की जगह तलाशता हुआ दुनिया भर में भटका। मुझे पता ही नहीं था कि वह जगह तो पहले से ही मेरे अपने दिल में थी। सारी साधना तुम्हारे भीतर ही है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मौत— सब कुछ तुम्हारे ठीक भीतर है। मैं तब तक दर-ब-दर भटकता रहा जब तक कि थक कर चूर-चूर नहीं हो गया। और जब मैं रुका, सिर्फ़ तभी मुझे वह मिला जिसकी मुझे तलाश थी… मेरे अपने भीतर।

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हम स्वर्ग देखने के लिए ध्यान नहीं करते, बल्कि अपने दुखों को ख़त्म करने के लिए करते हैं।

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ध्यान के दौरान दिखने वाले दृश्यों या रोशनियों से मत जुड़ो; उनके साथ उठो-गिरो मत। आख़िर किसी रोशनी में ऐसा क्या ख़ास है? वह तो मेरी टॉर्च में भी है। वह हमें हमारे दुखों से आज़ाद नहीं कर सकती।

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ध्यान के बिना तुम अंधे और बहरे हो। धम्म इतनी आसानी से दिखाई नहीं देता। जो तुमने आज तक नहीं देखा, उसे देखने के लिए तुम्हें ध्यान में उतरना ही होगा। क्या तुम पैदा होते ही गुरु बन गए थे? नहीं। तुम्हें पहले सीखना होता है। एक नींबू भी तब तक खट्टा नहीं लगता, जब तक तुम उसे चख न लो।

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जब तुम ध्यान में बैठो, तो हर गुज़रते हुए विचार से बस इतना कहो— “यह मेरा मसला नहीं है!”

68

जब हम आलस से भरे हों, तब हमें साधना करनी चाहिए, न कि सिर्फ़ तब जब हम जोश में हों या हमारा ‘मूड’ हो। यही बुद्ध की दी हुई सच्ची साधना है। अपने मन के हिसाब से तो हम तभी साधना करते हैं जब हमें अच्छा लग रहा होता है। ऐसे तो हम कभी कहीं पहुँच ही नहीं सकते! अगर हम सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी और मूड के मोहताज़ रहे, तो हम अपने भीतर के मैलेपन की धारा को कब काटेंगे?

69

हम जो भी करें, उसमें हमें ख़ुद को देखना चाहिए। सिर्फ़ किताबें पढ़ लेने से कभी कुछ हासिल नहीं होता। दिन गुज़रते जाते हैं, पर हम ख़ुद के भीतर नहीं झाँकते। साधना के बारे में जानना, दरअसल ‘जानने’ के लिए की गई एक साधना ही है।

70

बेशक, ध्यान करने के दर्जनों तरीके हैं, लेकिन आख़िर में बात बस एक ही जगह आकर ठहरती है— जो जैसा है, उसे वैसा ही छोड़ दो। इस जंग से बाहर निकलो और उस छाँव में आ जाओ जहाँ शीतलता है। इसे आज़मा कर क्यों नहीं देखते?

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सिर्फ़ साधना के बारे में सोचते रहना ऐसा है जैसे परछाई पर झपटना और असली चीज़ को गँवा बैठना।

72

जब मुझे साधना करते हुए कुछ ही साल हुए थे, तब भी मैं ख़ुद पर पूरा भरोसा नहीं कर पाता था। लेकिन जब मैंने गहरे अनुभव हासिल किए, तब जाकर मैंने अपने ही दिल पर एतबार करना सीखा।

जब तुम्हारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है, तो चाहे जो हो, तुम उसे होने देते हो। तब हर चीज़ उठती है और गुज़र जाती है। तुम एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम्हारा अपना दिल ही ख़ुद को रास्ता दिखाता है।

