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सुनामी वाला मगरमच्छ मुख्य > हास्य > चिंता छोड़ो, चिड़चिड़े रहो! 7. हास्य

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सुनामी वाला मगरमच्छ

लेखक: अजान ब्रह्म
| 2 मिनट



2004 की भयंकर सुनामी से बच निकलने की कई हैरान कर देने वाली कहानियाँ सामने आई थीं। उन्हीं में से एक कहानी यह है कि कैसे ‘करुणा और दया’ ने एक श्रीलंकाई आदमी की जान बचा ली।

वह आदमी हर सुबह समंदर से जुड़ी एक खारे पानी की झील (Lagoon) के किनारे जाता था और कटी हुई ब्रेड से मछलियों को दाना खिलाता था। एक सुबह, वहाँ एक बड़ा सा मगरमच्छ आ गया। श्रीलंका के मगरमच्छ बहुत खतरनाक होते हैं। वे इंसानों का शिकार करने के लिए जाने जाते हैं।

लेकिन डरे बिना, उस दयालु इंसान ने ब्रेड के कुछ टुकड़े उस मगरमच्छ की तरफ फेंक दिए। मगरमच्छ ने उन्हें झपट्टा मारकर खाया और चुपचाप तैरकर दूर चला गया।

उस दिन के बाद से, वह मगरमच्छ हर सुबह अपने ‘ब्रेड वाले नाश्ते’ के लिए वहाँ आने लगा और अपना हिस्सा खाकर शांति से वापस लौट जाता।

जिस सुबह सुनामी आई, वह आदमी मछलियों को खाना खिला रहा था। पानी के बिल्कुल किनारे होने की वजह से, वह तेज़ लहरों की चपेट में आ गया और समंदर के अंदर बहने लगा। सबसे पहले, उसने बचने के लिए एक लकड़ी की कुर्सी को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन सुनामी की ताकत इतनी ज़्यादा थी कि कुर्सी उसके हाथों से छिन गई। फिर उसने लकड़ी के एक और टुकड़े को पकड़ा, पर लहरों ने उसे भी दूर खींच लिया। डूबने की कगार पर पहुँच चुके उस आदमी को अपने करीब तैरता हुआ लकड़ी का एक बड़ा सा लट्ठा दिखाई दिया, जिसे उसने कसकर पकड़ लिया। वह किसी तरह उसे पकड़े रहने और अपनी साँसें वापस बटोरने में कामयाब रहा।

जब उसके होश थोड़े ठिकाने आए, तो उसने एक बहुत ही अजीब बात नोटिस की। जहाँ बाकी सारी चीज़ें पानी के तेज़ बहाव के साथ गहरे समंदर के अंदर खिंची जा रही थीं, वहीं उसका वह ‘लट्ठा’ बहाव की उल्टी दिशा में, किनारे की तरफ बढ़ रहा था!

जब वह सूखी ज़मीन के काफी करीब पहुँच गया, तो वह आदमी उस लट्ठे से कूद गया और घिसटता हुआ किनारे पर सुरक्षित पहुँच गया। तब जाकर उसने ध्यान दिया कि उसके उस ‘लट्ठे’ की तो एक लंबी सी पूँछ भी थी। वह कोई लकड़ी का लट्ठा नहीं, बल्कि वही मगरमच्छ था!

हमेशा कमियां निकालने वाले लोग (Cynics) कहते हैं कि मगरमच्छ ने उस आदमी को सिर्फ इसलिए बचाया ताकि अगले दिन सुबह उसे फिर से खाने के लिए ब्रेड मिल सके।

लेकिन समझदार लोग जानते हैं कि वह मगरमच्छ असल में उस आदमी की ‘दयालुता’ का कर्ज़ अपनी ‘करुणा’ से चुका रहा था।