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आज वर्तमान आध्यात्मिक जगत में, भगवान बुद्ध के नाम पर आनापान-स्मृति (श्वास-साधना) की दर्जनों नई-नई तकनीकें खोजी और सिखाई जा रही हैं। विडंबना यह है कि इनमें से अधिकांश विधियाँ बुद्ध की मूल देशना से कोसों दूर हैं।
आज हम भारतीय अपनी ही इस प्राचीन, मातृभूमि में जन्मी और महाफलदायी, महालाभकारी विद्या को सीखने के लिए विदेशी धरती की ओर देखते हैं, क्योंकि भारत भूमि से यह मूल तकनीक पूरी तरह से विस्मृत हो चुकी थी। हम चाहते हैं कि बुद्ध की उस प्राचीन, विशुद्ध और मूल आनापान विद्या को भारत में पुनः जीवंत किया जाए।
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वर्तमान भटकाव
वर्तमान में सिखाई जाने वाली अधिकांश तकनीकें अत्यंत विशिष्ट और कठोर नियमों से बंधी हैं। उन नियमों की विशिष्टता के कारण वे विधियाँ केवल पाँच से दस प्रतिशत साधकों की मानसिक बुनावट पर ही काम कर पाती हैं, जबकि शेष साधक ध्यान में विफल होकर निराशा और आत्मग्लानि का शिकार हो जाते हैं।
इसके विपरीत, भगवान बुद्ध द्वारा रचित मूल आनापान के सोलह चरण जान-बूझकर अत्यंत ‘सामान्य’ और लचीले रखे गए हैं। यही लचीलापन और विस्तार उन्हें दुनिया के हर प्रकार के साधक के लिए शत-प्रतिशत प्रभावी और अनुकूल बनाता है।
मूल विधि से भटकाव का यह सिलसिला सदियों पहले ही शुरू हो गया था। सदियों बाद लिखी गई अट्ठकथाओं और विशुद्धिमग्ग जैसे ग्रन्थों ने ध्यान को एक बहुत ही व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास तो किया, लेकिन ऐसा करते हुए वे बुद्ध के ‘मूल आनापान’ के सहज प्रवाह से दूर भटक गए।
हालाँकि, अपनी समझ से कुछ भी गढ़कर अभ्यास करने की यह प्रवृत्ति स्वयं भगवान बुद्ध के समय में भी मौजूद थी।
एक बार श्रावस्ती की बात है। भगवान ने पूछा, “भिक्षुओं, क्या आप आनापान-स्मृति की साधना करते हैं?” भंते अरिट्ठ ने भगवान को तुरंत उत्तर दिया, “भंते, मैं करता हूँ।” भगवान ने पूछा, “कैसे करते हो, अरिट्ठ?”
भंते अरिट्ठ ने उत्तर दिया, “भंते, मैं अतीत की कामुकता के प्रति कामेच्छा का त्याग कर, भविष्य की कामुकता के प्रति कामेच्छा से विरत रह कर, भीतर और बाहर के स्वभाव में प्रतिरोधी नजरियों को भली-भांति दूर कर—स्मृतिमान होकर श्वास लेता हूँ, स्मृतिमान होकर श्वास छोड़ता हूँ। इस तरह, भंते, मैं आनापान-स्मृति की साधना करता हूँ।”
तब भगवान ने (उसकी गरिमा रखते हुए) कहा, “वह एक प्रकार की आनापान-स्मृति है, अरिट्ठ। ऐसा नहीं कहूँगा कि नहीं है। लेकिन किस तरह आनापान-स्मृति विस्तार के साथ ‘परिपूर्णता’ को प्राप्त होती है, ध्यान देकर गौर से सुनों, मैं बताता हूँ…”
— संयुत्तनिकाय ५४:६
और फिर भगवान ने उन अद्भुत सोलह चरणों की देशना दी, जो साधक को शून्य से शिखर तक ले जाते हैं। लेकिन पहले उसका सैद्धांतिक पक्ष जानना आवश्यक है।
सैद्धांतिक पक्ष
भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को प्रेरित किया था कि वे इच्छुक उपासकों को स्मृतिप्रस्थान की साधना सिखाएँ। स्मृतिप्रस्थान का अभ्यास मुख्यतः चार प्रकार से होता है:
लोक के प्रति लालसा और नाराज़ी हटाकर —
- (कायानुपस्सना) काया को काया देखते हुए रहना
- (वेदनानुपस्सना) वेदना को वेदना देखते हुए रहना
- (चित्तानुपस्सना) चित्त को चित्त देखते हुए रहना
- (धम्मानुपस्सना) स्वभाव को स्वभाव देखते हुए रहना
— तत्पर, सचेत और स्मृतिमान।
बुद्ध द्वारा प्रतिपादित ‘आनापानसति’ की सबसे विशिष्ट बात यह है कि यह इन चारों सतिपट्ठानों को एक साथ, एकीकृत रूप में समेटती है। यह साधना कुल १६ चरणों में बँटी है, जो चार-चार की चार चौकड़ियों में विभाजित है:
- पहली चौकड़ी (१-४): कायानुपस्सना (शरीर की सजगता)
- दूसरी चौकड़ी (५-८): वेदनानुपस्सना (अनुभूतियों की सजगता)
- तीसरी चौकड़ी (९-१२): चित्तानुपस्सना (चित्त की सजगता)
- चौथी चौकड़ी (१३-१६): धम्मानुपस्सना (स्वभाव की सजगता)
इस प्रकार (सोलह चरणों में) आनापान-स्मृति की साधना करना और उसे विकसित करना, महाफलदायी और महालाभकारी होता है।
- इस प्रकार आनापान-स्मृति की साधना करने और उसे विकसित करने से, चार स्मृतिप्रस्थान परिपूर्ण होते हैं।
- चार स्मृतिप्रस्थान की साधना करने और उसे विकसित करने से, सात संबोध्यङ्ग परिपूर्ण होते हैं।
- सात संबोध्यङ्ग की साधना करने और उसे विकसित करने से, विद्या और विमुक्ति परिपूर्ण होते हैं।
समथ-विपस्सना का संगम
आजकल ध्यान की अनेक पद्धतियों में समथ (चित्त की निश्चल एकाग्रता) और विपस्सना (प्रज्ञा की अंतर्दृष्टि) को दो अलग-अलग साधनाओं के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन भगवान द्वारा खोजी गई आनापान की इस मूल तकनीक में, समथ और विपस्सना दोनों का एक साथ, एकीकृत रूप में प्रयोग किया गया है।
बुद्ध के मूल वचनों में समथ के लिए समाधि के चार ‘निमित्त’ (आलंबन) बताये गये हैं—श्वास, वेदना, चित्त, और स्वभाव।
चार स्मृतिप्रस्थान ही समाधि के चार निमित्त हैं।
सरल शब्दों में, जब ध्यान करने पर आपको अपनी “श्वास” स्पष्ट रूप से पकड़ में आने लगे, तो कहा जाता है कि आपको काया का “निमित्त” मिल गया। उसी तरह, आगे जब वेदना, चित्त, या स्वभाव भी पकड़ में आने लगे, तो कहा जाएगा कि आपको उनके “निमित्त” मिल गए। इन्हीं निमित्तों को आधार बनाकर समाधि गहरी की जाती है।
दूसरी ओर, विपस्सना को एक विशेष साधना या एक अंतर्दृष्टि के रूप में समझा जाता है, जिसमें साधक पाँच स्कंधों को “अनित्य, दुःख और अनात्म” पहलुओं को देखता है। उस तरह देखने से उसका चित्त उन पाँच स्कंधों से विरक्त हो सकता है। हालाँकि, कुछ लोग विपस्सना के नाम पर केवल ‘वेदनानुपस्सना’ करते हुए ही अपना जीवन बिता देते हैं। जबकि उन्हें अन्य स्मृतिप्रस्थानों (जैसे चित्तानुपस्सना और धम्मानुपस्सना) की ओर बढ़ते हुए अपनी प्रज्ञा को और अधिक बढ़ाना चाहिए था।
