मार का कैबिन
कहीं सुदूर लोक में—असंख्य ब्रह्मांडों के विशाल झुंड में—सबसे मादक और मनमोहक आनंद-उद्यान है। सुंदर युवतियाँ और निश्चिंत तरुण, सदा-खिले फूलों से लदे वृक्षों के कुंजों में विचरते हैं। सुनहरे पत्ते मंद-मंद हवाओं में झूमते हुए धीमी, आलसी धुनें छेड़ते हैं। भव्य पक्षी और विशालकाय तितलियाँ छायादार बागों में उड़ती-फिरती हैं। भूमि धीरे-धीरे ऊपर उठती जाती है, और दूर एक ऊबड़-खाबड़ शिखर पर एक परी-महल दिखता है—घुमावदार मीनारों और जटिल कँगूरों की वह अद्भुत कारीगरी। उसकी साज सज्जा ही इंद्रियों को चकित कर देती है, फिर रत्नजड़ित दीवारों, स्वर्णिम छतों और संगमरमर व जेड के गार्गॉयल्स की तो बात ही क्या!
इस चकाचौंध भरे महल की सबसे ऊँची मीनार में एक बड़ा और आरामदेह कमरा है—एक दफ्तर, यदि यही कहें तो। दुर्लभ लकड़ी और कुशल कारीगरी से बनी एक विशाल मेज के पीछे, एक आरामदायक चमड़े की कुर्सी पर एक सुदर्शन व्यक्तित्व टिका हुआ है। वह लंबा है, रूपवान है, अत्यंत परिष्कृत वेशभूषा और सज्जा में। उसका अंदाज़ कालातीत है, फिर भी फैशनेबल; उसका व्यवहार बहुत साफ और नरम है।। एक अलौकिक सुंदरी देवी उसके पास एक नीची चौकी पर बैठी उसके नाखून सँवार रही है। दूसरी देवी सामने बैठी है—गोद में लिखने वाला पैड लिए।
कम्प्युटर के पीछे बैठा वह सत्ता-पुरुष एक बड़ी सी विंडो स्क्रीन में देखता है, संतोष की मुस्कान होंठों पर। वह खेलते हुए काम जगत के देवताओं को एक पितृवत तृप्ति से निहारता है। थोड़ी देर बाद वह सामने बैठी देवी—अपनी दिव्य सेक्रेटरी—की ओर मुड़कर बोलता है: “थोड़ी देर में एक पत्र लिखवाना है, प्रिये। तब तक, क्या तुम दयालुता करके एक कप कॉफ़ी बना सकती हो, जब तक मैं अपने साम्राज्य का जायज़ा लेता हूँ।” नाखून सँवारने वाली देवी मुस्कुराते और आँख मारते हुए अपने चीजी समेटकर बाहर चली जाती है।
जैसे ही उसकी सेक्रेटरी स्वर्गीय कॉफ़ी-यंत्र की ओर सुंदर चाल से बढ़ती है—इंद्रिय-लोकों का राजकुमार खुद को एक कामुक दृष्टि का सुख लेने देता है, फिर काम पर लग जाता है। उसका अब बेदाग सँवरा हाथ एक कंप्यूटर माउस पर टिक जाता है—गेंडे के दाँत से बना, माणिक की लाल बटन से जड़ा। कुछ चतुर क्लिकों में वह विंडो स्क्रीन का दृश्य बदल देता है।
पहले वह अपने अधिकार क्षेत्र के विभिन्न स्वर्गों का निरीक्षण करता है—आनंद के वे लोक जहाँ देव और देवियाँ बाग-बगीचों में क्रीड़ा करते हैं। स्वर्गीय रथों में घूमते हुए वे एक उत्सव से दूसरे उत्सव, एक दावत से दूसरी दावत में पहुँचते हैं। भव्य वस्त्र पहने, मालाओं और आभूषणों से लदे, वे अपनी ही सुंदरता के नशे में डूबे हैं। स्वर्गीय संगीतकार संगीत बजाते रहते हैं और दिव्य अप्सराएँ युगों-युगों तक बिना रुके नृत्य करती हैं। बेशक, हर बार कभी-कभी इनमें से कोई सत्व—पूफ़!—एक क्रिसमस की बल्ब की तरह बुझ जाता है। बाकी लोग मुश्किल से ध्यान देते हैं; जो थोड़े विचारशील हों, वे क्षण भर रुककर एक-दो बार पलक झपकाते हैं—पर जल्द ही किसी क्षणिक उदासी से बाहर निकल आते हैं।
“आह… मेरे बच्चे, कैसे खेलना पसंद करते हैं! पर कुछ उतने अच्छे से नहीं खेलते जितना खेल सकते थे…”
