✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
दसवीं सेना — आत्मप्रशंसा और परनिंदा मुख्य > हास्य > मार का पत्र 7. हास्य

दसवीं सेना

आत्मप्रशंसा और परनिंदा

मार अपनी कुर्सी पर पीछे टिककर बैठता है, दोनों हाथ सिर के पीछे।

“कभी-कभी तो मैं खुद ही हैरान हो जाता हूँ अपने आप से। मतलब—बिना मेरे यह टीम कहाँ होती? अगर मैं इतना विनम्र न होता, तो कहना पड़ता कि मैं लगभग परफ़ेक्ट हूँ!”

“मैं तो हमेशा से यही सोचती थी, मार—और आपकी वो सेनाएँ भी वाकई ज़बरदस्त हैं!”

“क्या!? वो नाकाबिल बेकार लोग! अगर मैं हर वक़्त उनकी आया बनकर न खड़ा रहूँ, तो पूरे ब्रह्मांड में गड़बड़ मचा दें! आजकल ढंग का काम करने वाला मिलता ही कहाँ है! ख़ैर, छोड़ो।”

मेरी साहसी और शक्तिशाली दसवीं सेना को—सलाम!

तुम्हारा काम लाज़वाब है—मगर हमारे सौभाग्य से, आसान भी है। आम तौर पर इंसानों में खुद को इतनी गंभीरता से लेने की एक बेहद अतार्किक आदत है। वे अपने अहंकार से बाहर निकलकर सोच ही नहीं पाते। और यह बुनियादी गलतफहमी को और पक्का करने का एक तरीका है—आत्म-प्रशंसा की भावना को बढ़ावा देना।

उन्हें यह सोचने दो कि वे सचमुच बड़े शानदार और नेक इंसान हैं—घमंड से भर दो उन्हें। यही दसवीं सेना की पहली टुकड़ी का काम है।

आत्म-प्रशंसा सभी विकारों को ईंधन देती है। यह भ्रम की एक उत्कृष्ट रचना है—वे गुलाबी चश्मे से आईने में देखते हैं। अपनी कमियाँ देखने में असमर्थ हो जाते हैं और जब कोई उन्हें बताने की कोशिश करे तो आग-बबूला हो उठते हैं।

आत्म-प्रशंसा—आसक्ति और विषय-वासना को भी खूब हवा देती है। आख़िर, मुझ जैसे शानदार इंसान को थोड़ा मज़ा करने का हक़ तो है ना? यह क्रोध को भी भड़काती है—उस धर्मात्मा का तीखा क्रोध जो जानता है कि उसके विचार और राय बिल्कुल सही हैं और बाकी सब मूर्ख हैं।

दो इंसानी अहंकारों को टकराते देखना—बड़ा मज़ेदार तमाशा होता है!

दसवीं सेना की टुकड़ियों की एक ख़ास भूमिका है उन मुश्किल मामलों में जहाँ कोई व्यक्ति आध्यात्मिक प्रगति के संकेत दिखाने लगे। अगर वे मेरी दूसरी सेनाओं के मोटे-मोटे जालों से निकलने लगें—तो हम अक्सर उनकी अपनी जीत को ही उनके खिलाफ़ इस्तेमाल कर सकते हैं—आध्यात्मिक घमंड और अहंकार को बढ़ावा देकर। उनके कान में फुसफुसाओ कि वे कितने महान आध्यात्मिक प्राणी हैं—“देखो मुझे, मैं तो बड़ा महान……..आत्मा हूँ!” यह जाल कितनी ही मछलियों को फँसा चुका है।

उनकी इन शेखीबाज़ों की सच्चाई की ज़्यादा फ़िक्र मत करो। वे अपनी खूबियों के बारे में हास्यास्पद हद तक आत्म-भ्रम में जी सकते हैं। आख़िर उनमें से बहुत कम लोगों में आत्म-निरीक्षण की समझ होती है—और सच्ची आत्म-आलोचना तो और भी कम में।

हालाँकि तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि बहुत से ऐसे भी होंगे जिनकी खुद के बारे में बहुत नकारात्मक छवि है। सही तरीके से संभाला जाए तो यह कोई चिंता की बात नहीं। नकारात्मक हो या सकारात्मक—आत्म-छवि तो आत्म-छवि ही है। और यही खुद को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी है, जो उन्हें बंधन में रखता है। दोनों ही हमारे काम के हैं।

