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बौद्ध धर्म

एकमात्र वास्तविक विज्ञान

लेखक: अजान ब्रह्म
| ८ मिनट



मैं (अजान ब्रह्म) कभी एक वैज्ञानिक हुआ करता था।

मैंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से ‘थियोरेटिकल फिजिक्स’ की पढ़ाई की है। मैं उसी विभाग के उसी बिल्डिंग में वैज्ञानिक था जहाँ बाद में मशहूर हुए प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंग का भी आना-जाना था।

लेकिन एक समय ऐसा आया जब मुझे विज्ञान से मोहभंग हो गया।

विज्ञान की दुनिया के भीतर रहकर मैंने देखा कि कुछ वैज्ञानिक कितने ‘कट्टरपंथी’ हो सकते हैं।

डिक्शनरी के अनुसार कट्टरपन का मतलब है—अपनी राय को अहंकार के साथ दूसरों पर थोपना। कैम्ब्रिज की प्रयोगशालाओं में मैंने ठीक ऐसा ही विज्ञान देखा था। विज्ञान ने अपनी विनम्रता खो दी थी। सत्य की निष्पक्ष खोज की जगह अहंकार से भरे विचारों ने ले ली थी।

उस समय की मेरी पसंदीदा कहावत थी:

किसी महान वैज्ञानिक की महानता इस बात से मापी जाती है कि वह अपने क्षेत्र में नई प्रगति को कितने लंबे समय तक रोके रख सकता है!

असली विज्ञान क्या है?

असली विज्ञान क्या है, इसे समझने के लिए हमें विज्ञान के संस्थापकों में से एक, अंग्रेज़ दार्शनिक फ्रांसिस बेकन (1561-1628) की ओर लौटना होगा। उन्होंने विज्ञान के आगे बढ़ने का एक ढांचा तैयार किया था, जिसे “नकारात्मक प्रमाण की शक्ति” (The greater force of the negative instance) कहा जाता है।

इसका मतलब है कि अगर आप किसी प्राकृतिक घटना को समझाने के लिए कोई सिद्धांत बनाते हैं, तो आपको पूरी ताकत से उसे गलत साबित करने की कोशिश करनी चाहिए! कड़े तर्कों और प्रयोगों से उसकी परीक्षा लेनी चाहिए।

जब उस सिद्धांत में कोई कमी नज़र आती है, तभी विज्ञान एक कदम आगे बढ़ता है। विज्ञान की यह मूल पद्धति मानती है कि किसी भी चीज़ को 100% निश्चितता के साथ ‘साबित’ करना असंभव है; आप केवल पूर्ण निश्चितता के साथ किसी चीज़ को ‘गलत साबित’ कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, गुरुत्वाकर्षण के इस नियम को कैसे साबित किया जाए कि “जो चीज़ ऊपर जाती है, वह नीचे ज़रूर आती है”? आप किसी चीज़ को दस लाख बार ऊपर उछालें और वह दस लाख बार नीचे गिरे, फिर भी यह साबित नहीं होता कि “हर चीज़ नीचे आती है।”

क्योंकि अगर NASA मंगल ग्रह के लिए अंतरिक्ष में एक रॉकेट छोड़े, तो वह धरती पर कभी वापस नहीं आता। सिद्धांत को पूरी तरह से ध्वस्त करने के लिए बस एक ही ‘नकारात्मक प्रमाण’ काफी है।

पुनर्जन्म और विज्ञान के नए ‘पुरोहित’

कुछ भटके हुए वैज्ञानिक यह सिद्धांत मानते हैं कि ‘पुनर्जन्म’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती। विज्ञान के ही नियम के अनुसार, इस ‘नो-रीबर्थ’ सिद्धांत को गलत साबित करने के लिए पुनर्जन्म का सिर्फ एक सच्चा मामला मिलना काफी है!

