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फोड़े को पालना
यह काया, जो सुंदर भी नहीं है, और उसे जीवित रखने के लिए लगातार ईंधन की आवश्यकता होती है। यह ईंधन ही ‘आहार’ है।
लेकिन भगवान ने केवल वह रोटी या चावल को ही ‘आहार’ नहीं बताया। बल्कि अस्तित्व में बने रहने के लिए, हमारे अहंकार (अस्मिमान) और तृष्णा को जीवित रखने के लिए, हम दिन-रात चार प्रकार के ‘भोजन’ निगल रहे हैं:
- भौतिक आहार: जो शरीर को पालता है।
- संपर्क आहार: आँख, कान और अन्य इंद्रियों से मिलने वाले सुखद अनुभव, जिन्हें चित्त ‘खाता’ है।
- मनोसंचेतना आहार: हमारी इच्छाएँ, योजनाएँ और महत्वाकांक्षाएँ, जो भविष्य के जन्मों का पोषण करती हैं।
- विज्ञान आहार: चेतना स्वयं, जो नाम-रूप को जन्म देती है।
इन चारों आहारों के प्रति आसक्ति गहरी और स्वचालित होती है।
झकझोरने की चिकित्सा
इस सुत्त में भगवान बुद्ध ने जो उपमाएँ दी हैं—रेगिस्तान में अपने ही प्रिय पुत्र का माँस खाना, ज़िंदा उधेड़ी गई गाय जिसे कीड़े खा रहे हों, अंगारों का गड्ढा, और दिन में ३०० भाले भोंके जाना—वे जान-बूझकर झकझोर देने वाले रखे गए हैं।
खाने के स्वाद और जीवन के प्रति राग (राग) के प्रति जो हमारा ‘मज़ा’ (नन्दी) है, वह इतना सघन है कि उसे तोड़ने के लिए कोई हल्की-फुल्की संज्ञा काम नहीं आती। बुद्ध साधक के चित्त को इस क्रूर यथार्थ से टकराते हैं ताकि राग का सम्मोहन टूटे और साधक यह देख सके कि संसार में जन्म लेना और आहार पर निर्भर रहना कितनी बड़ी त्रासदी है।
अभ्यास कैसे करें?
दैनिक जीवन में इस सुत्त का अभ्यास भौतिक भोजन से शुरू होता है:
- विराग भोजन: जब आप भोजन करने बैठें, तो मन में रेगिस्तान वाले माता-पिता का स्मरण करें। वे अपने पुत्र का माँस मजे या स्वाद के लिए नहीं खा रहे थे, केवल संसार-रूपी ‘रेगिस्तान पार करने’ के लिए खा रहे थे।
- संपर्क और इच्छाओं का विखंडन: मोबाइल स्क्रीन पर अंगूठा घुमाते हुए ‘उधेड़ी गई गाय’ या ‘३०० भालों’ को याद करें। देखें कि इंद्रियों को इतने चुभने वाले दृश्य और आवाज़े आपको संवेदनहिन बनाते जा रहे हैं, और यह सब भोजन संसार के गहरे गड्ढे में धकेल रही है।
सफलता का पैमाना
इस साधना का उद्देश्य खाना-पीना छोड़कर शरीर को नष्ट करना या घोर निराशा में जाना नहीं है। सफलता तब मानी जाती है जब भोजन करते समय आपके भीतर से स्वाद की तृष्णा और भव-राग मिटते जा रहा हो।
मूल साधना
“आहार-प्रतिकूल संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
कैसे साधक आहार-प्रतिकूल संज्ञा की साधना करता है?
चार आहार होते हैं—अस्तित्व पाए सत्वों को पालने के लिए, अथवा जन्म ढूँढते सत्वों को आधार देने के लिए। कौन-से चार?
- स्थूल या सूक्ष्म भौतिक-आहार,
- दूसरा संपर्क,
- तीसरा मनोसंचेतना,
- चौथा विज्ञान।
1. भौतिक आहार
भौतिक-आहार के प्रति कैसा भाव होना चाहिए?
