✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
भोगवाद की शुरुआत मुख्य > हास्य > चिंता छोड़ो, चिड़चिड़े रहो! 7. हास्य

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भोगवाद की शुरुआत

लेखक: अजान ब्रह्म
| ३ मिनट



एक भिक्षुणी बहुत ही सादा जीवन जीती थी। उसके पास नाम मात्र का सामान था और वह एक गुफा में रहा करती थी। हर सुबह, वह अपना भिक्षा पात्र लेकर पास के गांव जाती और बस दिन के एक समय के भोजन लायक खाना मांग लाती। उसके पास ध्यान करने, पढ़ने और गांव वालों को अपनी शिक्षाएं देने के लिए बहुत सारा समय होता था।

एक सुबह जब वह भिक्षा मांगकर लौटी, तो उसने देखा कि उसके अतिरिक्त चीवर (पहनने वाले कपड़े) में एक छेद हो गया था। इसलिए उसने कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा ढूंढा और अपने हाथों से उसे वहां सिल कर पैबंद लगा दिया।

उसने ऐसा पहले भी किया था। दरअसल, उसकी गुफा में चूहों का एक परिवार रहता था, जिन्हें उसके कपड़े कुतरना बहुत पसंद था। सिलाई करते समय उसने सोचा कि अगर उसके पास एक बिल्ली होती, तो चूहे नहीं होते, और उसे बार-बार पैबंद लगाने में इतना समय बर्बाद नहीं करना पड़ता। इसलिए अगले दिन, उसने गांव वालों से एक बिल्ली मांगी, और उन्होंने खुशी-खुशी उसे एक बहुत ही शांत भूरे रंग की बिल्ली दे दी, जिसका रंग उसके कपड़ों से बिल्कुल मेल खाता था।

अब बिल्ली को दूध और मछलियां चाहिए थीं, इसलिए भिक्षुणी को हर सुबह गांव वालों से ये अतिरिक्त चीजें मांगनी पड़ती थीं। एक सुबह, उसने सोचा कि अगर उसके पास अपनी खुद की एक गाय होती, तो उसे चूहों को भगाने वाली बिल्ली को पिलाने के लिए रोज-रोज दूध नहीं मांगना पड़ता। इसलिए उसने अपने एक अमीर समर्थक से एक गाय मांग ली।

एक बार भिक्षुणी के पास गाय आ गई, तो उसे गाय को खिलाने के लिए घास लानी पड़ी। इसलिए वह गांव वालों से अपनी गाय के लिए घास मांगने लगी—ताकि वह गाय बिल्ली को दूध दे सके, जो चूहों को भगाए, ताकि वे उसके कपड़े न कुतरें।

कुछ दिनों बाद, भिक्षुणी ने सोचा कि अगर उसका अपना एक खेत होता, तो उसे रोज-रोज घास के लिए बेचारे गांव वालों को परेशान नहीं करना पड़ता। इसलिए उसने चंदा इकट्ठा करके पास का एक चरागाह खरीद लिया—ताकि वह अपनी गाय के लिए घास उगा सके, जो बिल्ली को दूध दे सके, जो चूहों को भगाए, ताकि वे उसके कपड़े न कुतरें।

चरागाह की देखभाल करना, हर सुबह गाय को पकड़ना और उसका दूध निकालना बहुत मेहनत का काम था। इसलिए उसने सोचा कि एक लड़का रख लेना मददगार होगा, जो उसके लिए ये सारे काम कर सके। इसके बदले में, भिक्षुणी उसे नैतिक शिक्षा और मार्गदर्शन देगी।

गांव वालों ने एक गरीब परिवार के लड़के को चुन लिया, जिसे सच में कुछ नैतिक शिक्षा की सख्त जरूरत थी। अब उसके पास एक लड़का था जो चरागाह की देखभाल करे, ताकि वह गाय के लिए घास ला सके, जो बिल्ली को दूध दे सके, जो चूहों को भगाए, ताकि वे उसके कपड़े न कुतरें।

अब भिक्षुणी को हर सुबह दोगुने से भी ज्यादा खाना मांगना पड़ता था, क्योंकि बढ़ते हुए लड़के बहुत खाते हैं। इसके अलावा, उसे लड़के के सोने के लिए पास ही एक छोटी सी झोपड़ी की भी जरूरत थी, क्योंकि किसी लड़के का भिक्षुणी के साथ गुफा में सोना नियमों के खिलाफ था। इसलिए उसने गांव वालों से लड़के के लिए एक झोपड़ी बनाने को कहा—वह लड़का जो चरागाह की देखभाल करता था, ताकि गाय के लिए घास आए, जो बिल्ली को दूध दे सके, जो चूहों को भगाए, ताकि वे उसके कपड़े न कुतरें।

इस समय तक, उसने गौर किया कि गांव वाले उससे कतराने लगे थे। उन्हें डर लगने लगा था कि वह फिर से कुछ और मांग लेगी। यहां तक कि जब वे दूर से किसी भूरी गाय को आते देखते, तो उसे भिक्षुणी समझकर भाग जाते या अपने घरों में छिपकर दरवाजों की कुंडी लगा लेते और खिड़कियों के पर्दे गिरा देते।

एक दिन जब एक गांव वाला ध्यान पर कुछ सवाल पूछने आया, तो उसने कहा, “माफ़ करना। अभी नहीं। मैं बहुत व्यस्त हूं। मुझे उस लड़के के लिए बन रही झोपड़ी देखने जाना है, जो मेरे खेत की देखभाल करता है, ताकि मेरी गाय को घास मिले, जो मेरी भूरी बिल्ली को दूध देती है, जो चूहों को दूर रखती है, ताकि मुझे अपने कपड़ों में बार-बार पैबंद न लगाना पड़े।”

उसने ध्यान दिया कि वह क्या कह रही थी और अचानक उसे अहसास हुआ: “यही तो भोगवाद की शुरुआत है।”

उसने तुरंत गांव वालों से उस झोपड़ी को तोड़ने को कहा, लड़के को उसके परिवार के पास वापस भेज दिया, गाय और खेत दान कर दिए, और अपनी बिल्ली के लिए एक अच्छा घर ढूंढ लिया।

कुछ दिनों बाद, वह अपनी उसी पुरानी सादी जिंदगी में लौट आई, जहां उसके पास बहुत कम सामान था और वह गुफा में रहती थी। एक सुबह जब वह गांव से दिन भर के लिए बस थोड़ा सा भिक्षा का भोजन लेकर लौटी, तो उसने देखा कि एक चूहे ने उसके कपड़े में एक और छेद कर दिया था।

एक शांत मुस्कान के साथ, उसने उस पर एक और पैबंद सिल दिया।


कहानी की सीख: हमारी ज़रूरतें कभी खत्म नहीं होतीं। अपनी एक छोटी सी परेशानी को मिटाने की चाहत में हम अक्सर अपनी इच्छाओं और चीज़ों का ऐसा पहाड़ खड़ा कर लेते हैं, जो हमारी असली शांति और आज़ादी ही छीन लेता है। जीवन का सच्चा सुख सुविधाओं को बढ़ाने में नहीं, बल्कि जो है उसी में संतुष्ट रहने और छोटी-मोटी परेशानियों को मुस्कुराकर सुलझा लेने में है!