73

ध्यान के रास्ते पर, बेचैनी में फँसने से कहीं ज़्यादा खतरनाक है उस ‘शांति’ में फँस जाना। क्योंकि बेचैनी से तो तुम फिर भी बाहर निकलना चाहोगे, लेकिन उस शांति में तुम संतुष्ट होकर वहीं रुक जाते हो और आगे नहीं बढ़ते। जब अंतर्दृष्टि (विपश्यना) साधना से वह गहरा आनंद और स्पष्टता उभरे, तो उससे भी चिपक कर मत बैठ जाना।

74

ध्यान का सारा खेल बस मन और एहसासों का है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसके पीछे तुम्हें भागना पड़े या लड़ना पड़े। काम करते हुए भी साँस तो चलती ही रहती है। कुदरत अपना काम ख़ुद सँभाल लेती है। हमें बस इतना करना है कि हम होश में रहें, और भीतर उतर कर सब कुछ साफ-साफ देखने की कोशिश करें। बस यही ध्यान है।

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सही से साधना न करना लापरवाही है। और लापरवाह होना एक मुर्दे जैसा होने के बराबर है। ख़ुद से पूछो कि क्या मरने के वक़्त तुम्हारे पास साधना करने का समय होगा? बार-बार ख़ुद से पूछो, “मैं कब मरूँगा?”

अगर हम इस तरह सोचेंगे, तो हमारा मन हर पल चौकन्ना रहेगा। हमारी लापरवाही मिट जाएगी और सजगता खुद-ब-खुद हमारे भीतर उतर आएगी। समझ का उजियारा फैलेगा, और हम हर चीज़ को ठीक वैसी ही देख पाएंगे जैसी वह सच में है।

यह सजगता मन की पहरेदारी करती है, ताकि दिन हो या रात, जब भी कोई एहसास उठे, मन को उसका पता रहे। सजग होने का मतलब है अपने भीतर शांत और स्थिर होना। और जो शांत है, वही पूरी तरह जागा हुआ है। जो जागा हुआ है, बस वही सही मायनों में साधना कर रहा है।

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हमारी साधना की नींव कुछ ऐसी होनी चाहिए: पहला— पूरी तरह ईमानदार और सच्चा होना; दूसरा— कोई भी गलत काम करने से खौफ खाना; और तीसरा— अपने दिल में विनम्र होना, दुनियावी झमेलों से अलग रहकर थोड़े में ही संतुष्ट रहना।

अगर हम अपनी बातों में और बाकी चीज़ों में कम से ही काम चला लें, तो हम ख़ुद को बेहतर देख पाएंगे और भटकेंगे नहीं। तब हमारे मन के भीतर शील (सदाचार), समाधि (एकाग्रता) और प्रज्ञा (ज्ञान) की एक मज़बूत नींव खड़ी होगी।

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शुरुआत में तुम आगे बढ़ने की जल्दबाज़ी करते हो, फिर वापस लौटने की जल्दबाज़ी करते हो, और फिर रुक जाने की जल्दबाज़ी करते हो। तुम तब तक इस तरह साधना करते रहते हो जब तक कि एक ऐसा मुकाम नहीं आ जाता जहाँ लगता है कि न तो आगे बढ़ना ही ‘वह’ है, न पीछे लौटना, और न ही रुक जाना! सब ख़त्म हो जाता है। न कोई ठहराव बचता है, न आगे जाना और न पीछे आना। खेल ख़त्म। ठीक उसी पल तुम यह जान जाते हो कि वहाँ सच में ‘कुछ भी नहीं’ है।

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याद रखो, तुम कुछ ‘पाने’ के लिए ध्यान नहीं करते, बल्कि चीज़ों से ‘छुटकारा’ पाने के लिए करते हो। हम यह किसी इच्छा से नहीं, बल्कि सब कुछ छोड़ देने के भाव से करते हैं। अगर तुम कुछ ‘चाहोगे’, तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।

79

इस रास्ते का सार बहुत ही आसान है। इसमें कुछ भी लंबी-चौड़ी बात समझाने की ज़रूरत नहीं है। अपने प्यार और अपनी नफ़रत को छोड़ दो, और चीज़ों को बस उनके हाल पर छोड़ दो। मैं भी अपनी साधना में बस इतना ही करता हूँ।

