✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
अनात्म मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



अजान चाह के यादगार कथन

अनात्म पर

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एक बार पास के ही किसी सूबे से एक बूढ़ी, पर पक्की आस्था वाली महिला ‘वट पा पोंग’ विहार (अजान चाह का विहार) के दर्शन करने आई। उसने अजान चाह से कहा कि वह बस थोड़ी देर के लिए ही रुक सकती है, क्योंकि उसे वापस लौटकर अपने पोते-पोतियों को सँभालना है। चूँकि वह बहुत बूढ़ी थी, इसलिए उसने उनसे गुज़ारिश की कि वे उसे ‘धम्म’ के बारे में कोई छोटी सी, पर ज़रूरी सीख दे दें।

अजान चाह ने बहुत ही गहरी और ज़ोरदार आवाज़ में कहा: “अरे सुनो! यहाँ कोई नहीं है, बस यही (एक नश्वर शरीर) है! यहाँ कोई ‘मैं’ या ‘मेरा’ नहीं है। न कोई बूढ़ा है, न कोई जवान। न कोई अच्छा है, न बुरा। न कमज़ोर, न ताक़तवर। बस यही है, और कुछ नहीं— यह सिर्फ़ कुदरत के कुछ तत्व हैं जो अपने-अपने रास्ते चल रहे हैं, पर भीतर से सब खाली है। न किसी का जन्म हुआ है, और न ही कोई मरने वाला है! जो लोग जन्म और मौत की बातें करते हैं, वे नासमझ बच्चों की ज़बान बोलते हैं। दिल की ज़बान में, धम्म की ज़बान में, जन्म और मौत जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है।”

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बुद्ध की सीख की असली बुनियाद ही यह देखना है कि यह ‘मैं’ एकदम खोखला है। पर लोग धम्म सीखने इसलिए आते हैं ताकि उनके भीतर का ‘मैं’ (अहंकार) और बड़ा हो सके।

वे दुख या तकलीफों से गुज़रना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि सब कुछ बस आरामदेह हो। हो सकता है वे दुखों से पार पाना चाहते हों, लेकिन जब तक उनके भीतर ‘मैं’ ज़िंदा है, वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?

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जब तुम इसे समझ लेते हो, तो यह बहुत आसान हो जाता है। यह बहुत ही सीधा और सरल है। जब कोई अच्छी चीज़ सामने आए, तो समझ लो कि वह भीतर से खाली (अनित्य) है।

जब कोई बुरी चीज़ सामने आए, तो देख लो कि वह तुम्हारी नहीं है। वे सब बस गुज़र जाती हैं। उन चीज़ों से यह मानकर मत जुड़ो कि वे ‘तुम’ हो, या तुम उनके मालिक हो।

अगर तुम सोचते हो कि पपीते का पेड़ तुम्हारा है, तो जब उसे काटा जाता है, तो तुम्हें दर्द क्यों नहीं होता? अगर तुम इस बात को समझ सको, तो यही सही रास्ता है, बुद्ध की सच्ची सीख है, और यही वह सीख है जो आज़ादी की तरफ ले जाती है।

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लोग वह नहीं सीखते जो अच्छे और बुरे, दोनों के पार है। जबकि उन्हें यही सीखना चाहिए। वे कहते हैं, “मैं ऐसा बनूँगा; मैं वैसा बनूँगा।”

पर वे कभी यह नहीं कहते, “मैं कुछ नहीं बनूँगा, क्योंकि सच तो यह है कि ‘मैं’ नाम की कोई चीज़ है ही नहीं।” वे यही बात कभी नहीं सीखते।

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एक बार जब तुम ‘मैं के न होने’ (अनात्म) को समझ लेते हो, तो ज़िंदगी का सारा बोझ उतर जाता है। तुम दुनिया के साथ पूरी तरह शांति में आ जाते हो। जब हम ‘मैं’ के पार देख लेते हैं, तो हम खुशियों से भी नहीं चिपकते, और तब हम सही मायनों में खुश हो सकते हैं। बिना लड़े चीज़ों को छोड़ना सीखो, बस आज़ाद कर दो, वैसे ही रहो जैसे तुम हो— बिना कुछ पकड़े, बिना किसी मोह के, एकदम आज़ाद।

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सभी शरीर चार तत्वों से बने हैं— मिट्टी, पानी, हवा और आग। जब ये सब मिलते हैं और एक शरीर का रूप लेते हैं, तो हम कहते हैं कि यह ‘आदमी’ है, या यह ‘औरत’ है। हम उन्हें नाम दे देते हैं, ताकि एक-दूसरे को आसानी से पहचान सकें। पर सच में वहाँ कोई है नहीं— सिर्फ़ मिट्टी, पानी, हवा और आग है। इसे देखकर न तो बहुत ज़्यादा उत्साहित हो, और न ही इसके दीवाने बनो। अगर तुम गहराई से देखोगे, तो तुम्हें वहाँ ‘कोई’ नहीं मिलेगा।