✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
मैं पर्याप्त अच्छी हूँ मुख्य > हास्य > चिंता छोड़ो, चिड़चिड़े रहो! 7. हास्य

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मैं पर्याप्त अच्छी हूँ

लेखक: अजान ब्रह्म
| 2 मिनट



जब आपके भीतर आत्म-सम्मान की एक स्वस्थ भावना होती है, तो आपको कभी भी दूसरों के साथ “मैं तुमसे बेहतर हूँ” का खेल खेलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। आपको खुद को साबित करने की कोई आवश्यकता नहीं होती। आत्म-सम्मान की यह स्वस्थ समझ इस बात को महसूस करने से आती है कि वास्तव में ‘परफेक्ट’ या ‘पूर्ण’ होने का असली अर्थ क्या है।

एक महिला जंगल में एक पूरी तरह से ‘परफेक्ट’ पेड़ की तलाश में घूम रही थी। लेकिन उसे हर तरफ केवल टेढ़े-मेढ़े पेड़, टूटी टहनियों वाले पेड़ और खराब छाल वाले पेड़ ही दिखाई दिए। फिर वह सरकार द्वारा प्रबंधित एक कृत्रिम बागान में गई, जहाँ उसने देखा कि सभी पेड़ कतारों और सीधी रेखाओं में पूरी तरह से व्यवस्थित थे—बिल्कुल सीधे, और उनकी सभी शाखाएँ अपनी जगह पर एकदम सटीक थीं।

वहाँ खड़े होकर उसने महसूस किया कि प्राकृतिक जंगल के वे टूटे-फूटे और अधूरे पेड़ इस कृत्रिम बागान के “परफेक्ट” पेड़ों की तुलना में कहीं अधिक सुंदर और शांति देने वाले थे। तब उसे यह भी समझ आया कि तथाकथित कमियों या जीवन के घावों से घिरे लोग भी इन बनावटी और दिखावटी लोगों से कहीं ज़्यादा खूबसूरत होते हैं।

वह खुद को लेकर सहज महसूस करने लगी, ठीक वैसे ही जैसे वह उस प्राकृतिक जंगल में उन उलझे हुए और टेढ़े-मेढ़े पेड़ों के बीच सहज महसूस कर रही थी।

वह परफेक्ट का असली अर्थ समझ चुकी थी। वह बहुत पहले से ही जैसी भी थी, “पर्याप्त अच्छी” थी; बस इसका अहसास उसे उस जंगल में आकर हुआ।


कहानी की सीख: समाज ने ‘परफेक्ट’ होने की जो बनावटी परिभाषाएँ तय की हैं, वे हमें अक्सर खुद को कमतर आंकने पर मजबूर करती हैं। लेकिन प्रकृति हमें सिखाती है कि असल खूबसूरती और शांति हमारी कमियों, हमारे अनूठेपन और हमारे स्वाभाविक रूप में ही छिपी है। दूसरों की तरह सीधे और कतार में खड़े होने की होड़ छोड़ने और खुद को अपनी सभी खूबियों-खामियों के साथ स्वीकार करने का नाम ही सच्चा आत्म-सम्मान है।