जैसा कि आप में से कुछ लोग जानते होंगे, प्रोफेसर इयान स्टीवेंसन (Prof. Ian Stevenson) ने पुनर्जन्म के कई प्रमाणित मामले दुनिया के सामने रखे हैं। इसका मतलब है कि ‘पुनर्जन्म नहीं होता’ वाला सिद्धांत गलत साबित हो चुका है।

पुनर्जन्म अब एक वैज्ञानिक तथ्य है!

आधुनिक विज्ञान अपने प्रिय सिद्धांतों को गलत साबित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता। इसमें पद, प्रतिष्ठा और रिसर्च ग्रांट्स (Research Grants) का बहुत बड़ा स्वार्थ जुड़ गया है। सच्चाई के लिए डटकर खड़े होने में कई वैज्ञानिकों को अपना ‘कंफर्ट ज़ोन’ छोड़ना पड़ता है।

आम लोग विज्ञान की भारी-भरकम शब्दावली को इतना कम समझते हैं कि अगर वे अखबार में पढ़ते हैं कि “एक वैज्ञानिक का कहना है कि…”, तो वे आँख मूंदकर उसे सच मान लेते हैं। इसकी तुलना में अगर लिखा हो कि “एक राजनेता का कहना है…”, तो हमारी प्रतिक्रिया कितनी अलग होती है!

वैज्ञानिकों पर यह अंधा विश्वास क्यों है? शायद इसलिए क्योंकि विज्ञान की भाषा और इसके तरीके आम लोगों की पहुँच से इतने दूर हो गए हैं कि आज के वैज्ञानिक नए ज़माने के “रहस्यवादी पुरोहित” बन गए हैं। वे सफेद कोट पहनकर, कई आयामों वाले समानांतर ब्रह्मांडों (Multi-dimensional parallel universes) के मंत्र बुदबुदाते हैं, और प्लास्टिक-लोहे को टीवी और कंप्यूटर में बदलने का जादू दिखाते हैं। ये आधुनिक ‘कीमियागर’ हमें इतने चमत्कारी लगते हैं कि हम उनकी हर बात मान लेते हैं।

मन और दिमाग का भ्रम

सौभाग्य से, कुछ ईमानदार और विनम्र वैज्ञानिक आज भी हैं। मेरे एक डॉक्टर मित्र ने बताया कि जब वे मेडिकल कॉलेज गए, तो उनके हेड प्रोफेसर ने अपने पहले भाषण में कहा था:

अगले कुछ सालों में हम आपको जो भी पढ़ाएंगे, उसका आधा हिस्सा गलत होगा। समस्या सिर्फ यह है कि हमें खुद नहीं पता कि वह आधा हिस्सा कौन-सा है!

ये एक असली वैज्ञानिक के शब्द थे।

वहीं कुछ ‘कट्टर’ वैज्ञानिकों को यह समझना चाहिए कि जहाँ फरिश्ते भी जाने से डरते हैं, वहाँ ये लोग बिना सोचे-समझे कूद पड़ते हैं—खासकर मन, खुशी और निर्वाण के मामलों में। न्यूरोलॉजिस्ट अक्सर दावा करते हैं कि चेतना और इच्छाशक्ति बस दिमाग (Brain) के अंदर चलने वाली गतिविधियों का नतीजा हैं।

लेकिन इस सिद्धांत को 20 साल पहले ही शेफील्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर लॉर्बर ने गलत साबित कर दिया था। उन्होंने एक ऐसे छात्र की खोज की जिसका IQ 126 था, जो गणित का टॉपर था, लेकिन जिसके सिर में वस्तुतः दिमाग (Brain) था ही नहीं!

इसके अलावा, प्रोफेसर पिम वैन लोमेल ने भी साबित किया है कि क्लिनिकल डेथ (जब दिमाग काम करना बंद कर दे) के बाद भी चेतना का अस्तित्व रहता है। सिर्फ इसलिए कि दिमाग की किसी गतिविधि और किसी विचार के बीच कोई संबंध (Correlation) है, इसका मतलब यह नहीं कि दिमाग ने ही चेतना को पैदा किया है (Causation)।