माउस की एक और हरकत—और विंडो स्क्रीन में पशु-लोक के प्राणी दिखने लगते हैं। भागते और पीछा करते, शिकार करते और निगलते, मैथुन करते और जन्म देते। जाल में फँसे या सर्दी-गर्मी से मरते—वे संक्षिप्त अस्तित्व में आते और चले जाते हैं।
फिर दृश्य बदलता है। प्रेत-लोक प्रकट होता है—धुँधला और अँधेरा। विकृत और कुरूप प्राणी कराहते और चीखते हुए इधर-उधर भटकते हैं। कइयों के पेट फूले हुए हैं और सिर छोटे-छोटे, कुछ जीते-जागते कंकाल हैं, और कुछ कूड़े के ढेरों के आसपास दयनीय रूप से रेंगते फिरते हैं।
फिर नरक-लोक दिखने लगते हैं—आग और पीड़ा के लोक; अथाह क्रूरता और भय के जगत। कुछ प्राणी लाल-तपते लोहे के खूँटों पर गड़े हुए हैं, कुछ को आग के गड्ढों में फेंका जाता है और फिर काँटों से निकाला जाता है। कुछ कड़ाहों में उबाले जा रहे हैं, कुछ चाकुओं से छलनी किए जा रहे हैं।
राजकुमार के होंठों पर घृणा की एक हल्की-सी सिकुड़न आती है। वह अपनी उफनती कॉफ़ी का कप शालीनता से थामता है—ठीक उसी क्षण जब तड़पते सत्वों का एक झुंड धधकते अंगारों के गड्ढे में गिरता है। सेक्रेटरी देवी दिव्य रूठे हुए भाव से बोलती है:–
“यह तो बिल्कुल भयानक है, मार डार्लिंग। मैं समझ नहीं पाती कि तुम उस जगह को चालू क्यों रखते हो।”
एक काली भौंह ऊपर उठता है—
“अरे वाह! जैसे यह मेरी गलती हो! नरक मेरी कोई पसंदीदा शाखा भी नहीं है। मैं तो यही चाहता हूँ कि ये सारे अभागे प्राणी थोड़ी अक्ल से जीएँ—पर वे अपनी उसी बुरी राह पर चलते रहते हैं, तो मैं क्या करूँ? स्वर्ग हो या नरक—यह सब उन्हीं का किया-धरा है। मैं तो बस… कहें तो… थोड़ी सहूलियत देता हूँ—उन्हें यह समझाने में कि इंद्रिय-लोक का जीवन कितना अमूल्य है। हम्म… कॉफ़ी हमेशा की तरह लाजवाब है, प्रिये।”
“तुम बड़े दुष्ट हो। चैनल बदलो।”
माथे पर हल्की शिकन लाते हुए मार माउस क्लिक करता है।
देवी खिलखिला उठती है—
“ओह…मनुष्य-लोक! कितना मनोरंजक है—ये नन्हे-नन्हे बेवकूफ लोग!”
मार की भौंह थोड़ी और सिकुड़ती है। वह बदलती तस्वीरों को गौर से देखता है—मेट्रो स्टेशन पर भागते-दौड़ते लोग; एक परिवार बिना सोचे-समझे टीवी देख रहा है; एक लड़की सड़क पर अपना जिस्म बेच रही है; फौजी एक गाँव जला रहे हैं। वह सोचते हुए कॉफ़ी की चुस्की लेता है।
“बहुत बढ़िया। यह दुनिया भी लगभग पूरी तरह मेरी है…”
अब विंडो स्क्रीन में एक धूल भरी गाँव की गली दिखती है—कुछ मुर्गियाँ इधर-उधर भाग रही हैं, एक-दो खुजलाते आवारा कुत्ते। एक लड़का भैंस की नाक में रस्सी डाले हाँकता हुआ निकलता है। कुछ आदमी आम के पेड़ की छाँव में बैठे बीड़ी पी रहे हैं।
“पर एक छोटी-सी तकलीफदेह… दरार है।”
अब एक मोड़ से काषाय रंग के चीवर ओढ़े भिक्षुओं की एक कतार नज़रें झुकाए चुपचाप चली आ रही है। कुछ बुजुर्ग औरतें आती हैं और अदब से भिक्षुओं के भिक्षा पात्र में भोजन रखती हैं।
मार–“बड़ी कष्ट की बात है… पर शुक्र है यह दरार छोटी है, और इसे बंद करने की कोशिश में हम लगे भी रहते हैं। ज़्यादा लोगों को निकलने नहीं दे सकते ना! अगर यह संसार का खेल ही खत्म हो गया तो हमारा क्या होगा? चलो, अब काम पर लगते हैं। चलो आओ मेरी गोद में बैठो—विभाग के सभी बड़े अफसरों को एक चिट्ठी लिखवानी है।”
