हर साल, हमारी परंपरा के बौद्ध भिक्षु अपना सफर रोक देते हैं और तीन महीने के “वर्षावास” के लिए एक ही जगह पर ठहरते हैं।
वर्षावास शुरू होने से कुछ दिन पहले, एक बूढ़ा घुमक्कड़ भिक्षु एक गरीब किसान की झोपड़ी के दरवाज़े पर पहुँचा। किसान गरीब ज़रूर था, पर बड़ा पक्का और सच्चा बौद्ध भक्त था। उसने भिक्षु को आदर से खाना खिलाया और उनसे प्रार्थना की कि वह वर्षावास के लिए उनके पास ही रुक जाएं।
“भंते जी, मैं आपके लिए नदी के किनारे एक शांत घास के मैदान में एक सादी सी कुटिया बना दूँगा, और मेरी पत्नी को आपको रोज़ भोजन कराने में बड़ी खुशी होगी। हमारी बस एक ही विनती है कि आप समय-समय पर हमें ध्यान करना सिखाएं और हमारा मार्गदर्शन करें।”
बूढ़ा भिक्षु मान गया।
अगले तीन महीनों में, किसान, उसकी पत्नी, यहाँ तक कि उनके बच्चों को भी उस समझदार और दयालु बूढ़े भिक्षु से गहरा लगाव हो गया। प्यार इतना बढ़ गया कि जब वर्षावास खत्म हुआ और बूढ़े भिक्षु ने जाने की बात कही, तो पूरा परिवार रोने लगा और उनसे वहीं रुकने की मिन्नतें करने लगा।
“मैं अब और नहीं रुक सकता,” बूढ़े भिक्षु ने कहा। “लेकिन, क्योंकि तुम लोगों ने मेरी इतनी अच्छी सेवा की है, मैं भी बदले में तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ। कुछ दिन पहले, गहरे ध्यान में मैंने देखा कि पास ही एक बहुत बड़ा खजाना दबा हुआ है। मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हें मिले। मेरी बात ध्यान से सुनो, मेरे निर्देशों का पूरा पालन करो, और तुम फिर कभी गरीब नहीं रहोगे।”
पूरे परिवार का रोना तुरंत बंद हो गया। वे कान लगाकर सुनने लगे। उन्हें उस भिक्षु पर पूरा भरोसा था, क्योंकि बूढ़े भिक्षु कभी झूठ नहीं बोलते!
“सुबह पौ फटने के समय अपनी छोटी सी कुटिया की चौखट पर खड़े होना। अपना धनुष और एक तीर उठाना। धनुष का निशाना उगते सूरज की तरफ लगाना, और जैसे ही सूरज क्षितिज पर दिखाई दे, तीर को छोड़ देना। जहाँ तीर गिरेगा, वहीं तुम्हें खजाना मिलेगा।”
उस शाम बूढ़ा भिक्षु वहाँ से चला गया। अगली सुबह, पूरा परिवार इतना उतावला था कि वे सूरज उगने से बहुत पहले ही उठ गए। किसान अपनी चौखट पर धनुष और एक तीर लेकर मुस्तैद खड़ा हो गया। उसकी पत्नी के हाथ में फावड़ा था। उस सुबह तो मानो सूरज को निकलने में सदियाँ लग रही थीं, पर जब आख़िरकार वह क्षितिज पर उभरा, तो किसान ने सूरज की दिशा में ज़ोर से तीर छोड़ दिया, और वे सब उसके पीछे-पीछे भागे। जहाँ तीर गिरा, किसान ने अपनी पत्नी को गड्ढा खोदने को कहा। वह गहरी, और गहरी खुदाई करती गई।
उसे क्या मिला? कुछ नहीं! सिर्फ और सिर्फ मुसीबत! वह तीर एक अमीर आदमी के खेत में जा गिरा था, और उसने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया।
“तुम दूसरों की प्रॉपर्टी पर गड्ढा नहीं खोद सकते!” अमीर आदमी ने उस बेचारी पत्नी पर चिल्लाते हुए कहा। “मैं तुम पर मुकदमा ठोक दूँगा! सीधा जेल भिजवाऊँगा!”
“यह इनकी गलती है,” पत्नी ने अपने पति की तरफ इशारा करते हुए गिड़गिड़ाई। “इन्होंने ही मुझे यहाँ खोदने को कहा था।”
“यह उस बूढ़े भिक्षु की गलती है,” पति ने सफाई दी। “उसने वादा किया था कि हमें यहाँ खजाना मिलेगा।”
“बूढ़ा भिक्षु?” अमीर आदमी ने पूछा। “खैर, बूढ़े भिक्षु कभी झूठ नहीं बोलते। उसने तुमसे क्या कहा था?”