80

गलत सवाल पूछना यह दिखाता है कि तुम अभी भी शक के जालों में फँसे हो। साधना के बारे में बात करना तब तक ठीक है, जब तक वह तुम्हें गहरे चिंतन में मदद करे। लेकिन आख़िर में, उस परम सत्य को तुम्हें ख़ुद ही अपनी आँखों से देखना होगा।

81

हम साधना इसलिए करते हैं ताकि हम चीज़ों को छोड़ना सीख सकें, इसलिए नहीं कि उन्हें पकड़े रखने की हमारी पकड़ और मज़बूत हो जाए। परम ज्ञान (निर्वाण) तभी घटित होता है, जब तुम्हारी हर चाहत ख़त्म हो जाती है।

82

अगर तुम्हारे पास सजग (होश में) रहने का वक़्त है, तो तुम्हारे पास ध्यान करने का भी वक़्त है।

83

अभी हाल ही में किसी ने मुझसे पूछा, “जब हम ध्यान करते हैं और मन में तरह-तरह की चीज़ें उठती हैं, तो क्या हमें उनकी गहराई में जाना चाहिए, या सिर्फ़ उन्हें आते-जाते हुए देखना चाहिए?”

मेरा जवाब था— अगर तुम किसी अजनबी को अपने पास से गुज़रते हुए देखते हो, तो तुम सोच सकते हो, “यह कौन है? कहाँ जा रहा है? इसका इरादा क्या है?” लेकिन अगर तुम उस इंसान को पहले से जानते हो, तो उसे बस अपने पास से गुज़रते हुए देख लेना ही काफी है।

84

साधना के रास्ते पर तुम्हारी ‘इच्छा’ तुम्हारी दोस्त भी हो सकती है और दुश्मन भी। एक दोस्त के रूप में, यह हमारे भीतर साधना करने, सच को समझने और दुखों को मिटाने की प्यास जगाती है। लेकिन जो अभी हुआ ही नहीं है, हमेशा उसकी इच्छा करते रहना, चीज़ों को उनके असली रूप से अलग देखने की चाह रखना— यह सिर्फ़ दुख बढ़ाता है, और यहीं यह इच्छा तुम्हारी सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।

आख़िर में, हमें अपनी सारी इच्छाओं को आज़ाद कर देना ही सीखना होगा, यहाँ तक कि मोक्ष पाने की इच्छा को भी। केवल तभी हम पूरी तरह आज़ाद हो सकेंगे।

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एक बार किसी ने अजान चाह से उनके ध्यान सिखाने के तरीके के बारे में पूछा: “क्या आप हर रोज़ लोगों से बात करके उनके मन का हाल जानने का तरीका अपनाते हैं?”

इस पर अजान चाह ने कहा, “यहाँ मैं अपने शिष्यों को ख़ुद अपने मन की हालत जाँचना और ख़ुद से ही सवाल करना सिखाता हूँ। हो सकता है कि आज कोई भिक्षु गुस्से में हो, या उसके मन में कोई इच्छा उठ रही हो। मुझे यह जानने की ज़रूरत नहीं है, पर उसे तो पता होना ही चाहिए। इसके लिए उसे मेरे पास आकर पूछने की क्या ज़रूरत है?”

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हमारी ज़िंदगी महज़ कुछ तत्वों का जोड़ है। हम चीज़ों को समझाने के लिए कुछ तयशुदा मान्यताओं का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन फिर हम उन मान्यताओं से ही ऐसे जुड़ जाते हैं मानो वे कोई असली चीज़ हों।

मिसाल के तौर पर, लोगों और चीज़ों को नाम दिए गए हैं। अगर हम शुरुआत में लौट जाएँ, जब नाम नहीं रखे गए थे, और आदमियों को “औरत” और औरतों को “आदमी” कहने लगें— तो क्या फ़र्क पड़ जाएगा? लेकिन अब हम इन नामों और विचारों से इस कदर चिपक गए हैं कि हमारे बीच लिंग-भेद की जंग और कई तरह की दूसरी जंगें भी छिड़ी हुई हैं।