कल्पना करो कि पति-पत्नी की एक जोड़ी, कुछ भोजन बाँधकर, रेगिस्तान से गुज़र रही हो। साथ ही, उनका इकलौता पुत्र भी हो—नवजात, प्रिय, और आकर्षक। तब उनका भोजन समाप्त हो जाता है, किंतु रेगिस्तान का एक हिस्सा पार करना रह जाता है।
तब उन्हें लगता है—‘हमारा भोजन समाप्त हो गया! किंतु रेगिस्तान का एक हिस्सा पार करना रह गया। क्या होगा यदि हम अपने इकलौते पुत्र को मार दें, और उसका माँस सुखाकर खाए? हो सकता है कि हम पति-पत्नी, पुत्र के माँस को खाकर, रेगिस्तान के बचे हिस्से से जीवित निकल सकते हैं। वरना, हम तीनों ही नहीं बचेंगे!’
तब वे अपने इकलौते पुत्र—नवजात, प्रिय, और आकर्षक—को मार देते हैं, और उसका माँस सुखाकर खाते हैं।
वे पुत्र के माँस चबाते हुए छाती पीटते हैं—“ओह! हमारे पुत्र, तुम कहाँ चले गए? ओह! हमारे इकलौते पुत्र, तुम कहाँ चले गए?”
तो, तुम्हें क्या लगता है? क्या वह पति-पत्नी की जोड़ी उस भोजन को—मज़े के लिए खाएगी, या मदहोशी के लिए खाएगी, या सुडौलता पाने के लिए खाएगी, या सौंदर्य वृद्धि के लिए खायेगी?”
“नहीं, भन्ते।”
“क्या उस भोजन को वे केवल “रेगिस्तान से जीवित बच निकलने के लिए” ही नहीं खायेंगे?”
“हाँ, भन्ते।”
“उसी तरह का भाव, मैं कहता हूँ, भौतिक आहार के लिए भी होना चाहिए!
चित्र रंगना
जैसे, कोई रंग हो—लाख, हल्दी, नील, या लालिमा—और, कोई चित्रकार किसी फलक, दीवार, या कपड़े पर किसी स्त्री या पुरुष के चित्र को रंगता है—सभी अंग-प्रत्यंगों के साथ।
उसी तरह, जहाँ भौतिक आहार के लिए राग, मज़ा (“नन्दी”), या तृष्णा हो —
- वहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगता है।
- जहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगे, वहाँ नाम-रूप प्रज्वलित होता है।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगती है।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगे, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगता है।
- और जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगे, वहाँ, मैं कहता हूँ—भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” के साथ ही साथ “शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी पीछे लग जाते हैं।
सूर्य किरण पड़ना
किंतु, कल्पना करो कि जैसे किसी छत वाले निवास या कक्ष के उत्तर, दक्षिण या पूर्व दिशा में, कोई खिड़की हो। जब सूरज उगता है, और सूर्य की किरण खिड़की से होकर कक्ष के भीतर प्रवेश करती है, तब वह कहाँ पड़ेगी?”
“पश्चिमी दीवार पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि पश्चिमी दीवार न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जमीन पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जमीन भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जल पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जल भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“तब, कही नहीं पड़ेगी, भन्ते!"
