✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
परिचय मुख्य > देसना > कोई अजान चाह नहीं! 5. प्रवचन



परिचय

जब लोग अजान चाह से कहते कि दुनियादारी के बीच रहकर साधना करना तो बिल्कुल असंभव है, तो वे पलटकर पूछते—

अगर मैं तुम्हारी छाती में एक सुलगती हुई लकड़ी चुभा दूँ, तो क्या तुम यह कहोगे कि दर्द तो बहुत हो रहा है, पर क्योंकि मैं समाज में रहता हूँ, इसलिए इससे बचकर कहीं जा नहीं सकता?

अजान चाह का यह जवाब ठीक वैसा ही था, जैसे बुद्ध की ‘ज़हरीले तीर’ वाली कहानी। बुद्ध एक ऐसे आदमी का ज़िक्र करते थे जिसे एक ज़हरीला तीर लग गया था, लेकिन उसने किसी को वह तीर तब तक निकालने नहीं दिया जब तक कि तीर, धनुष और तीर चलाने वाले से जुड़े उसके सारे सवालों के जवाब उसे नहीं मिल गए।

दिक्कत बस यह थी कि सारे जवाब मिलने से पहले ही वह घायल इंसान दम तोड़ देता। उसे सिर्फ इतना समझना था कि वह असहनीय दर्द में है, उसकी जान जा रही है, और उसे उसी वक़्त, तुरंत कुछ न कुछ करना ही होगा।

अजान चाह ने अपनी हर सीख में बार-बार इसी बात पर ज़ोर दिया—

तुम तड़प रहे हो; अभी, इसी वक़्त इसके लिए कुछ करो!

वे शांति, ज्ञान या मोक्ष की बड़ी-बड़ी बातें करने में अपना वक़्त ज़ाया नहीं करते थे। उनका पूरा ज़ोर बस इस बात पर होता था कि इसी पल, तुम्हारे शरीर और मन के भीतर क्या गुज़र रहा है, उसके प्रति पूरी तरह से सजग रहो। बस उसे चुपचाप देखना और आज़ाद कर देना सीखो। वे अक्सर कहते थे—

ध्यान कुछ हासिल करना नहीं है… बल्कि जो है, उससे छुटकारा पाना है।

यहाँ तक कि जब कोई उनसे साधना से मिलने वाली शांति के बारे में पूछता, तो वे पलटकर उस उलझन की बात करते जिसे सबसे पहले मिटाना ज़रूरी था। उनका सीधा सा जवाब होता—

शांति और कुछ नहीं, बस उलझनों का ख़त्म हो जाना है।

यह संग्रह न सिर्फ दुख और ध्यान की परतों को खोलता है, बल्कि यह हमें सब कुछ मिट जाने (अनित्यता), शील और ‘खुद के न होने’ (अनात्म) की एक गहरी झलक भी देता है।

हमें उम्मीद है कि एकांत में गहरे चिंतन के उन पलों में, आप इस छोटी सी किताब को अपना एक सच्चा साथी पाएंगे। और शायद, आपको ‘अजान चाह के न होने’ की वह ख़ामोश झलक भी मिल जाए, जो अक्सर कहा करते थे—

मैं हमेशा कुछ नया जगाने और कुछ पीछे छोड़ देने की बात करता हूँ… पर सच तो यह है कि न तो जगाने के लिए ‘कुछ’ है, और न ही छोड़ने के लिए ‘कुछ’।