एक आदमी जंगल से गुजर रहा था तभी उसकी नज़र एक गड्ढे पर पड़ी। वह रुककर अंदर देखने लगा और उसे गड्ढे की तलहटी में सोने की एक बड़ी थैली दिखाई दी। उसने खजाना पाने के लिए हाथ अंदर डाला, लेकिन गड्ढा बहुत गहरा था। उसने चाहे जितनी कोशिश की और चाहे जितना खिंचाव डाला, उसका हाथ सोने तक नहीं पहुँच सका। अंत में उसने हार मान ली।
जैसे ही वह जंगल में आगे बढ़ा, उसे एक दूसरा आदमी मिला। उसने उसे उस गड्ढे में रखे सोने के बारे में बताया कि वह कितनी गहराई पर है और हाथ वहां तक नहीं पहुंच पा रहा है। दूसरे आदमी ने एक हुक वाली छड़ी उठाई, गड्ढे के पास गया और उस छड़ी की मदद से सोना बाहर निकाल लिया।
समस्या यह नहीं थी कि गड्ढा बहुत गहरा था, बल्कि समस्या यह थी कि पहले आदमी का हाथ छोटा था। दूसरे आदमी ने हुक वाली छड़ी से अपने हाथ की लंबाई बढ़ा ली और वह आसानी से खजाने तक पहुँच गया।
खुशी कभी भी पहुँच से इतनी दूर नहीं होती कि हम उसे पा न सकें। हमें बस अपनी समझदारी (प्रज्ञा) और करुणा को बढ़ाने की ज़रूरत है। फिर हम किसी भी चीज़ को हासिल कर सकते हैं।
कहानी की सीख: जब हम जीवन में किसी चीज़ को पाने में असफल होते हैं, तो अक्सर हम दोष बाहर की परिस्थितियों (गड्ढे की गहराई) को देते हैं। लेकिन असली सुधार हमारी अपनी क्षमताओं और नजरिए को ‘लंबा’ या ‘विकसित’ करने में है। प्रज्ञा और करुणा वो छड़ी हैं, जो असंभव दिखने वाले लक्ष्यों को भी हमारी पहुंच में ले आती हैं।