“उसी तरह, यदि भौतिक आहार के लिए न राग हो, न मज़ा लेना हो, न तृष्णा हो—
- तब वहाँ विज्ञान नहीं पड़ता, और बढ़ने नहीं लगता।
- जहाँ विज्ञान न पड़े, बढ़ने न लगे, वहाँ नाम-रूप भी प्रज्वलित नहीं होता।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित न हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि नहीं होती।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि न हो, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन नहीं होता।
- और, जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन न हो, वहाँ भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” नहीं होती। उसे, मैं कहता हूँ—“शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी नहीं हो सकती।
और, जब भौतिक आहार का मूलस्वरूप पता चलता है, तब पाँच कामगुण के प्रति राग भी पता चलती है। जब पाँच कामगुण के प्रति राग पता चले, तब कोई बंधन ही नहीं बचता, जिसके कारण साधक दुबारा इस (काम) लोक में लौट आए। (=अनागामीफल)
जब कोई आहार प्रतिकूल संज्ञा में लीन रहे, तब स्वाद के प्रति तृष्णा से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि वह तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
मुर्गे का पंख
जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई आहार प्रतिकूल संज्ञा में लीन रहे, तब स्वाद के प्रति तृष्णा से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि वह तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
किंतु, यदि कोई आहार प्रतिकूल संज्ञा में लीन रहने पर भी, स्वाद के प्रति तृष्णा से आकर्षित हो, या उसमें घिन-भाव उपस्थित न हो—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं आहार प्रतिकूल संज्ञा को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फल नहीं पाया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
और, यदि कोई आहार प्रतिकूल संज्ञा में लीन रहे, और स्वाद के प्रति तृष्णा से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने आहार प्रतिकूल संज्ञा को विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फल पा लिया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
आहार प्रतिकूल संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!”
—संयुत्तनिकाय १२:६३ + १२:६४ + अंगुत्तरनिकाय ७:४६
अन्य तीन आहार के बारे में भी—
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2. संपर्क आहार
“और, संपर्क-आहार के प्रति कैसा भाव होना चाहिए?
कल्पना करो कि एक गाय हो—जिसकी चमड़ी उधेड़ी गयी हो—
- यदि वह दीवार से सटकर खड़ी हो जाए, तो दीवार के जीव-जंतु (उसके माँस को) चबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
- यदि वह पेड़ से सटकर खड़ी हो जाए, तो पेड़ के जीव-जंतु (उसके माँस को) चबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
- यदि वह जलाशय में खड़ी हो जाए, तो जलाशय के जीव-जंतु (उसके माँस को) चबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
- यदि वह खुली हवा में भी खड़ी हो जाए, तो हवा में मौजूद जीव-जंतु (उसके माँस को) चबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
ऐसी गाय—जिसकी चमड़ी उधेड़ी गयी हो—जहाँ-जहाँ खड़ी होती है, वहाँ-वहाँ के जीव-जंतु (उसके माँस को) चबाने के लिए टूट पड़ते हैं।
उसी तरह का भाव, मैं कहता हूँ, (इंद्रिय) संपर्क-आहार के प्रति होना चाहिए!
जैसे, कोई रंग हो—लाख, हल्दी, नील, या लालिमा—और, कोई चित्रकार किसी फलक, दीवार, या कपड़े पर किसी स्त्री या पुरुष के चित्र को रंगता है—सभी अंग-प्रत्यंगों के साथ।
उसी तरह, जहाँ संपर्क आहार के लिए राग, मज़ा, या तृष्णा हो —
- वहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगता है।
- जहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगे, वहाँ नाम-रूप प्रज्वलित होता है।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगती है।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगे, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगता है।
- और जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगे, वहाँ, मैं कहता हूँ—भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” के साथ ही साथ “शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी पीछे लग जाते हैं।
किंतु, कल्पना करो कि जैसे किसी छत वाले निवास या कक्ष के उत्तर, दक्षिण या पूर्व दिशा में, कोई खिड़की हो। जब सूरज उगता है, और सूर्य की किरण खिड़की से होकर कक्ष के भीतर प्रवेश करती है, तब वह कहाँ पड़ेगी?”
“पश्चिमी दीवार पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि पश्चिमी दीवार न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जमीन पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जमीन भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जल पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जल भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“तब, कही नहीं पड़ेगी, भन्ते!"