ध्यान इन सारी चीज़ों के पार देखने के लिए है। सिर्फ़ तभी हम उस मंज़िल (निर्वाण) तक पहुँच सकते हैं जहाँ कोई शर्तें नहीं हैं, और जहाँ सिर्फ़ गहरी शांति है, कोई जंग नहीं।

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कुछ लोग पूरी आस्था के साथ भिक्षु बनते हैं, पर बाद में वे बुद्ध की हर सीख को पैरों तले रौंद देते हैं। वे सब कुछ जानते हैं, पर फिर भी सही रास्ते पर चलने से मुकर जाते हैं। सच तो यह है कि आज के दौर में सच्ची साधना करने वाले लोग बचे ही कितने हैं।

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किताबी ज्ञान और सच्ची साधना में बस इतना फ़र्क है— पहला सिर्फ़ जड़ी-बूटी का नाम जानता है, जबकि दूसरा बाहर जाकर उसे ढूँढता है और उसका इस्तेमाल करता है।

89

शोर— तुम्हें पक्षियों की आवाज़ तो पसंद है, पर गाड़ियों की नहीं। तुम्हें लोगों और शोर-शराबे से डर लगता है, और तुम जंगल में अकेले रहना चाहते हो। शोर को वहीं छोड़ दो और अपने ‘बच्चे’ की देखभाल करो। वह ‘बच्चा’ तुम्हारी अपनी साधना है।

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एक नए बने भिक्षु (श्रामणेर) ने अजान चाह से पूछा कि ध्यान की राह पर नए चलने वालों के लिए उनकी क्या सलाह है। उन्होंने जवाब दिया, “ठीक वही सलाह, जो उनके लिए है जो लंबे समय से इस राह पर चल रहे हैं।” और वह सलाह क्या थी? उनका जवाब था— “बस इसे करते रहो।”

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लोग कहते हैं कि बुद्ध की सीख एकदम सही है, पर दुनियादारी के बीच रहकर इसे आज़माना नामुमकिन है। वे ऐसी बातें कहते हैं, “मैं अभी जवान हूँ, इसलिए मेरे पास साधना करने का मौक़ा नहीं है। जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, तब साधना करूँगा।”

क्या तुम कभी ऐसा कहोगे कि “मैं अभी जवान हूँ, इसलिए मेरे पास खाना खाने का वक़्त नहीं है?”

अगर मैं तुम्हारी छाती में एक सुलगती हुई लकड़ी चुभा दूँ, तो क्या तुम यह कहोगे कि “यह सच है कि मुझे भयानक दर्द हो रहा है, पर चूँकि मैं समाज में रहता हूँ, इसलिए मैं इससे दूर नहीं जा सकता?”

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शील (सदाचार), समाधि (एकाग्रता) और प्रज्ञा (अन्तर्ज्ञान)— ये तीनों मिलकर बौद्ध साधना का दिल धड़काते हैं। शील तुम्हारे शरीर और तुम्हारी वाणी को पवित्र रखता है। और यह शरीर ही तुम्हारे मन का घर है। इसलिए साधना के तीन रास्ते हैं: शील का रास्ता, समाधि का रास्ता और प्रज्ञा का रास्ता।

यह लकड़ी के उस एक टुकड़े की तरह है जिसे तीन हिस्सों में काटा गया हो, पर असल में वह एक ही लकड़ी है। अगर हम अपने शरीर और बोली को फेंकना चाहें, तो हम नहीं फेंक सकते। अगर हम अपने मन को फेंकना चाहें, तो हम वह भी नहीं कर सकते। हमें इस शरीर और मन दोनों के साथ ही साधना करनी होगी।

इसलिए सच तो यह है कि शील, समाधि और प्रज्ञा— ये तीनों एक-दूसरे में पिरोए हुए एक ही सुर हैं, जो एक साथ मिलकर काम करते हैं।