“सुबह पौ फटने के समय कुटिया की चौखट पर खड़े होना। अपना धनुष और एक तीर उठाना। उगते सूरज की तरफ निशाना लगाना, और सूरज के दिखते ही तीर को छोड़ देना। जहाँ तीर गिरेगा, वहाँ खजाना मिलेगा।”
बूढ़े भिक्षु की बात सुनकर अमीर आदमी उछल पड़ा, “ओह, मुझे समझ आ गया कि तुम कहाँ गलती कर रहे हो! खुद को देखो, किसान। तुम इतने कुपोषित और कमज़ोर हो कि ठीक से एक तीर तक नहीं चला सकते। मैं तुम्हारे साथ एक सौदा करता हूँ। कल, मैं तुम्हारी कुटिया से तीर चलाऊँगा और जब खजाना मिलेगा, तो हम उसे आधा-आधा बाँट लेंगे।”
किसान के पास हामी भरने के सिवा कोई चारा न था। अगली सुबह अमीर आदमी चौखट पर धनुष-तीर लिए सूरज उगने का इंतज़ार कर रहा था, और पति के हाथ में फावड़ा था। (आज गड्ढा खोदना किसान के कर्मों का फल था क्योंकि कल उसने अपनी पत्नी से खुदाई करवाई थी!) जब सूरज क्षितिज पर आया, अमीर आदमी ने पूरी ताकत से तीर चला दिया। तीर बहुत दूर तक गया। वे सब भागते हुए वहाँ पहुँचे और जहाँ तीर गिरा, पति ने एक बड़ा सा गड्ढा खोदा।
क्या मिला? कुछ नहीं! बस और ज़्यादा मुसीबत! इस बार तीर एक सेनापति की ज़मीन पर गिरा था, और उसने उन सबको धर दबोचा।
“तुम मेरी ज़मीन कैसे खराब कर सकते हो!” सेनापति चीखा। “मैं अभी अपने सैनिकों को तुम्हारे सिर कलम करने का हुक्म दूँगा!”
“यह इनकी गलती है,” किसान ने अमीर आदमी की तरफ इशारा किया। “इन्होंने मुझे यहाँ खोदने को कहा था।”
“यह उस बूढ़े भिक्षु की गलती है,” अमीर आदमी बोला। “उसने वादा किया था कि खजाना मिलेगा।”
“बूढ़ा भिक्षु?” सेनापति बोला। “खैर, बूढ़े भिक्षु झूठ नहीं बोलते। क्या कहा था उसने?”
“सुबह पौ फटने के समय कुटिया की चौखट पर खड़े होना। अपना धनुष और एक तीर उठाना। उगते सूरज की तरफ निशाना लगाना, और सूरज के दिखते ही तीर को छोड़ देना। जहाँ तीर गिरेगा, वहाँ खजाना मिलेगा।”
बात सुनकर सेनापति ने ऐलान किया, “ओह, मैं समझ गया कि तुम सब कहाँ गच्चा खा गए! एक आम आदमी तीर चलाने के बारे में जानता ही क्या है? मुझ जैसा एक मिलिट्री ट्रेनिंग पाया हुआ फौजी ही धनुष का सही इस्तेमाल कर सकता है। सौदा यह है: कल मैं तीर चलाऊँगा, और जब खजाना मिलेगा, तो हम उसे तीनों में बराबर बाँट लेंगे।”
तो अगली सुबह सेनापति चौखट पर तैयार था, और अमीर आदमी के हाथ में फावड़ा था (आज उसके कर्मों की बारी थी!)। सूरज निकलते ही सेनापति ने एकदम एक्सपर्ट की तरह तीर छोड़ा। तीर बहुत-बहुत दूर गया। सब भागे और जहाँ तीर गिरा, वहाँ अमीर आदमी को बड़ा सा गड्ढा खोदना पड़ा।
क्या मिला? ठेंगा! और भयंकर मुसीबत! तीर सीधा राजा के महल के शाही बगीचे में गिरा था, और राजा के पहरेदारों ने उन सबको तुरंत गिरफ्तार कर लिया। जल्द ही उन्हें जंजीरों में जकड़ कर राजा के दरबार में पेश किया गया।
“शाही बगीचे को बर्बाद करना मौत की सज़ा के लायक जुर्म है,” राजा ने कड़क आवाज़ में कहा। “यह सब क्या बेवकूफी है?”
“यह इनकी गलती है, महाराज,” सेनापति ने अमीर आदमी की तरफ इशारा किया।
“यह इनकी गलती है, जहाँपनाह,” अमीर आदमी ने किसान को फंसाया।
“यह उस बूढ़े भिक्षु की गलती है, माई-बाप,” किसान गिड़गिड़ाया। “उसी ने कहा था कि हमें खजाना मिलेगा।”
“बूढ़ा भिक्षु?” राजा ने सोचा। “हम्म, बूढ़े भिक्षु कभी झूठ नहीं बोलते। क्या कहा था उसने?”