“उसी तरह, यदि संपर्क आहार के लिए न राग हो, न मज़ा लेना हो, न तृष्णा हो—
- तब वहाँ विज्ञान नहीं पड़ता, और बढ़ने नहीं लगता।
- जहाँ विज्ञान न पड़े, बढ़ने न लगे, वहाँ नाम-रूप भी प्रज्वलित नहीं होता।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित न हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि नहीं होती।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि न हो, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन नहीं होता।
- और, जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन न हो, वहाँ भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” नहीं होती। उसे, मैं कहता हूँ—“शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी नहीं हो सकती।
जब संपर्क आहार का मूलस्वरूप पता चलता है, तब तीन वेदना (सुख, दर्द, और नसुख-नदर्द) भी पता चलती हैं। जब तीन संवेदनाओं का मूलस्वरूप पता चले, तब आगे कुछ करने के लिए शेष नहीं बचता। (=अरहन्तफल)
3. मनोसंचेतना आहार
और, मनोसंचेतना आहार के प्रति कैसा भाव होना चाहिए?
कल्पना करो कि एक अंगारों से भरा हुआ गड्ढा हो—पुरुष की लंबाई से भी गहरा, ऐसे अंगारों से धधकता हुआ, जिसमें न लपटे निकलती हो, न ही धुँवा । और एक पुरुष है—जिसे अपने प्राण प्यारे है, और मौत से नफ़रत है, जिसे सुख की चाह है, और दर्द से घृणा।
तब, दो बलवान पुरुष आते हैं, और उस पुरुष की बाँह को पकड़ कर, उसे घसीटते हुए अंगारों से भरे हुए गड्ढे तक लाते हैं।
तब, जैसे उस पुरुष की चेतना होगी—दूर हट जाना। उसकी इच्छा होगी—दूर हट जाना। उसकी अभिलाषा होगी—दूर हट जाना। क्यों? क्योंकि उसे लगेगा, ‘यदि मैं इस अंगारों से भरे हुए गड्ढे में गिर जाऊ, तो उस कारण से मेरी मौत होगी, या मौत जैसी पीड़ा होगी।’
उसी तरह का भाव, मैं कहता हूँ, मनोसंचेतना-आहार के प्रति होना चाहिए।
उसी तरह, जहाँ मनोसंचेतना आहार के लिए राग, मज़ा, या तृष्णा हो —
- वहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगता है।
- जहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगे, वहाँ नाम-रूप प्रज्वलित होता है।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगती है।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगे, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगता है।
- और जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगे, वहाँ, मैं कहता हूँ—भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” के साथ ही साथ “शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी पीछे लग जाते हैं।
किंतु, कल्पना करो कि जैसे किसी छत वाले निवास या कक्ष के उत्तर, दक्षिण या पूर्व दिशा में, कोई खिड़की हो। जब सूरज उगता है, और सूर्य की किरण खिड़की से होकर कक्ष के भीतर प्रवेश करती है, तब वह कहाँ पड़ेगी?”
“पश्चिमी दीवार पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि पश्चिमी दीवार न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जमीन पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जमीन भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जल पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जल भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“तब, कही नहीं पड़ेगी, भन्ते!"
“उसी तरह, यदि मनोसंचेतना आहार के लिए न राग हो, न मज़ा लेना हो, न तृष्णा हो—
- तब वहाँ विज्ञान नहीं पड़ता, और बढ़ने नहीं लगता।
- जहाँ विज्ञान न पड़े, बढ़ने न लगे, वहाँ नाम-रूप भी प्रज्वलित नहीं होता।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित न हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि नहीं होती।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि न हो, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन नहीं होता।
- और, जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन न हो, वहाँ भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” नहीं होती। उसे, मैं कहता हूँ—“शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी नहीं हो सकती।
जब मनोसंचेतना आहार का मूलस्वरूप पता चलता है, तब तीन तरह की तृष्णाएँ (कामतृष्णा, भवतृष्णा, और विभवतृष्णा) भी पता चलती हैं। जब तीन तरह की तृष्णाएँ का मूलस्वरूप पता चले, तब आगे कुछ करने के लिए शेष नहीं बचता।
4. विज्ञान आहार
और, विज्ञान आहार के प्रति कैसा भाव होना चाहिए?
