✦ ॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ॥ ✦
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— दुक्खा पटिपदा —
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दुक्खा पटिपदा

आदीनव संज्ञा

— काया के अवगुण देखना —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ४ मिनट
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आरोग्य का नशा

आधुनिक जीवन में शरीर को एक ‘अभेद्य किले’ की तरह देखा जाता है। तरह-तरह के वेक्सीन, दवाइयाँ, सप्लीमेंट्स, ऑर्गेनिक डाइट, जिम और एंटी-एजिंग क्रीमों के बल पर एक भ्रम पाला जाता हैं कि हम इस काया के मालिक हैं, यह काया हमारा ही आदेश सुनती है, और यह काया हमेशा स्वस्थ और युवा रहेगी।

इसी भ्रम को बुद्ध चंगाई का नशा (“अरोग मद”) कहते हैं।

‘आदीनव संज्ञा’ (काया के अवगुण और खतरों का दर्शन) इसी भ्रम को तोड़ने वाला एक सीधा प्रहार है। भगवान रोगों की सूची बताते हुए इस शरीर को कोई ‘अभेद्य किला’ या ‘पवित्र मंदिर’ नहीं, बल्कि ‘रोगों का घोंसला’ बताते हैं।

बीमारियों की यह सूची कोई मेडिकल डिक्शनरी नहीं, बल्कि मैं (काया) हूँ (“अस्मिमान”) पर किया गया एक वार है। हम भूल जाते हैं कि यह शरीर भीतर से कितना जर्जर और नाज़ुक है। मौसम का हल्का-सा बदलाव, खाए हुए भोजन का ज़रा-सा दूषित होना, या एक अदृश्य वायरस—और यह सारा शारीरिक घमंड और चंगाई का नशा मिनटों में बिस्तर पर धराशायी हो जाता है।

साधना अंत में तीन विशेष बातों पर ध्यान खींचती है: ठंडी, गर्मी, भूख, प्यास, और मल-मूत्र त्याग। भगवान के अनुसार ये जीवन की सामान्य प्रक्रियाएँ नहीं, बल्कि इस शरीर की दैनिक ‘बीमारियाँ’ हैं, जिनका हम जीवन भर एक भारी बोझ की तरह केवल ‘इलाज’ या रखरखाव करते रहते हैं।

अभ्यास कैसे करें?

दैनिक जीवन में इस साधना का अभ्यास शरीर की इस जर्जरता का दर्शन करना है:

  • दैनिक मजबूरी: जब भूख लगे, प्यास लगे, या बाथरूम जाना पड़े, तो इसे इस ‘रोगों के घोंसले’ की एक और मजबूरी और इसका एक ‘अवगुण’ मानकर देखें।
  • अस्पताल का स्मरण: जब सर्दी, बुखार, सिरदर्द या कोई भी बीमारी शरीर को पकड़े, तो उस पर चिढ़ने के बजाय स्वयं से कहें— “यही तो इस काया का मूल स्वभाव है! मैं इससे और क्या उम्मीद कर रहा था?”

सफलता का पैमाना

इस साधना का उद्देश्य शरीर से नफरत कर उस पर ध्यान देना छोड़ना नहीं है। सफलता तब मानी जाती है जब यह चंगाई का नशा पूरी तरह हवा हो जाए।

जब काया के अवगुण स्पष्ट होते हैं, तो काया के प्रति आपकी गहरी आसक्ति टूटने लगती है। इसके बाद, यदि कोई गंभीर रोग, बुढ़ापा या पीड़ा शरीर पर आ भी जाए, तो आपका चित्त चीखते हुए शिकायत नहीं करने लगता। वह इस पीड़ा को कोई ‘अन्याय’ न मानकर, शरीर होने की एक कीमत चुकाने की तरह उपेक्षा और गरिमा के साथ स्वीकार करता है। इसी ‘निब्बिदा’ (मोहभंग विरक्ति) में इस साधना की जीत है।

मूल साधना

अवगुण (खामियाँ, दुष्परिणाम) देखना क्या है?

कोई भिक्षु जंगल में, पेड़ के तले, या ख़ालीगृह में जाता है, और चिंतन करता है —

‘बड़ी पीड़ाएँ है इस शरीर की! बहुत अवगुण है!

इस शरीर में विविध बीमारियां उपजती है, जैसे —

  • आँख का रोग, कान का रोग, नाक का रोग, जीभ का रोग, काया का रोग,
  • सिर का रोग, मुँह का रोग, दाँत का रोग, होंठ का रोग,
  • खाँसी, दमा, जुक़ाम, बुखार,
  • बुढ़ापा, पेट दर्द, मूर्च्छित होना, दस्त, इन्फ्लूएंजा,
  • हैजा, कोढ़, फोड़ा, दाद, टीबी, मिर्गी,
  • त्वचा का रोग, खाज, पपड़ी निकलना, चकते पड़ना, खुजली,
  • पीलिया, मधुमेह, बवासीर, भगंदर, अल्सर,
  • पित्त कुपित होना, कफ कुपित होना, वात कुपित होना, तीनों दोष असंतुलित होना,
  • मौसम बदलाव से बीमारियाँ, शरीर की सही देखभाल न करने से बीमारियाँ,
  • पिटाई से ग्रसित, कर्म-विपाक की बीमारियाँ,
  • ठंडी, गर्मी, भूख, प्यास, मल व मूत्र त्याग।

—इस तरह, साधक अपने शरीर के अवगुणों का चिंतन करते हुए विहार करता है। इसे कहते है अवगुण देखना।

— अंगुत्तरनिकाय १०:६०

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