अगर उन्हें यह न समझा सको कि वे बड़े शानदार हैं—तो उन्हें यह समझाओ कि वे कितने घटिया हारे हुए लोग हैं। याद रखो—अहंकार तीन तरह का होता है—“मैं तुमसे बेहतर हूँ; मैं तुमसे बुरा हूँ; और मैं तुम्हारे बराबर हूँ।” तीनों में से कोई भी अहंकार है—मैं अलग हूँ और बाकी सब अलग हैं (द्वैत)"—इस feeling को पक्का करते हैं।

दरअसल, इन दिनों नकारात्मकता एक आम रवैया बन गई है। बहुत से इंसान खुद को ज़्यादा पसंद नहीं करते। (हालाँकि इसके लिए मैं उन्हें ज़्यादा दोष नहीं दे सकता।)

यह एक जटिल परिघटना है—मगर इसकी जड़ आख़िरकार भौतिकवाद के उदय में है। जब कोई इंसान अपने होने के बुनियादी आध्यात्मिक स्तर को नकार देता है—तो ज़िंदगी बड़ी खोखली हो जाती है। उन्हें यह अंदाज़ा मत लगाने दो कि असली समस्या यही है। बजाय इसके—उन्हें यह विश्वास दिलाओ कि वे व्यक्तिगत रूप से ही नाकाफ़ी हैं।

उत्तर-आधुनिक माहौल इस आत्म-भाव को और पोसता है। औद्योगिक क्रांति के बाद से इंसान अपनी मशीनों से एक भौतिक स्वर्ग बनाने की कोशिश में लगे हैं—और अब उनके अपने आविष्कार लाखों की तादाद में उन्हें ही बेकार और फ़ालतू बनाते जा रहे हैं।

दसवीं सेना की दूसरी टुकड़ी का काम है—दूसरों की तुच्छ बताना। यह आत्म-प्रशंसा का पूरक है। बहुत से लोग दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को ऊँचा उठाने की कोशिश करते हैं। उन्हें इसकी परवाह नहीं कि यह कितना बेतुका है—इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इससे हालात हमेशा बिगड़ते हैं—वे फिर भी करते हैं। किसी और की कमियों पर उँगली उठाना अपनी कमियों पर काम करने से कहीं आसान है। तुम्हारे पास कई हथियार और हथकंडे हैं—डाँट-फटकार, गपशप, निर्णय—वगैरह-वगैरह। तुम द्वेष और संघर्ष भड़काने के सबसे बड़े माध्यम हो!

यह अक्सर देखा गया है कि लोग जिन कमियों की सबसे पहले आलोचना करते हैं—वे ठीक वही कमियाँ होती हैं जो खुद उनमें होती हैं। देखने में बड़ा मज़ेदार लगता है—मगर जब वे इसमें डूबे होते हैं तो खुद यह कभी नहीं देख पाते। दूसरों की निंदा के सभी रूप आत्म-धार्मिकता के भ्रम पर टिके हैं।

गपशप इस बुराई का एक लोकप्रिय रूप है। सबको कलंक, बदनामी या घोटाला पसंद है—चाहे सच हो या न हो, बस चटपटा होना चाहिए! किसी और की छोटी-मोटी ग़लतियों पर कुड़कुड़ाते हुए वे कितने धर्मात्मा महसूस करते हैं! यह एक छोटी-सी बुराई है जिसे तुम जहाँ भी इंसान इकट्ठा हों—स्कूल, दफ़्तर, क्लब, परिवार—कहीं भी भड़का सकते हो। अनुभव से हमने पाया है कि यह मठों और दूसरे आध्यात्मिक समुदायों को भ्रष्ट करने का बड़ा कारगर ज़रिया है।

इसके अलावा—आलोचना के नस्टर रूपों को मत भूलो। ज़हरीले व्यक्तिगत हमले किसी की ज़िंदगी बर्बाद कर सकते हैं। और इससे भी ज़्यादा विनाशकारी है पूर्वाग्रह—जहाँ दुश्मनी भाषा या चमड़ी के रंग जैसे ग़ैर-व्यक्तिगत आधार पर होती है। किसी तार्किक प्राणी को यह कितना बेतुका लगे—मगर इंसान इन मूर्खताओं पर इस क़दर उत्तेजित हो सकते हैं कि पूरी-पूरी कौमें युद्ध की अफ़रा-तफ़री में डूब जाएँ। युद्ध—बेशक—एक ऐसी गतिविधि है जिसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्योंकि यह सभी आध्यात्मिक मूल्यों को निगल जाती है।