बौद्ध धर्म: एक अधिक कठोर विज्ञान

बौद्ध धर्म आधुनिक विज्ञान से भी कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक है। विज्ञान की तरह, बौद्ध धर्म भी ‘कारण और प्रभाव’ (Cause-and-effect, इदपच्चयता) पर आधारित है। लेकिन विज्ञान के विपरीत, बौद्ध धर्म हर मान्यता को पूरी गहराई से चुनौती देता है।

बौद्ध धर्म का प्रसिद्ध कालाम सुत्त कहता है कि किसी भी बात पर सिर्फ इसलिए विश्वास मत करो क्योंकि वह तुम्हें पढ़ाई गई है, परंपरा है, सुनी-सुनाई बात है, धर्मग्रंथ है, देखने में सही लगती है, या तुम्हारे गुरु ने कही है। कितने वैज्ञानिक सोचने के इस स्तर तक जा पाते हैं?

बौद्ध धर्म तर्क (Logic) को भी चुनौती देता है, क्योंकि तर्क केवल उन्हीं मान्यताओं तक सही होता है जिन पर वह टिका है। बौद्ध धर्म केवल स्पष्ट और निष्पक्ष अनुभव (Clear and objective experience) पर भरोसा करता है।

स्पष्ट अनुभव तब होता है जब मापने वाले यंत्र—यानी हमारी इंद्रियां—शांत हों। बौद्ध धर्म में यह तब होता है जब मन से सुस्ती और तंद्रा और बेचैनी और पश्चाताप रूपी नीवरण हट जाते हैं।

निष्पक्ष अनुभव वह है जिसमें कोई पूर्वाग्रह (Bias) न हो। बौद्ध धर्म में तीन मुख्य पूर्वाग्रह हैं:

  1. कामेच्छा: इंसान वही देखता है जो वह देखना चाहता है, और सच्चाई को अपनी पसंद के हिसाब से मोड़ लेता है।
  2. दुर्भावना: यह हमें उन सच्चाइयों को नकारने पर मजबूर करता है जो हमारी मान्यताओं को चोट पहुँचाती हैं।
  3. उलझन/शक: यह शंका हमें पुनर्जन्म जैसे स्पष्ट तथ्यों को भी स्वीकार करने से रोकती है, क्योंकि वे हमारे ‘कंफर्ट ज़ोन’ से बाहर होते हैं।

संक्षेप में, स्पष्ट अनुभव तभी संभव है जब पाँच नीवरणों को जीत लिया जाए। नळकपान सुत्त के अनुसार, हाल ही में झान का अनुभव किए बिना इन नीवरणों को प्रभावी ढंग से दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए, केवल एक सिद्ध ध्यानी ही असली वैज्ञानिक हो सकता है!

दुनिया की सबसे बड़ी चीज़ क्या है?

विज्ञान मापन (Measurement) पर टिका है। लेकिन क्वांटम थ्योरी के अनुसार मापना क्या है? जब भी आप किसी चीज़ को मापते हैं, तो आप वास्तविकता में खलल डालते हैं। मापना कभी वास्तविकता का सटीक वर्णन नहीं कर सकता (जैसा कि श्रोडिंगर की बिल्ली और हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत ने दिखाया है)।

वैसे भी, मापने वाले यानी मन (Mind) को कोई कैसे माप सकता है?

एक बार कक्षा एक की टीचर ने बच्चों से पूछा, “दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ क्या है?”

एक बच्ची ने कहा, “मेरे पापा।”

एक लड़के ने कहा, “हाथी।”

मेरे एक दोस्त की 6 साल की बेटी ने कहा, “मेरी आँख दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ है!”

टीचर को समझ नहीं आया। तब उस बच्ची ने समझाया:

“मेरी आँख पापा को, हाथी को और पहाड़ को भी देख सकती है। अगर यह सब मेरी आँख में समा सकता है, तो मेरी आँख ही सबसे बड़ी हुई न!”

