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— अकुशल का त्याग —
कामेच्छा | दुर्भावना | सुस्ती-तंद्रा | बेचैनी-पश्चाताप | उलझन

नीवरणप्पहान

अकुशल का त्याग

— चित्त को वशीभूत करने वाली रुकावटें —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| ४ मिनट
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हमारा चित्त मूलतः एक असीम और प्रचंड ऊर्जा का स्रोत है। लेकिन हम हर दिन खुद को कमज़ोर, थका हुआ और किसी न किसी मानसिक जकड़न में पाते हैं। यह दुःख और यह उलझन कोई बाहर से थोपी गई सज़ा नहीं है; यह हमारे ही भीतर पलने वाले कुछ ज़हरीले (‘अकुशल’) स्वभावों का परिणाम है।

चित्त जब इन अकुशल वृत्तियों का गुलाम बन जाता है, तो हमें लगने लगता है कि यही हमारी नियति है, और इनसे छूटना असंभव है। लेकिन भगवान बुद्ध एक गहरे सिंहनाद के साथ इस भ्रम को तोड़ते हैं:

भगवान कहते हैं —

अकुशल (स्वभाव) का त्याग करो! अकुशल का त्याग किया जा सकता है। यदि अकुशल का त्याग नहीं किया जा सकता, तो मैं तुमसे यह न कहता—‘अकुशल का त्याग करो!’ परंतु क्योंकि अकुशल का त्याग किया जा सकता है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ—‘अकुशल का त्याग करो!’

यदि अकुशल का त्याग करना अहितकर या पीड़ादायक होता, तो मैं तुमसे यह न कहता—‘अकुशल का त्याग करो!’ परंतु क्योंकि अकुशल का त्याग करना हितकर और सुखदायक है, इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ—‘अकुशल का त्याग करो!’

— अंगुत्तरनिकाय २:१९

लेकिन यह ‘अकुशल’ कोई रहस्यमयी बुराई नहीं है। ये हमारे ही भीतर बैठे पाँच मानसिक परजीवी पेरेसाईट हैं, जो हमारी मानस को बंधक बना लेते हैं। भगवान बुद्ध इन्हें ‘नीवरण’ (रुकावटें या आवरण) कहते हैं—एक ऐसा अंधापन जो हमारे विवेक (प्रज्ञा) को खोखला कर देता है।

ये पाँच व्यवधान और रुकावटें होती हैं, जो चित्त को वशीभूत कर लेती हैं और प्रज्ञा (=अन्तर्ज्ञान) को दुर्बल कर देती हैं। कौन-सी पाँच?

—ये पाँच व्यवधान और रुकावटें होती हैं, जो चित्त को वशीभूत कर लेती हैं और अन्तर्ज्ञान को दुर्बल कर देती हैं।

चित्त का बहाव

इन पाँच रुकावटों के कारण हमारी ऊर्जा कैसे बर्बाद होती है, इसे भगवान एक बेहद मारक उदाहरण से समझाते हैं:

कल्पना करो कि कोई प्रचंड नदी पहाड़ से उतर रही हो—तीव्र प्रवाह वाली, जो अपने साथ सब कुछ दूर तक बहा ले जाती है। अब कोई व्यक्ति आए, और उस नदी के दोनों तटों को कई जगह से खोदकर जलप्रवाह को भिन्न दिशाओं में मोड़ दे।

तब उस नदी की मुख्यधारा टूट जाएगी। उसके प्रवाह में व्यवधान आ जाएगा। उसका वेग मंद पड़ जाएगा और वह कमज़ोर होकर पहले की तरह सब कुछ दूर तक नहीं बहा पाएगी।

ठीक उसी प्रकार, जब तक कोई व्यक्ति इन पाँच व्यवधानों को दूर नहीं कर लेता, तब तक यह संभव नहीं कि वह—अपने कल्याण को जान पाए, या दूसरों के कल्याण को जान पाए, या आपसी कल्याण को जान पाए, या वास्तव में कोई मनुष्योत्तर अवस्था प्राप्त कर सके—कोई विशेष आर्य ज्ञानदर्शन।

अब कल्पना करो वही नदी—तेज़ प्रवाह के साथ पहाड़ से उतरती हुई—और कोई व्यक्ति आए, जो उन सभी कटी हुई जलधाराओं को बंद कर दे, जो तटों से बाहर भटक रही थीं।

तब नदी की मुख्यधारा अविच्छिन्न (अखंड) बनी रहेगी। उसके प्रवाह में कोई व्यवधान नहीं आएगा। उसका वेग बना रहेगा। वह सब कुछ अपने साथ दूर तक बहा ले जाएगी।

ठीक उसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति इन पाँच व्यवधानों को हटा देता है, तब यह संभव हो जाता है कि वह—अपने कल्याण को जान सके, दूसरों के कल्याण को जान सके, आपसी कल्याण को जान सके, और वास्तव में कोई मनुष्योत्तर अवस्था प्राप्त कर सके—कोई विशेष आर्य ज्ञानदर्शन।

— अङ्गुत्तरनिकाय ५:५१

जब तक नदी के किनारे टूटे हुए हैं, ऊर्जा कीचड़ में बहकर बर्बाद होती रहेगी। इन दरारों को पहचानना और इन्हें बंद करना ही मुक्ति का मार्ग है।

आगे क्या पढ़ें?

आइए, बिना किसी विलंब के सबसे पहली और सबसे खतरनाक दरार को बंद करने की ओर बढ़ें— यानी उस कामेच्छा की ओर—

  • जो हमारे हृदय पर कब्ज़ा कर उसे अपना बंदी बना लेती है,
  • और हमारी प्रज्ञा का सारा खून चूसकर हमें दुःखों की दलदल में फेंक देती है।
कामच्छन्द