✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
समथ ध्यान-साधना मुख्य > देसना 5. प्रवचन समथविपस्सना

समथ ध्यान-साधना

लेखक: अजान ब्रह्म
| ७ मिनट

(यह प्रवचन पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के बोधिज्ञान विहार में एक ‘पूरी रात चलने वाले ध्यान सत्र’ से पहले दिया गया था, ताकि साधक समाधि के गहरे अर्थ को समझ सकें।)



‘शमथ’ (समथ) का सीधा सा अर्थ है—शांत निश्चल करना। अपने शरीर की गतिविधियों को शांत करना, अपनी वाणी को शांत करना, और अंततः अपने मन की हलचल को शांत करना।

अक्सर यह देखा गया है कि जब लोग किसी ध्यान-शिविर में जाते हैं, तो वे वहाँ भी कुछ ‘करने’ के लिए खोजते हैं। वे ध्यान में बैठकर भी मन को व्यस्त रखने के बहाने ढूंढते हैं, जबकि असल में उन्हें बस शांत और मौन रहना चाहिए।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी और ध्यान का गहरा नाता

यह समझना बहुत आसान है कि मेरा मन जिस तरह सोचता है, मेरा शरीर उसी तरह काम करता है। इसका मतलब यह है कि मन को शांत करने का केवल एक ही तरीका नहीं है (यानी सिर्फ ध्यान के कुशन पर बैठना)। आप अपने दैनिक जीवन में भी शमथ का अभ्यास कर सकते हैं।

जब आप घर की सफाई कर रहे हों, बर्तन धो रहे हों, चल रहे हों या आ-जा रहे हों—अगर आप उस दौरान अपनी वाणी और अपने कामों में ठहराव ला सकते हैं, तो यकीन मानिए, जब आप ध्यान करने बैठेंगे, तो मन की हलचल को रोकना आपके लिए बहुत आसान हो जाएगा।

शमथ ध्यान का अभ्यास कैसे करें?

ध्यान में बैठते ही सबसे पहले अपनी सांस को ‘पकड़ें’—ताकि आप उसे स्पष्ट रूप से देख सकें।

ऐसा करने के लिए आपको मन में उठने वाली बाकी सभी गतिविधियों पर रोक लगानी होगी। चाहे वे कल की योजनाएं हों, बीते हुए कल के विचार हों, या शरीर में होने वाला दर्द—आपको अपने मन को इन बाहरी चीज़ों की तरफ भागने से रोकना होगा और उसे सिर्फ सांस पर टिकाना होगा। एक बार जब आपको सांस साफ दिखने लगे, तब आप उसे शांत कर सकते हैं। यह ‘आनापानसति’ का पहला कदम है।

शरीर के दर्द से कैसे बचें?

आपने शायद ध्यान दिया होगा कि जब मन शांत होता है, तो शरीर आपको कोई खास परेशानी नहीं देता। जब आप ध्यान करने बैठते हैं, तो शरीर के थकने, घुटनों में दर्द होने या पीठ अकड़ने से पहले ही अगर आप तेज़ी से अपने मन को शांत कर लें, तो फिर शरीर आपको पूरे ध्यान के दौरान परेशान नहीं करेगा।

इसलिए, सबसे पहले शरीर को शांत करें, और फिर अपनी सांस को खोजें। सांस जहाँ भी महसूस हो रही हो, बस उसे वहीं पकड़ लें और गायब न होने दें। ध्यान रहे, मन को यूँ ही भटकने देना ध्यान नहीं है; ध्यान में एक सचेत प्रयास लगता है। मन को शांत करना किसी भी प्रकार की ‘प्रज्ञा’ के उदय होने की पहली शर्त है।

दुःख: अध्यात्म की असली शुरुवात

बौद्ध धर्म में ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है। उपनिस सुत्त में भगवान बुद्ध ने बताया है कि ‘दुःख’ के बाद क्या होता है। कहानी दुःख पर खत्म नहीं होती, बल्कि दुःख से ही मुक्ति का रास्ता शुरू होता है!

बुद्ध कहते हैं कि दुःख ही वह कारण है जिससे आपके भीतर ‘श्रद्धा’ जन्म लेती है।

जब इंसान दुःख को देखता है, तभी उसे एहसास होता है कि अब कुछ करने का समय आ गया है। मैं अक्सर देखता हूँ कि कई लोग ध्यान का अभ्यास ही नहीं करते। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपनी ज़िंदगी में अभी तक ‘दुःख’ को पहचाना ही नहीं है।

लेकिन जब आप दुःख को देख लेते हैं, तो आपके भीतर एक दृढ़ विश्वास जागता है: “अब बहुत हो गया! अब मैं यहाँ-वहाँ भागना, नए गुरु खोजना बंद करूँगा। समस्या मेरे भीतर है, और मैं यहीं रुककर इसे सुलझाऊंगा!” यहीं से असली यात्रा शुरू होती है।

मुक्ति की श्रृंखला (उपनिस सुत्त के अनुसार):