किन्तु, भगवान ने अपनी खोजी गई तकनीक में ‘समथ’ और ‘विपस्सना’, दोनों को एक साथ जोड़ दिया है। आनापानसति के ये सोलह चरण “समाधि के चार निमित्त” ढूँढने में सक्षम तो हैं ही, साथ ही “चार ध्यान” प्राप्त कराने के लिए भी अत्यंत अनुकूल हैं। और तो और, “विपस्सना की चित्त-विमुक्ति” के परम लक्ष्य को पाने में भी ये अनुत्तर भूमिका अदा करते हैं।
चित्त-संस्कारों की समझ
भगवान के आनापान में एक बहुत ही स्पष्ट पैटर्न देखने को मिलता है। उदाहरणार्थ, कायानुपस्सना करते हुए पहले उसके निमित्त को पकड़ना होता है। जैसे चरण एक, दो, तीन, पाँच और छह इत्यादि से हम निमित्तों को पकड़ना, और उनके प्रति संवेदनशील होना सीखते हैं। जब वे पकड़ में आ जाएँ, तब हमें अपनी संवेदनशीलता को सूक्ष्म स्तर पर ले जाना होता है, ताकि हम उसकी आंतरिक रचना और उनके संस्कृत होने की प्रक्रिया को समझ सकें।
संस्कार मुख्य रूप से तीन तरह के होते हैं: काया-संस्कार (श्वास), वाचा-संस्कार (वितर्क और विचार), और चित्त-संस्कार (संज्ञा और वेदना)। चूँकि मूल आनापान में ध्यान करते हुए हम वाचा-संस्कार (विचार) नहीं रचते, इसलिए हमें केवल दो संस्कारों पर ही अपना ध्यान केंद्रित करना होता है। पहली चौकड़ी में ‘काया-संस्कार’ को शांत करना सीखना होता है, और दूसरी चौकड़ी में ‘चित्त-संस्कार’ को।
किसी भी संस्कार को शांत करने के लिए पहले उसे समझना आवश्यक है—कि किस तरह हम बेहोशी में उसे रचते जा रहे हैं। उसके लिए हमें “समथ” काम आता है, जो हमें एकाग्रता देकर उनके प्रति संवेदनशील बनाता है, और उन्हें देख पाने की एक मज़बूत नींव उपलब्ध कराता है। उसी स्थिर और एकाग्र चित्त से हम उन संस्कारों को बनते हुए प्रत्यक्ष देख पाते हैं।
जैसे श्वास को उसकी लंबाई में जानने के बाद, हम सूक्ष्म स्तर पर समझने के लिए उसे पूरी काया में फैलते हुए श्वास के रूप में देखते हैं, ताकि हमें काया-संस्कार का गहरा स्तर समझ में आए, और ताकि फिर हम उसे शांत कर सकें। उसी तरह, चित्त-संस्कार को समझने के लिए हमें ‘संज्ञा’ और ‘वेदना’ को समझना आवश्यक है। एकाग्रता से प्राप्त प्रीति और सुख को महसूस करते हुए, फिर हम चित्त-संस्कार समझते हैं, संज्ञाओं और वेदनाओं को समझते हैं और अंततः उन्हें भी शांत करते जाते हैं।
मूल आनापान की विशेषताएँ
चारों स्मृतिप्रस्थानों का एक साथ घटित होना
हालांकि सोलह चरणों का अभ्यास क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है, परन्तु वास्तविक अनुभव में चारों अनुपस्सनाएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं और साथ-साथ घटित हो सकती हैं। उदाहरणतः, जब साधक कायानुपस्सना कर रहा होता है, तो उसके साथ ही वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना और धम्मानुपस्सना के चरण भी सूक्ष्म रूप में चलते रहते हैं।
जैसे कोई काँच की खिड़की से बाहर देख रहा हो, और उसे एक ही समय में खिड़की की फ्रेम, काँच, बाहर का करीबी दृश्य, और दूर का दृश्य भी साथ-साथ दिखता है। हमें केवल अपने ध्यान को आगे-पीछे करना होता है।
