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दिमागी बीमारी का 'ठप्पा'! मुख्य > हास्य > चिंता छोड़ो, चिड़चिड़े रहो! 7. हास्य

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दिमागी बीमारी का ‘ठप्पा’!

लेखक: अजान ब्रह्म
| 2 मिनट



कुछ साल पहले, मैंने ऊपर वाली कहानी मेंटल हेल्थ (मानसिक स्वास्थ्य) के एक बड़े सेमिनार में सुनाई। वहाँ एक मशहूर अस्पताल के डिपार्टमेंट हेड इसे सुनकर इतने गदगद हुए कि उन्होंने मुझे अपनी बिल्डिंग को ‘आशीर्वाद’ देने (यानी उसका उद्घाटन करने) के लिए बुला लिया।

मैंने उनसे पूछा, “भाई, आप किस तरह की दिमागी बीमारी के मामले देखते हैं?”

“सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia),” उन्होंने जवाब दिया।

मैंने फिर पूछा, “और आप इसका इलाज कैसे करते हैं?”

उन्होंने तपाक से कहा, “बिल्कुल आपके वाले तरीके से, जैसा आपने अपनी कहानी में बताया! मैं सिज़ोफ्रेनिया का इलाज करता ही नहीं। मैं तो मरीज़ के ‘बाकी हिस्सों’ (यानी उसकी खूबियों और इंसानियत) का इलाज करता हूँ।”

यह सुनकर मैंने पूरे सम्मान के साथ उनके आगे हाथ जोड़ लिए। गुरु असली बात समझ गए थे!

“तो फिर रिज़ल्ट कैसे मिलते हैं?” मैंने पूछा (हालाँकि जवाब मुझे पहले से ही पता था)।

उन्होंने चहकते हुए कहा, “एकदम शानदार! किसी भी दूसरे इलाज से लाख गुना बेहतर।”


कहानी की सीख:

बात बहुत सीधी सी है। जब आप किसी इंसान पर ‘सिज़ोफ्रेनिक’ या ‘बीमार’ होने का ठप्पा (टैग) लगा देते हैं, तो वह इंसान अनजाने में उसी ठप्पे के हिसाब से अपनी ज़िंदगी ढालने लगता है।

लेकिन जब आप उन्हें एक ऐसे ‘इंसान’ की तरह देखते हैं जिसे सिर्फ कभी-कभार इस बीमारी के दौरे पड़ते हैं—यानी जब आप यह मान लेते हैं कि वे अपनी बीमारी से कहीं बढ़कर हैं—तब आप उनके अंदर के ‘स्वस्थ’ और अच्छे हिस्से को पनपने और खिलने का पूरा मौका देते हैं।