“सुबह पौ फटने के समय कुटिया की चौखट पर खड़े होना। अपना धनुष और एक तीर उठाना। उगते सूरज की तरफ निशाना लगाना, और सूरज के दिखते ही तीर को छोड़ देना। जहाँ तीर गिरेगा, वहाँ खजाना मिलेगा।”
राजा को भी समझ नहीं आया कि आख़िर गलती कहाँ हो रही है। उसने अपने सैनिक दौड़ाए और उस बूढ़े भिक्षु को महल में पकड़ कर लाने का हुक्म दिया ताकि वह खुद इस बात की सफाई दे सके। जल्द ही भिक्षु को ढूँढकर राजा के सामने हाज़िर किया गया।
“बूढ़े भिक्षु,” राजा ने इज़्ज़त से कहा। “तुमने अपनी इस गड़े हुए खजाने की कहानी से इन सब लोगों को भारी मुसीबत में डाल दिया है। बताओ यह सब क्या माजरा है।”
“महाराज, यह कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं है। बूढ़े भिक्षु कभी झूठ नहीं बोलते,” भिक्षु ने शांति से समझाया। “इन्हें खजाना इसलिए नहीं मिला क्योंकि इन्होंने मेरी बात ध्यान से सुनी ही नहीं।”
“तुम्हारे निर्देशों का ऐसा कौन सा हिस्सा था जो इन्होंने नहीं माना?” राजा की उत्सुकता बढ़ गई।
“महाराज, कल आप खुद उस गरीब किसान की कुटिया पर क्यों नहीं चलते? मैं आपको दिखाऊँगा कि ये सब मेरी बात का पालन करने में कैसे फेल हुए। मैं गारंटी देता हूँ कि आपको खजाना मिलेगा, पर मेरी शर्त यह है कि उसे आप, सेनापति, अमीर आदमी और इस किसान के बीच चार बराबर हिस्सों में बाँटा जाएगा।”
राजा मान गया।
तो अगले दिन सुबह-सुबह किसान का पूरा परिवार, अमीर आदमी, सेनापति, बूढ़ा भिक्षु और खुद राजा उस छोटी सी कुटिया पर मौजूद थे। बूढ़े भिक्षु ने फिर से निर्देश दोहराए।
“सुबह पौ फटने के समय अपनी छोटी सी कुटिया की चौखट पर खड़े होना। अपना धनुष और एक तीर उठाना। धनुष का निशाना उगते सूरज की तरफ लगाना, और जैसे ही सूरज क्षितिज पर दिखाई दे, तीर को छोड़ देना। जहाँ तीर गिरेगा, वहीं तुम्हें खजाना मिलेगा।”
जब राजा भोर के समय उस छोटी कुटिया की चौखट पर खड़ा था, तो उसने कन्फर्म करने के लिए बूढ़े भिक्षु की तरफ देखा।
“बिल्कुल सही, महाराज,” बूढ़े भिक्षु ने कहा।
राजा ने धनुष और एक तीर उठा लिया।
“एकदम सही, महाराज।”
राजा ने उगते सूरज की दिशा में निशाना साधा।
“यह भी एकदम सही है, महाराज।”
जैसे ही सूरज क्षितिज के ऊपर आया, राजा तीर चलाने ही वाला था कि तभी बूढ़ा भिक्षु ज़ोर से चिल्लाया, “रुकिए! गलत कर रहे हैं, महाराज!”
राजा रुक गया और कन्फ्यूज़न में भिक्षु को घूरने लगा।
“ध्यान से सुनिए, महाराज। मैंने कहा था, ‘तीर को छोड़ देना।’”
राजा कुछ पल के लिए रुका, अपने मन में उन शब्दों को दोहराया। और फिर… वह मुस्कुराने लगा। वह असली बात समझ गया था।
राजा ने तीर पर से अपनी पकड़ छोड़ दी, और वह तीर सीधा नीचे गिरा, और ठीक उसके दोनों पैरों के बीच, ज़मीन पर गिर गया—बिल्कुल वहीं जहाँ वह खड़ा था।
वहाँ एक छोटा सा गड्ढा खोदा गया, और उन्हें इतना विशाल खजाना मिला कि उसका एक-चौथाई हिस्सा ही किसी राजा को पूरी तरह तृप्त करने के लिए काफी था, सेनापति और अमीर आदमी की तो बात ही छोड़िए! और ज़रा सोचिए, उस गरीब किसान और उसके परिवार की कितनी भयंकर लॉटरी लगी होगी!
बूढ़े भिक्षु ने आगे समझाया कि जब आप खुशी पाने के लिए “चाहत का तीर” दूर दुनिया में चलाते हैं, तो आमतौर पर आपको कुछ नहीं मिलता, सिर्फ और ज़्यादा मुसीबतें मिलती हैं। लेकिन अगर आप ‘कुछ भी पाने की उस चाहत’ के तीर को छोड़ देते हैं, तो वह ठीक वहीं गिरता है जहाँ आप खड़े हैं—यानी ‘यहाँ और अभी’ में। वहीं आपको संतुष्टि का ऐसा खजाना मिलेगा, जो एक राजा की भूख मिटाने के लिए भी काफी से कहीं ज़्यादा है।
मैं खुद इस बात की पक्की गवाही दे सकता हूँ, क्योंकि मैं भी एक बूढ़ा भिक्षु हूँ… और बूढ़े भिक्षु कभी झूठ नहीं बोलते!
