आज की दुनिया में किसी ‘ह्यूमन बीइंग’ (human being, या इंसान) को खोजना बहुत दुर्लभ हो गया है। वे हमेशा कहीं न कहीं जा रहे होते हैं, शायद ही कभी ‘यहाँ’ (वर्तमान में) मौजूद होते हैं। इसीलिए मैं उन्हें “ह्यूमन गोइिंग्स” (human goings या भागते हुए मानव) कहता हूँ। हम केवल शांत होकर ‘होने’ की कला को पूरी तरह भूल चुके हैं।
एक वीकेंड पर मैं अपने बौद्ध मंदिर में प्रशासन के कुछ कामों में बहुत व्यस्त था, तभी मेरे एक पुराने मित्र ने मुझसे पूछा कि सब कैसा चल रहा है।
मैंने जवाब दिया, “बस, मैं वहाँ पहुँच ही रहा हूँ (I’m getting there)।”
उसने बड़ी समझदारी से प्रतिप्रश्न किया, “वह कौन सी जगह है जहाँ तुम पहुँच रहे हो?”
मैं तुरंत उसकी बात का गहरा अर्थ समझ गया और मैंने यहाँ-वहाँ भागना बंद कर दिया।
मैंने थोड़े संकोच के साथ कहा, “तुमने मुझे पकड़ लिया। मुझे लगता है कि इस तरह अंधाधुंध भागदौड़ करके मैं जिस इकलौती जगह पर जल्दी पहुँच रहा हूँ, वह मेरी कब्र है!” हम दोनों मुस्कुरा दिए।
यदि आप भी उन “भागते हुए मानव” (human goings) में से एक हैं, तो खुद से पूछिए: “मैं आखिर कहाँ जा रहा हूँ? और मैं कब वहाँ पहुँचूँगा, या क्या मैं कभी पहुँच भी पाऊँगा?”
जहाँ तक मेरी बात है, मैं तो पहले ही पहुँच चुका हूँ। मैं ‘यहाँ’ तक पहुँच गया हूँ, और अब मैं खुद को एक ‘ह्यूमन बीइंग’ कह सकता हूँ। यह वर्तमान क्षण एक बहुत ही आरामदायक और सुंदर जगह है। मैं हर किसी को सलाह देता हूँ कि वे यहाँ आएं और कुछ समय रुकें, बजाय इसके कि हमेशा यहाँ से दूर भागते रहें और लगातार कहीं और पहुँचने की होड़ में लगे रहें।
अब, जब मेरे मित्र मुझसे पूछते हैं कि सब कैसा चल रहा है, तो मैं जवाब देता हूँ, “मैं बस यहीं हूँ (I’m just being here)!”
