उत्तर भारत के पहाड़ों में स्थित एक प्रसिद्ध बौद्ध विहार अपनी उच्च कोटि के सिद्ध भिक्षुओं के लिए जाना जाता था। हाल ही में वहाँ एक नए मठाधीश चुने गए थे, जो उनके आध्यात्मिक गुरु भी थे। चूंकि सर्दियाँ नज़दीक आ रही थीं, युवा भिक्षुओं ने अपने नए गुरु से पूछा कि इस बार मौसम कैसा रहेगा—कड़ाके की ठंड पड़ेगी या सामान्य सर्दी होगी?
नए मठाधीश का ध्यान अभी इतना विकसित नहीं हुआ था कि वे मौसम का पूर्वानुमान लगा सकें। फिर भी, खुद को सुरक्षित रखने और अपने शिष्यों पर प्रभाव जमाने के लिए उन्होंने कह दिया कि इस बार बहुत कड़ाके की ठंड पड़ने वाली है, इसलिए सभी भिक्षुओं को ढेर सारी सूखी लकड़ियाँ इकट्ठा कर लेनी चाहिए।
कुछ दिनों बाद, उनके दिमाग में एक विचार आया। उन्होंने स्थानीय मौसम विभाग को फोन किया और वहाँ के मौसम विज्ञान के प्रोफेसर से बात की, जिनके पास ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च डिग्रियां थीं। मठाधीश ने अपनी पहचान छुपाते हुए पूछा, “प्रोफेसर, इस साल हमें कैसी सर्दियों की उम्मीद करनी चाहिए?”
“संकेत बताते हैं कि इस बार बहुत ठंडी सर्दी होगी,” प्रोफेसर ने कहा।
इसीलिए, अगले ही दिन मठाधीश ने अपने भिक्षुओं से और भी अधिक जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने को कहा।
एक हफ्ते बाद, मठाधीश ने मौसम विभाग को फिर से एक अज्ञात फोन किया, “प्रोफेसर, क्या अभी भी कड़ाके की ठंड के ही संकेत हैं?”
“संकेत और भी गंभीर दिख रहे हैं, श्रीमान,” प्रोफेसर ने उत्तर दिया। “ऐसा लग रहा है कि यह बहुत ही ज़्यादा ठंडी सर्दी होने वाली है।”
अगली सुबह मठाधीश ने अपने भिक्षुओं को घोषणा की कि उन्हें जितनी भी सूखी लकड़ियाँ मिलें, वे सब उठा लाएँ, क्योंकि वे अपने ‘पूर्वानुमान’ से देख रहे हैं कि यह पहाड़ों में अब तक की सबसे भयानक सर्दियों में से एक होने जा रही है।
बाद में मठाधीश को लगा कि शायद उन्होंने कुछ ज़्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर बोल दिया है, और अगर उनका अनुमान गलत निकला तो उनकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। इसलिए उन्होंने फिर से स्थानीय मौसम विभाग के प्रमुख को फोन लगाया, “प्रोफेसर, क्या आप पूरी तरह आश्वस्त हैं कि संकेत बहुत कड़ाके की ठंड की भविष्यवाणी कर रहे हैं?”
“बिल्कुल निश्चित!” प्रोफेसर ने जवाब दिया। “वास्तव में, संकेत दिन-ब-दिन और गंभीर होते जा रहे हैं। यह सचमुच एक अत्यंत ठंडी सर्दी होने वाली है।”
“आप इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं?” अज्ञात कॉलर ने पूछा।
विद्वान प्रोफेसर ने उत्तर दिया, “क्योंकि हमारे स्थानीय विहार के सभी पवित्र भिक्षु पागलों की तरह लकड़ियाँ इकट्ठा करने में जुटे हुए हैं!”
जिस मित्र ने मुझे यह कहानी भेजी थी, उसने कहा कि यह इस बात का एक सटीक रूपक है कि शेयर बाज़ार (stock market) कैसे काम करता है। वह बिल्कुल सही हो सकता है!
कहानी की सीख: समाज में अक्सर लोग एक-दूसरे को देखकर ही किसी धारणा को सच मान लेते हैं। जब विशेषज्ञ जनता के व्यवहार को देखकर अपनी राय बनाते हैं, और जनता विशेषज्ञों की राय देखकर वैसा व्यवहार करती है, तो यह ‘अंधों के पीछे अंधों के चलने’ जैसा हो जाता है। बिना सोचे-समझे भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय, गहराई से सच्चाई को जानना ज़रूरी है।
