एक बार की बात है, दो मुर्गी पालक (पोल्ट्री वाले) थे। पहला सुबह जल्दी उठा, अपनी टोकरी उठाई और रात भर की ‘पैदावार’ इकट्ठा करने के लिए मुर्गियों के दड़बे में घुस गया। उसने अपनी पूरी टोकरी मुर्गियों की ‘गंदगी’ (पॉटी) से भर ली और अंडों को वहीं ज़मीन पर सड़ने के लिए छोड़ दिया। फिर वह गंदगी से भरी उस टोकरी को अपने घर के अंदर ले आया, जिससे पूरे घर में भयंकर बदबू फैल गई। उस बेवकूफ़ इंसान की इस हरकत से उसका परिवार बहुत खफा हुआ।
दूसरे मुर्गी पालक ने भी टोकरी उठाई और रात की पैदावार इकट्ठा करने अपने दड़बे में गया। पर उसने अपनी टोकरी सिर्फ ‘अंडों’ से भरी, और मुर्गियों की गंदगी को वहीं दड़बे में सड़ने के लिए छोड़ दिया। (वह गंदगी बाद में एक बेहतरीन खाद बन जाएगी, पर आप उसे अपने साथ घर के अंदर तो नहीं लाते न!) वह घर में सिर्फ अंडे लेकर आया, अपने परिवार के लिए एक शानदार ऑमलेट बनाया, और बचे हुए अंडों को बाज़ार में बेचकर अच्छे पैसे भी कमा लिए। उस समझदार मुर्गी पालक से उसका परिवार बहुत खुश हुआ।
इस कहानी का असली मतलब यह है:
जब आप अपने बीते हुए कल (या आज के दिन) की ‘पैदावार’ इकट्ठा करते हैं, तो अपनी टोकरी में क्या भरकर घर लाते हैं?
क्या आप उन लोगों में से हैं जो आज के (या पूरी ज़िंदगी के) सारे बुरे और कड़वे अनुभवों को बटोर कर घर ले आते हैं: “जानू, आज पुलिस वाले ने मुझे तेज़ गाड़ी चलाने के लिए पकड़ लिया!” या “डार्लिंग, आज ऑफिस में बॉस मुझ पर बुरी तरह भड़का!”
या फिर आप ऐसे इंसान हैं जो उन सभी नकारात्मक अनुभवों को वहीं अतीत में छोड़ देते हैं (जहाँ उनकी असली जगह है), और घर में सिर्फ ‘खुशी के पलों’ को ही लेकर आते हैं?
तो खुद से पूछिए— आप क्या हैं? ‘गंदगी’ बटोरने वाले… या ‘अंडे’ बटोरने वाले?