बच्ची का जवाब शानदार था, लेकिन पूरी तरह से सही नहीं। मन वह सब देख सकता है जो आँख देख सकती है, और उससे भी कहीं अधिक कल्पना कर सकता है। यह दुनिया की हर जानने लायक चीज़ को अपने भीतर समा सकता है।

इसलिए, मन ही दुनिया की सबसे बड़ी चीज़ है! विज्ञान की गलती यहीं है। मन दिमाग या शरीर के अंदर नहीं है। बल्कि दिमाग, शरीर और यह पूरी दुनिया मन के भीतर है!

प्राचीन यूनानी दर्शन (जहाँ से विज्ञान की उत्पत्ति मानी जाती है) में भी बौद्ध धर्म की तरह छह इंद्रियों की बात होती थी (मन छठी इंद्री है)। लेकिन यूरोपीय सोच की यात्रा में कहीं न कहीं उन्होंने अपना ‘मन’ ही खो दिया! और तब हमें मिला आज का भौतिकवादी विज्ञान, जिसमें कोई ‘हृदय’ नहीं है।

निष्कर्ष

बौद्ध धर्म कोई ‘मान्यताओं का सिस्टम’ (Belief system) नहीं है। यह निष्पक्ष अवलोकन—यानी ध्यान (Meditation)—पर आधारित एक विज्ञान है, जो कृत्रिम मापदंडों से वास्तविकता को छेड़ता नहीं है। इसके प्रयोगों को कोई भी दोहरा सकता है।

पिछले 2600 सालों से, लोग ‘आर्य अष्टांगिक मार्ग’ के रूप में इस प्रयोगशाला को तैयार करते आ रहे हैं। ध्यान के उन महान प्रोफेसर्स—यानी अरहंतों—ने वही परिणाम पाया है जो स्वयं बुद्ध ने पाया था।

इसलिए, बौद्ध धर्म ही एकमात्र वास्तविक विज्ञान है।

और मुझे यह कहते हुए बहुत खुशी होती है कि मैं आज भी दिल से एक वैज्ञानिक ही हूँ—बस कैम्ब्रिज में जितना अच्छा वैज्ञानिक बन सकता था, आज उससे कहीं बेहतर वैज्ञानिक हूँ!

आगे क्या पढ़ें?

यदि यह लेख आपकी जिज्ञासा की कसौटी पर खरा उतरा है, और आप अध्यात्म के व्यावहारिक व वैज्ञानिक पक्षों को अधिक गहराई से समझना चाहते हैं, तो हमारी इस विशेष मार्गदर्शिका का अवलोकन अवश्य करें:

अध्यात्म के वैज्ञानिक सबूत

इसी लेख के विषय पर अजान ब्रह्म का उपासकों को दिया एक प्रवचन:

बौद्ध धर्म और आधुनिक विज्ञान

अक्सर बौद्ध धर्म की ओर आकर्षित होने वाले नए जिज्ञासु इसकी तार्किकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभावित होकर कदम बढ़ाते हैं। परंतु, जब उनका सामना धर्म के कुछ ऐसे गूढ़ पक्षों से होता है जो विशुद्ध तर्क की सीमा में नहीं बंधते, तो वे उन्हें सहज ही नकार देते हैं। तर्क और आस्था के इसी अंतर्विरोध को समझने के लिए हमारा यह विश्लेषणात्मक लेख अवश्य पढ़ें:

क्या धर्म का तार्किक होना अनिवार्य है?

लेखक: अजान ब्रह्म

अजान ब्रह्म

अजान ब्रह्म, एक थेरवादी बौद्ध भिक्षु, अपनी बुद्धिमत्ता और हास्यपूर्ण शैली के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इंग्लैंड में जन्मे, उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से सैद्धांतिक भौतिकी वैज्ञानिक (Theoretical Physicist – Scientist) थे, लेकिन गहरी आध्यात्मिक खोज ने उन्हें थाईलैंड में अजान चाह के शिष्य बनने के लिए प्रेरित किया। बाद में, वे ऑस्ट्रेलिया में बोधिन्याण विहार के प्रमुख बने। उनकी शिक्षाएँ गहरी प्रज्ञा और हल्के हास्य का अनूठा संगम हैं, जो ध्यान और जीवन के अर्थ को सरलता से समझाने में मदद करती हैं।