कामा ते पठमा सेना, दुतिया अरति वुच्चति,
ततिया खुप्पिपासा ते, चतुत्थी तण्हा पवुच्चति।
कामुकता तुम्हारी सेना पहली,
दूसरी को अरति कहते हैं!
तीसरी भूख-प्यास होती,
चौथी है तृष्णा कहलाती!
पञ्चमं थिनमिद्धं ते, छट्ठा भीरू पवुच्चति,
सत्तमी विचिकिच्छा ते, मक्खो थम्भो ते अट्ठमो।
पाँचवी सुस्ती-तंद्रा होती,
छठी कायरता कहलाती!
सातवीं शंका-संदेह होती,
दुर्भावना-हठधर्मिता आठवी होती!
लाभो सिलोको सक्कारो, मिच्छालद्धो च यो यसो,
यो चत्तानं समुक्कंसे, परे च अवजानति।
लाभ, सत्कार, कीर्ति, और
झूठी मिली प्रतिष्ठा नौवीं!
करना आत्म-प्रशंसा, और
दूसरों को तुच्छ दिखाना दसवीं!
एसा नमुचि ते सेना, कण्हस्साभिप्पहारिनी,
न नं असूरो जिनाति, जेत्वा च लभते सुखं।
बस यही, नमुची, तुम्हारी सेना,
कान्हा की लड़ाकू सेना!
जिसे कायर हरा न पाए,
पर हराने पर ही कोई सुख पाए!— सुत्तनिपात ३:२ : पधानसुत्त
