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दूध और कुकीज़

लेखक: अजान ब्रह्म
| 2 मिनट



अमेरिका के एक जाने-माने अस्पताल के एक सीनियर सर्जन ने रेफर होकर आई एक महिला की मेडिकल रिपोर्ट देखी। उसका कैंसर आखिरी स्टेज पर था, और उस इलाके के बाकी सभी अस्पताल जवाब दे चुके थे। कोई भी इलाज बहुत जटिल और महंगा होने वाला था, और उसके बचने की उम्मीद बहुत कम थी। उसकी सारी जानकारी जांचने और कुछ और पूछताछ करने के बाद, डॉक्टर ने इस मुश्किल केस को अपने हाथों में ले लिया।

उनके साथी डॉक्टर हैरान थे कि वह इस महिला के इलाज के लिए इतने सारे संसाधन और मेहनत क्यों लगा रहे हैं। उन्होंने देश के दूसरे हिस्सों से बड़े-बड़े विशेषज्ञों को बुलाने के लिए अपने कई संपर्कों का इस्तेमाल किया और इस एक मरीज की मदद करने के लिए अपना बहुत सारा कीमती समय और ऊर्जा लगा दी।

डॉक्टर की यह असाधारण मेहनत रंग लाई। कई महीनों के लंबे इलाज के बाद, वह उस महिला को यह खुशखबरी दे पाए कि उसका कैंसर अब पूरी तरह से खत्म हो चुका है और वह अभी कई और सालों तक खुशी-खुशी जी सकती है। वह महिला खुशी से झूम उठी।

कुछ दिनों बाद, उसे अस्पताल का बिल डाक से मिला। उसने डरते-डरते लिफाफा खोला, उसे लग रहा था कि बिल लाखों डॉलर्स का होगा जिसे वह कभी नहीं चुका पाएगी। लेकिन इसके बजाय, उसने देखा कि बिल पर डॉक्टर ने अपनी हैंडराइटिंग में लिखा था:

“पच्चीस साल पहले एक गिलास दूध और दो कुकीज़ के साथ पूरा बिल चुकाया जा चुका है।”

बात पच्चीस साल पुरानी है, जब वह डॉक्टर एक गरीब मेडिकल छात्र हुआ करता था और अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए छोटे-मोटे काम करता था। ऐसा ही एक काम था घर-घर जाकर सामान बेचना। एक बेहद गर्म दोपहर को, जब दिन भर उसका कोई भी सामान नहीं बिका था, तो उसने एक और दरवाज़ा खटखटाया और एक महिला ने दरवाज़ा खोला। उसने उसकी रटी-रटाई बातें सुनीं और कुछ भी खरीदने से मना कर दिया। लेकिन फिर उस थके हुए नौजवान को देखकर उसने पूछा, “क्या तुमने अभी तक कुछ खाया है?”

उसने जवाब दिया, “सुबह के नाश्ते के बाद से कुछ नहीं, मैम।”

“तो तुम बस यहीं रुको,” उसने कहा, और वह तुरंत उस थके-हारे मेडिकल छात्र के लिए एक गिलास दूध और दो कुकीज़ (बिस्कुट) लेकर लौटी।

पच्चीस साल बाद, वह छात्र एक बड़े अस्पताल में एक सीनियर सर्जन बन चुका था। जब उसने उस महिला की मेडिकल रिपोर्ट देखी, तो उसका नाम सुनकर डॉक्टर को कुछ याद आया। कुछ फोन कॉल्स से यह पक्का हो गया कि वह वही दयालु महिला थी जिसने उस तपती दोपहर में उसे वह नाश्ता दिया था।

सालों पहले की गई उस छोटी सी नेकी के प्रति आभार जताने के लिए, जिसे वह कभी नहीं भूला था, उस डॉक्टर ने न केवल उसके कैंसर का इलाज करने में अपनी पूरी जान लगा दी, बल्कि उसके इलाज का सारा बिल भी खुद ही चुका दिया।


कहानी की सीख: आपके द्वारा की गई कोई भी नेकी या दयालुता कभी बेकार नहीं जाती। किसी के लिए किया गया एक छोटा सा अच्छा काम भी इतना असरदार हो सकता है कि वह सालों बाद एक चमत्कार बनकर आपके ही पास लौट आए!