✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
नौवीं सेना — लाभ-सत्कार-कीर्ति, और झूठी प्रतिष्ठा मुख्य > हास्य > मार का पत्र 7. हास्य

नौवीं सेना

लाभ-सत्कार-कीर्ति, और झूठी प्रतिष्ठा

तर्क की नज़र से देखें तो यह समझना मुश्किल है कि इंसान शोहरत का इतना दीवाना क्यों है। यह उनमें से सबसे ज़हीन (अक्लमंद) लोगों को भी बर्बाद करती दिखती है।

अहंकार के इस भ्रम का रोगग्रस्त फुलाव उस नश्वर खोल के लिए बहुत भारी पड़ जाता है—और फिर भी, चाहते वे इसे ही हैं। समझदार लोग भले कहें कि “बुद्धिमान आदमी शोहरत नहीं ढूँढता”—मगर उनकी बात उस भीड़ के शोर में दब जाती है जो गाती है, “कोई रोमांच नहीं जो तुम्हें वैसा चढ़ाए…"—वगैरह-वगैरह।

इस बीमारी की मनोवैज्ञानिक जड़ हमें साफ़ समझनी चाहिए।

अहंकार का यह भ्रम उन्हें बेहद अज़ीज़ (प्यारा) है। लेकिन चूँकि यह असल में एक महज़ फ़रेब है—इसे थामे रखना बड़ा कठिन है और इसमें ज़बरदस्त ऊर्जा लगती है। वह ऊर्जा जो—ज़ाहिर है—किसी काम की चीज़ के लिए बचती ही नहीं। अगर इस खोखले अहंकार को भीड़ की तालियों जैसे बाहरी स्रोतों से हवा दी जाए, तो यह फ़ायदे का सौदा लगने लगता है।

बेशक—यह सब अभी भी भ्रम ही है और इंसान के लिए बेहद ख़तरनाक भी। मगर इसका नशा—बड़ा गहरा होता है।

इस विभाग में हमारे संसाधन अभी तक काफ़ी सीमित थे। पुराने ज़माने में शोहरत का मतलब बस यही था कि अपने शहर के लोग तुम्हें जानते हों—हालाँकि कभी-कभी किसी बादशाह वगैरह के ज़रिए थोड़ा ज़्यादा कर लेते थे। लेकिन अब दाँव बहुत ऊँचे हैं। एक जगह से दूसरी जगह तस्वीरें भेजने की तकनीक के आने से अब यह मुमकिन हो गया है कि एक अकेले इंसान का चेहरा पूरी दुनिया पहचाने।

इस तकनीकी संभावना के साथ-साथ मशहूर हस्तियों का एक ज़बरदस्त पंथ भी खड़ा हो गया है। आम लोग अपनी नीरस ज़िंदगी से बचने के लिए अपने आदर्शों की ज़िंदगी में जीने लगते हैं। यह आपसी बर्बादी का एक शानदार तंत्र है।

टीवी के आदी ये लोग अपनी असली ज़िंदगी से बच निकलते हैं और एक नकली, हवाई दुनिया में क़ैद हो जाते हैं। बेकार और दयनीय—मगर हमारे मक़सद के लिए एकदम मुफ़ीद(फ़ायदेमंद)। और ज़्यादा देर नहीं लगती जब ये वही लोग अपने पूजे हुए आदर्शों को नोचने-खसोटने लगते हैं। दोनों ही तरफ़ से हम जीतते हैं।

बेशक, इस स्तर की शोहरत चंद लोगों तक ही सीमित रहती है। लेकिन पुराने ज़माने वाली शोहरत अभी भी है—जो कहीं ज़्यादा लोगों को अपने जाल में फँसाती है।

यह है वह चाहत—जो एक पक्के जुनून तक फूल सकती है—कि अपने छोटे-से दायरे में जाना-पहचाना और इज़्ज़तदार समझा जाए। अहंकार की आग सुलगाने का यह सबसे सीधा तरीका है।

जब तक वे दफ़्तर में, दोस्तों में, जान-पहचान वालों में अपनी साख की फ़िक्र करते रहेंगे—तब तक वे इस भ्रम में क़ैद रहेंगे कि वे एक असली, ठोस हस्ती हैं।

जब रामू सुनता है कि सब कह रहे हैं—“रामू तो कारखाने का सबसे बढ़िया मैकेनिक है”—तो रामू को तसल्ली मिलती है कि ‘रामू, मैकेनिक’ नाम की अवधारणा सच में है।

और यह तब भी उतना ही काम करता है जब सब कहें—“रामू जैसा घटिया मैकेनिक तो हमने कभी देखा ही नहीं।”

आम तौर पर लोग खुद को वैसे ही परिभाषित करते हैं जैसा दूसरे उन्हें देखते हैं। यही है ‘persona’—वह सार्वजनिक नक़ाब। अच्छा दिखावा करने के जुनून में वे आख़िरकार खुद को भी धोखा दे बैठते हैं और भूल जाते हैं कि असल में वे हैं कौन। जब तक वे बाहर देखते रहेंगे—भीतर नहीं देखेंगे। और बाहर की दिशा—वह हमारा इलाक़ा है।

इसके अलावा, तारीफ़ और तंज़—ये सुख और दुख का एक और ज़बरदस्त ज़रिया हैं। दोहरा दूँ—यही वह गाजर और डंडा है जिससे हम गधों को मनचाही राह पर हाँकते हैं। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि ये चीज़ें कितनी क्षणिक हैं। पहचाने जाने की यह चाहत तृष्णा का एक ताक़तवर स्रोत है—और यह ‘बनने की प्रक्रिया’ को उतना ही भड़काती है जितना कोई ‘ठोस’ इनाम।

तारीफ़ और तंज़ को कहते हैं लौकिक हवाएँ। ये हमारे सबसे काम के हथकंडों में से हैं। यह कि ये बिल्कुल खोखली हैं—यह बात हमें तो मज़ेदार लगती है, मगर उन्हें दिखती नहीं।

इन हवाओं को चलाते रहो—ये सत्वों को संसार के चक्कर में बहुत लंबे समय तक घुमाती रह सकती हैं!