मगर इन सबसे भी ज़्यादा सूक्ष्म, गहरा और महत्त्वपूर्ण यह बुनियादी तथ्य है—कि जब तक कोई बाहर कमियाँ ढूँढता रहेगा, तब तक वह भीतर नहीं देखेगा। और यही एक काम है जो हमें उन्हें कभी, कभी भी नहीं करने देना है।

हस्ताक्षर करें—मार, जन्म और मृत्यु का स्वामी, प्राणियों का भक्षक, और चक्र को घुमाने वाला—इत्यादि।

इसकी एक-एक प्रति मेरे प्रत्येक सेना-प्रमुख को और एक प्रति मेरे वकील को भेजी जाए।

सेक्रेटरी अब एक हँसी और आँख मारते हुए चली जाती है। मार दिन का कारोबार समेटते हुए अपने दूर-दूर तक फैले साम्राज्य का एक त्वरित जायज़ा लेता है। वह स्क्रीन देखता है और ब्रह्मांड को स्कैन करता है—सत्वों को अस्तित्व में आते और जाते हुए देखता है। नैतिक लोगों को वह मरते और स्वर्ग में प्रकट होते देखता है—पापियों को नरक में गिरते हैं। नरक और स्वर्ग से प्राणी अपना समय पूरा करके फिर धरती पर प्रकट होते हैं…

गोल-गोल, बेनतीजा चक्करों में घूमते रहते हैं—इच्छाओं की हवाओं से झकझोरे जाते हुए। वे हवाएँ जो मार के प्रयासों से युगों-युगों से पंखा झलती आ रही हैं।

मगर वहाँ—स्क्रीन पर—एक छोटी-सी बाँस की झोपड़ी में एक बूढ़ी औरत मरने के लिए लेट जाती है। वह चीवर पहने है, सिर मुंडा हुआ है। शांत गरिमा के साथ वह अपनी क्षीण काया को पतली बुनी हुई चटाई पर दाहिनी करवट लिटा देती है।

मार घृणा से देखता है—वह जानता है और डरता है कि आगे क्या होने वाला है—मगर नज़र हटा नहीं सकता। यह उतना ही पीड़ादायक और उतना ही बाध्यकारी है जितना किसी सड़े दाँत को ज़बान से कुरेदना।

वह भिक्षुणी चुपचाप और शांतिपूर्वक प्राण त्याग देती है—और स्क्रीन काँप उठती है। स्वचालित सॉफ़्टवेयर तेज़ी से ददुनियाँ के सभी लोकों में खोज करता है—और वह भयावह संदेश लेकर लौटता है—“Being not found”—“सत्व नहीं मिला।”

मार की मुट्ठियाँ भिंच जाती हैं। स्क्रीन काली पड़ जाती है।

“छी! शुक्र है कि इस तरह हम ज़्यादा नहीं खोते।” मार कह पड़ता है।

मार खुद को उस बूढ़ी भिक्षुणी के ठिकाने के बारे में ज़्यादा देर तक सोचने नहीं देता—यह विचार अस्पष्ट रूप से परेशान करने वाला है। वह उन अनगिनत, और भी अनगिनत संभलने लायक मामलों की समीक्षा जारी रखता है जो उसके अधिकार क्षेत्र में हैं। गोल-गोल घूमते रहते हैं—उस बड़े झूले पर ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे।

तो मार युगों-युगों से व्यस्त रहा है—मगर मार भी अपने ही जाल में फँसा है।

दिन का काम निपटाकर अब वह आराम से बैठता है। अपनी वास्कट 1 की जेब से एक कंघी निकालता है। वह सुरुचिपूर्ण दानव-देवता अपने चमकदार काले बालों में सोचते हुए कंघी फेरता है—घमंड, बेशक, उसके अपने दोषों में से एक है।

कुछ मिनटों बाद मार बेपरवाही से उस प्लेटिनम और बाघ की हड्डी से बनी कंघी पर नज़र डालता है—अचानक उसकी आँखें सिकुड़ जाती हैं। साँस रुक जाती है। और पेट की गहराई में एक मतली-सी उठती है—काले बालों के बीच—एक सफ़ेद बाल! 2

—समाप्त—


  1. यह एक बिना आस्तीन की जैकेट होती है, इसे शर्ट के ऊपर पहना जाता है, साथ ही इसमें जेबें भी होती हैं ↩︎

  2. देवता के सिर में सफेद बाल का मतलब होता है कि जल्द ही उसकी आयु समाप्त होकर मृत्यु आने वाली है। ↩︎