कल्पना करो कि कोई चोर पकड़ा जाता है, और उसे राजा के आगे पेश किया जाता है। (सैनिक कहते हैं,) “महाराज, यह अपराधी चोर है! आपको जैसा उचित लगे, वैसा उसे दंड दे।”
तब राजा कहता है, “सैनिकों, इसे ले जाओ! और सुबह होने पर इसे सौ भाले भोंकना!”
तब, सुबह होने पर उसे सौ भाले भोंक दिए जाते हैं।
तब, राजा दोपहर होने पर पूछता है, “सैनिकों, उसका क्या हाल है?”
“महाराज, वह अब भी जीवित है!”
“अच्छा? तो जाओ, सैनिकों, और दोपहर होने पर उसे फिर सौ भाले भोंकना!”
तब दोपहर होने पर उसे सौ भाले फिर से भोंक दिए जाते हैं।
तब, राजा शाम होने पर पूछता है, “सैनिकों, उसका क्या हाल है?”
“महाराज, वह अब भी जीवित है!”
“अच्छा? तो जाओ, सैनिकों, और शाम होने पर उसे फिर सौ भाले भोंकना!”
तब शाम होने पर उसे सौ भाले फिर से भोंक दिए जाते हैं।
तो, तुम्हें क्या लगता है? क्या उसे इस तरह तीन सौ भाले भोंक दिए जाने के कारण दर्द और पीड़ा होगी?”
“भन्ते, केवल एक ही भाला भोंक दिए जाने पर उसे भयंकर दर्द और पीड़ा होगी। तो, तीन सौ भालों का कहना ही क्या!”
उसी तरह का भाव, मैं कहता हूँ, विज्ञान आहार के प्रति होना चाहिए!
उसी तरह, जहाँ विज्ञान आहार के लिए राग, मज़ा, या तृष्णा हो —
- वहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगता है।
- जहाँ विज्ञान पड़कर बढ़ने लगे, वहाँ नाम-रूप प्रज्वलित होता है।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगती है।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि होने लगे, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगता है।
- और जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन होने लगे, वहाँ, मैं कहता हूँ—भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” के साथ ही साथ “शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी पीछे लग जाते हैं।
किंतु, कल्पना करो कि जैसे किसी छत वाले निवास या कक्ष के उत्तर, दक्षिण या पूर्व दिशा में, कोई खिड़की हो। जब सूरज उगता है, और सूर्य की किरण खिड़की से होकर कक्ष के भीतर प्रवेश करती है, तब वह कहाँ पड़ेगी?"
“पश्चिमी दीवार पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि पश्चिमी दीवार न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जमीन पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जमीन भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“जल पर, भन्ते!”
“किन्तु, यदि जल भी न रहे, तब कहाँ पड़ेगी?”
“तब, कही नहीं पड़ेगी, भन्ते!"
“उसी तरह, यदि विज्ञान आहार के लिए न राग हो, न मज़ा लेना हो, न तृष्णा हो—
- तब वहाँ विज्ञान नहीं पड़ता, और बढ़ने नहीं लगता।
- जहाँ विज्ञान न पड़े, बढ़ने न लगे, वहाँ नाम-रूप भी प्रज्वलित नहीं होता।
- जहाँ नाम-रूप प्रज्वलित न हो, वहाँ संस्कारों की वृद्धि नहीं होती।
- जहाँ संस्कारों की वृद्धि न हो, वहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन नहीं होता।
- और, जहाँ आगे भविष्यकाल के लिए भव का पुनरुत्पादन न हो, वहाँ भविष्य में “जन्म, बुढ़ापा, और मौत” नहीं होती। उसे, मैं कहता हूँ—“शोक, विलाप, दर्द, व्यथा और निराशा” भी नहीं हो सकती।
जब विज्ञान आहार का मूलस्वरूप पता चलता है, तब नाम-रूप भी पता चलता है। जब नाम-रूप का मूलस्वरूप पता चले, तब आगे कुछ करने के लिए शेष नहीं बचता।
—संयुत्तनिकाय १२:६३ + १२:६४ + अंगुत्तरनिकाय ७:४६
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