  1. दुःख से श्रद्धा जन्म लेती है।
  2. श्रद्धा से प्रमोद उत्पन्न होता है कि अब बाहर निकलने का रास्ता मिल गया है।
  3. प्रमोद से प्रीति पैदा होती है, जो अभ्यास के लिए ऊर्जा देती है।
  4. प्रीति से गहरा सुख आता है। बुराइयों को छोड़ने मात्र से ही एक शारीरिक सुख मिलता है।
  5. सुख से समाधि का जन्म होता है। (ध्यान दें: बिना सुख और शांति के समाधि कभी नहीं लग सकती। अगर मन दुखी और बंद है, तो समाधि असंभव है)।
  6. समाधि से यथार्थ ज्ञान दर्शन (चीज़ों को वैसे ही देखना जैसी वे हैं - अंतर्दृष्टि) मिलता है।
  7. सच्चे ज्ञान से निर्वेद/विरक्ति/मोहभंगिमा आती है।
  8. विरक्ति से वैराग्य उत्पन्न होता है।
  9. वैराग्य से विमुक्ति प्राप्त होती है।
  10. और अंत में, यह स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि मुक्ति मिल चुकी है और अज्ञान हमेशा के लिए नष्ट हो गया है।

विपश्यना का छिपा हुआ ख़तरा

मुझे हमेशा से लगता है कि पश्चिम में ‘विपश्यना’ को लेकर एक अजीब सी भ्रांति है। वहाँ यह फैशन बन गया है कि “शमथ ध्यान (समाधि/झान) बहुत खतरनाक है क्योंकि आप उसकी शांति में फँस सकते हैं।”

लेकिन सच कहूँ तो, समाधि में फँसने का ख़तरा बहुत छोटा है। कम से कम अगर आप समाधि में हैं, तो आपका मन शांत है और आपके विकार (क्रोध, लोभ) कुछ समय के लिए सो गए हैं। समाधि से बाहर आने पर मन इतना साफ होता है कि दस में से नौ बार आपके भीतर स्वाभाविक रूप से ‘प्रज्ञा’ जागती ही है।

असली ख़तरा ‘विपश्यना’ में है, खासकर जब वह बिना समाधि के की जाए।

आजकल लोग किताबें पढ़कर विपश्यना के विचार गूंथ लेते हैं और सोचते हैं, “अरे वाह! मुझे समझ आ गया। मैंने चीज़ों को वैसा ही देख लिया है जैसी वे हैं!” जबकि उनका मन इतना साफ हुआ ही नहीं होता कि वह विकारों के पार देख सके। यह और कुछ नहीं, बल्कि ‘मोह’ (भ्रम) है। बिना शांत और समाधि चित्त के की गई विपश्यना पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता।

अज्ञान आपको बहुत चालाकी से ठगता है। कम से कम शमथ में आपको साफ पता होता है कि मन शांत हुआ या नहीं। लेकिन विपश्यना में, यह जानना बहुत मुश्किल है कि जो ‘अंतर्दृष्टि’ आपको मिला है वह सच्चा है, या आप सिर्फ खुद को धोखा दे रहे हैं।

असली ‘अंतर्दृष्टि’ की पहचान क्या है? इसकी एक ही पहचान है—विराग। अगर आप कहते हैं कि आपको अंतर्दृष्टि मिल गया है, लेकिन आप अभी भी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होते हैं, विहार में ‘सबसे अच्छा ध्यानी’ कहलाने की लालसा रखते हैं, या सांसारिक चीज़ों के पीछे भागते हैं… तो सच मानिए, आपने अभी तक यथार्थ को नहीं देखा है।

प्रज्ञा और प्रयास का संतुलन

शमथ ध्यान में सफलता पाने के लिए सिर्फ ‘ज़ोर’ लगाना काफी नहीं है; आपको ‘सम्यक दृष्टि’ और थोड़ी सी ‘प्रज्ञा’ भी चाहिए। प्रज्ञा शांति सिखाती है, और शांति प्रज्ञा को गहरा करती है। ये दोनों हाथ में हाथ डालकर चलने वाले दो दोस्तों की तरह हैं।

आप सिर्फ अपनी ‘इच्छाशक्ति’ के ज़ोर पर मन को शांत नहीं कर सकते। आपको पता होना चाहिए कि इच्छाशक्ति को कहाँ लगाना है, कब थोड़ा और प्रयास करना है और कब मन को ढील देनी है। अगर आप सिर्फ ज़ोर लगाते रहेंगे और ढील नहीं देंगे, तो आप थक जाएंगे और तनावग्रस्त हो जाएंगे।

अगर आपका मन शांत नहीं हो रहा है, तो ईमानदारी से खुद से पूछें— “मैं दिन में कितने घंटे सांस को देखता हूँ? क्या मैं प्रवचन सुनते समय अपने भीतर के शोर को चुप करा पाता हूँ? क्या मैं बिना बहस किए चीज़ों को सुन सकता हूँ?”

आजकल लोग ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ में सिर्फ ‘स्मृति’ की बात करते हैं और ‘समाधि’ को भूल जाते हैं। लेकिन समाधि के बिना मार्ग अधूरा है। अपने मन को शांत करना बहुत ज़्यादा मुश्किल नहीं है, और यकीन मानिए, यह पूरी मेहनत के लायक है!

अजान ब्रह्म

अजान ब्रह्म

अजान ब्रह्म, एक थेरवादी बौद्ध भिक्षु, अपनी बुद्धिमत्ता और हास्यपूर्ण शैली के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इंग्लैंड में जन्मे, उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी वैज्ञानिक (Theoretical Physicist – Scientist) थे, लेकिन गहरी आध्यात्मिक खोज ने उन्हें थाईलैंड में अजान चाह के शिष्य बनने के लिए प्रेरित किया। बाद में, वे ऑस्ट्रेलिया में बोधिन्याण विहार के प्रमुख बने। उनकी शिक्षाएँ गहरी प्रज्ञा और हल्के हास्य का अनूठा संगम हैं, जो ध्यान और जीवन के अर्थ को सरलता से समझाने में मदद करती हैं।