हाल ही में, पूरब और पश्चिम दोनों जगहों पर बौद्ध धर्म के प्रति लोगों की दिलचस्पी काफी बढ़ी है। इस बढ़ती दिलचस्पी की पहचान इसका व्यावहारिक झुकाव और उस शांति और आज़ादी की खोज है, जो धम्म के अभ्यास से मिलती है।
हालाँकि, अभ्यास के प्रति इस उत्साह के साथ अक्सर एक और ऐसी प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है, जो शायद उतनी फलदायी न हो। वह प्रवृत्ति है—बुद्ध की शिक्षाओं के व्यवस्थित अध्ययन की अनदेखी करना या उसे कमतर आँकना।
इस रवैये के बचाव में दिए जाने वाले तर्क अब हमारे बीच आम हो गए हैं। उदाहरण के लिए, यह कहा जाता है कि अध्ययन का संबंध केवल शब्दों और अवधारणाओं से है, वास्तविकताओं से नहीं; कि यह केवल किताबी ज्ञान देता है, प्रज्ञा (अन्तर्ज्ञान) नहीं; कि यह केवल हमारे विचारों को बदल सकता है लेकिन हमारे जीवन की गहराइयों को छूने में विफल रहता है।
अपनी बात को पुख्ता करने के लिए स्वयं बुद्ध के कथन का सहारा लिया जाता है। अक्सर उनकी उस प्रसिद्ध टिप्पणी का हवाला दिया जाता है कि—बिना अभ्यास के बहुत अधिक ज्ञान अर्जित करना, दूसरों की गायें गिनने जैसा है, या नदी पार करने के लिए बेड़े (नैया) का उपयोग करने के बजाय उसे अपने सिर पर ढोने जैसा है।
अध्ययन का महत्व
निश्चित रूप से, इस तर्क में कुछ सच्चाई है, लेकिन यह एकतरफा है। इस एकतरफा ज़ोर देने की वजह से बौद्ध मार्ग पर हमारी प्रगति वास्तव में आगे बढ़ने के बजाय रुक सकती है।
यह बिल्कुल सच है कि अभ्यास के बिना सीखना बेकार है, लेकिन इस मुद्दे के दूसरे पहलू पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या किसी व्यक्ति को गायें इकट्ठा करनी चाहिए यदि वह उनकी देखभाल करना ही नहीं जानता? क्या उसे यह जाने बिना कि बेड़ा कैसे चलाया जाता है, किसी उफनती और खतरनाक नदी को पार करने की कोशिश करनी चाहिए?
स्वयं बुद्ध ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि उनके अनुयायी धम्म को उसके शब्दों और उसकी मूल भावना, दोनों ही रूपों में सीखें और आगे बढ़ाएं। इसलिए, केवल पारंपरिक बातों का हवाला देने के बजाय, आइए हम स्वयं धम्म के अध्ययन के महत्व और उसकी कार्यप्रणाली की पड़ताल करें।
यहाँ इस बात पर ज़ोर देना ज़रूरी है कि जिस अध्ययन की हम बात कर रहे हैं, वह कोई अकादमिक विषय नहीं है, न ही यह ज्ञान का कोई विशाल भंडार इकट्ठा करना है। बल्कि, यह बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों का एक ठोस और काम आने वाला ज्ञान प्राप्त करना है।
सम्यक दृष्टि
यह ज्ञान इतना ज़रूरी क्यों है, इसे समझने के लिए हमें याद रखना होगा कि सही बौद्ध मार्ग का संपूर्ण अभ्यास उस कदम से शुरू होता है जिसके ज़रिए हम इस मार्ग में प्रवेश करते हैं—यानी त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म और संघ) की शरण में जाना।
यदि हमने सही प्रेरणा के साथ और ईमानदारी से यह कदम उठाया है, तो इसका मतलब है कि हमने आध्यात्मिक मार्गदर्शन की अपनी ज़रूरत को स्वीकार कर लिया है। हमने खुद को बुद्ध (अपने मार्गदर्शक के रूप में) और उनकी शिक्षाओं (मार्गदर्शन के साधन के रूप में) को सौंप दिया है।
धम्म की शरण में जाने का अर्थ केवल ध्यान-साधना की किसी ऐसी तकनीक को अपनाना नहीं है, जिसका हम अपने निजी उद्देश्यों के लिए अपनी मर्जी से उपयोग कर सकें। बल्कि, यह मानव जीवन की वास्तविक प्रकृति के बारे में एक गहरी और व्यापक शिक्षा को अपनाना है। यह एक ऐसी शिक्षा है जिसका उद्देश्य हमारे भीतर सत्य की उस समझ को जगाना है, जो दुखों के पूर्ण और अंतिम अंत तक पहुँचने का साधन है।
धम्म द्वारा दी जाने वाली आज़ादी केवल अपनी पूर्व-मान्यताओं और इच्छाओं के दायरे में ध्यान का अभ्यास करने से नहीं मिलती। यह आज़ादी उस सम्यक दृष्टि और सम्यक संकल्प की नींव पर अभ्यास करने से आती है, जो बुद्ध ने हमें बताई है।
समझ के उपकरण
बौद्ध मार्ग का यह ज्ञानात्मक स्वरूप सैद्धांतिक अध्ययन और बौद्धिक खोज को बहुत अहम स्थान देता है।
यह सच है कि चित्त को बंधनों से आज़ाद करने वाला ज्ञान केवल ‘सहज अंतर्दृष्टि’ से ही उभरता है, न कि सिद्धांतों के किसी ढेर से। लेकिन यह भी सच है कि सच्ची अंतर्दृष्टि हमेशा बुनियादी सिद्धांतों की एक प्रारंभिक वैचारिक समझ की नींव पर ही विकसित होती है। यह समझ ‘सम्यक दृष्टि’ के लिए बहुत ज़रूरी है, और इसके बिना अंतर्दृष्टि का विकास निश्चित रूप से बाधित होगा।
अध्ययन और व्यवस्थित चिंतन, जिसके ज़रिए हम इस प्रारंभिक सम्यक दृष्टि तक पहुँचते हैं, उनमें अवधारणाएँ और विचार शामिल होना लाज़मी है।
लेकिन इससे पहले कि हम धम्म-अध्ययन को महज़ ‘शब्दों का बेकार जाल’ मानकर खारिज कर दें, हमें यह समझना चाहिए कि अवधारणाएँ और विचार हमारी समझ और बातचीत के अपरिहार्य उपकरण हैं। ये अवधारणाएँ समझ के वैध या अवैध उपकरण हो सकती हैं; विचार फलदायी या बेकार हो सकते हैं; वे अपार लाभ पहुँचा सकते हैं या भारी नुकसान कर सकते हैं।
हमारी आध्यात्मिक खोज के हिस्से के रूप में धम्म का अध्ययन करने का मुख्य उद्देश्य है—अपने अनुभव को सही ढंग से समझना सीखना। यानी वैध और अवैध, सच और झूठ, कुशल और अकुशल के बीच अंतर करने में सक्षम होना।
जांच-पड़ताल
केवल एक गहन और सावधानीपूर्वक पड़ताल करके ही हम उस स्थिति में पहुँच पाएंगे जहाँ हम अपने विकास के लिए हानिकारक चीज़ों को खारिज कर सकें, और जो वास्तव में फायदेमंद है उसे विकसित करने में पूरे भरोसे के साथ खुद को लगा सकें।
इस प्रारंभिक वैचारिक स्पष्टता तक पहुँचे बिना, और अपने “दृष्टिकोण को सीधा किए बिना”, कोई व्यक्ति बौद्ध ध्यान तकनीकों का गंभीरता से अभ्यास तो कर सकता है, लेकिन वह संपूर्ण आर्य अष्टांगिक मार्ग से जुड़े ध्यान का अभ्यास नहीं होगा।
इस तरह का ‘स्वतंत्र’ (बिना सही नींव का) ध्यान करने वालों को अधिक शांति, जागरूकता और समभाव (उपेक्षा) जैसे सांसारिक लाभ तो मिल सकते हैं। लेकिन सम्यक दृष्टि के मार्गदर्शन और सम्यक प्रेरणा की प्रेरक शक्ति के बिना, यह संदेहास्पद है कि क्या यह धम्म के भेदने वाले ज्ञान तक, या इसके अंतिम लक्ष्य—दुखों के पूर्ण निरोध—तक ले जा सकता है।
संतुलन खोजना
धम्म के सभी अनुयायियों पर लागू होने वाली अध्ययन के विषय में कोई एक ही सलाह देना लगभग असंभव है। हर व्यक्ति की ज़रूरतें और रुचियाँ इतनी अलग होती हैं कि हर किसी को अध्ययन और अभ्यास के बीच वह संतुलन खुद खोजना होगा जो उसके अपने स्वभाव के अनुकूल हो।
लेकिन यह बिना किसी हिचकिचाहट के कहा जा सकता है कि जो लोग ईमानदारी से बुद्ध की शिक्षाओं के अनुसार जीने का प्रयास करते हैं, वे पाएंगे कि धम्म के व्यवस्थित अध्ययन से उनका अभ्यास और अधिक मज़बूत हुआ है।
बेशक, ऐसा करना आसान नहीं होगा, लेकिन रास्ते में आने वाली चुनौतियों का सामना करने और उन पर विजय पाने से ही हमारी समझ पकेगी और उच्च प्रज्ञा के रूप में परिपक्व होगी।
लेखक: भिक्खु बोधि
आप एक प्रख्यात थेरवादी भिक्खु, विद्वान और अनुवादक हैं। आप ने पाली बौद्ध ग्रंथों के गहन अध्ययन और उनके उत्कृष्ट अंग्रेज़ी अनुवाद के माध्यम से विश्वभर के साधकों को लाभान्वित किया है। आप अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित “चित्त विवेक विहार” (Chuang Yen Monastery) में निवास करते हैं, जहाँ आपने बौद्ध ग्रंथों के अनुवाद को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है।
आपके अनुवादों में The Connected Discourses of the Buddha (संयुत्तनिकाय), The Middle Length Discourses of the Buddha (मज्झिमनिकाय) जैसे महत्त्वपूर्ण सुत्त ग्रंथ शामिल हैं, जो बौद्ध शिक्षाओं को पश्चिमी जगत में सुलभ और प्रभावशाली बनाने में सहायक रहे हैं। आपकी शिक्षाएँ तर्कसंगत, गहरी और प्रायोगिक हैं, जो आधुनिक जीवन में भी मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
आपका योगदान न केवल बौद्ध साहित्य में अद्वितीय है, बल्कि आप सामाजिक सेवा और मानवीय कल्याण से भी जुड़े रहे हैं। आपकी शिक्षाएँ और लेखन ATI और Bodhi Monastery पर निःशुल्क उपलब्ध हैं।
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इस लेख को उसकी मूल भाषा अँग्रेजी में पढ़ें: The Case for Study