यह अभ्यास केवल क्रमबद्ध नहीं है
कई बार तीसरे चरण में ही पाँचवाँ और छठा चरण (वेदना की अनुभूति को देखना) स्वतः प्रकट हो सकता है। चौथे चरण में साधक एक से अधिक ध्यानों का अनुभव कर सकता है। इसलिए इस अभ्यास में लचीलापन स्वाभाविक है।
ध्यान कोई यांत्रिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव है। साधक केवल किसी तयशुदा क्रम का पालन नहीं करता, बल्कि वह अपने अनुभव की रोशनी में अगला चरण स्वयं पहचानता है। यह प्रक्रिया आत्म-निरीक्षण, संवेदनशीलता और आंतरिक गहराई से आगे बढ़ती है।
समथ और विपस्सना का संगम
आनापान की इस ध्यान प्रक्रिया में समथ और विपस्सना दोनों ही इस तरह जुड़े हैं कि उन्हें अलग-अलग करना मुश्किल होगा। लेकिन फिर भी, यदि इन सोलह चरणों को समझने के लिए श्रेणीबद्ध किया जाए, तो पता चलता है कि पहले साधक अपनी संवेदनशीलता बढ़ाता है, और संवेदनशील होकर वह निमित्त पकड़ता है।
निमित्त पकड़कर वह संस्कारों को समझता है। फिर संस्कारों को विपस्सना के चरणों से शांत कर गहरी समथ अवस्था को प्राप्त करता है। इस तरह, गहरी-गहरी अवस्थाओं में उतरते हुए, वह अपने चित्त की स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतम—सभी आसक्तियों का परित्याग करता है।
चरण एक, दो, तीन, पाँच, छह और नौ शरीर, संवेदना और चित्त के प्रति सूक्ष्म जागरूकता उत्पन्न करते हैं। यह संवेदनशीलता से निमित्तों का ग्रहण होना है। इन निमित्तों को पकड़कर चरण चार, सात और आठ इत्यादि से वह संस्कारों को गहराई से समझने में सक्षम होने लगता है। यही सक्षमता उसे आगे चलकर, विपस्सना या सच्ची अंतर्दृष्टि के द्वार खोलती है। और अंततः, गहरी अंतर्दृष्टि पाकर साधक संस्कारों को निरुद्ध करना सीखता है।
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आइए, अब हम बुद्ध की मूल आनापान साधना के उन सोलह चरणों में प्रवेश करें, और उन्हें एक-एक कर गहराई से समझें।
(१)
दीघं वा अस्ससन्तो ‘दीघं अस्ससामी’ति पजानाति,
दीघं वा पस्ससन्तो ‘दीघं पस्ससामी’ति पजानाति।
लंबी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘लंबी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
यदि श्वास लंबी हो, तो स्पष्ट अनुभव हो कि वह कैसी और कितनी लंबी है—लेते और छोड़ते दोनों समय। इसी तरह, यदि श्वास गहरी या भारी हो, तो भी सजग रहें कि वह कैसी और कितनी गहरी या भारी है।
(२)
रस्सं वा अस्ससन्तो ‘रस्सं अस्ससामी’ति पजानाति,
रस्सं वा पस्ससन्तो ‘रस्सं पस्ससामी’ति पजानाति;
छोटी श्वास छोड़ते हुए जानता है, ‘छोटी श्वास छोड़ रहा हूँ।’
यदि श्वास छोटी हो, तो सजगता से जानें कि वह कैसी और कितनी छोटी हो गई है—लेते और छोड़ते समय दोनों। यदि श्वास छिछली, हल्की या धीमी हो, तो भी स्पष्ट अनुभव करें कि वह इस तरह और इतनी है।
श्वास का रूप चाहे बदलता रहे—कभी लंबी, भारी, तेज़; तो कभी हल्की, छोटी, धीमी—उसे जैसे है वैसे जानना ही साधना है। यदि बीच में विचार भटकाएँ या नींद घेरने लगे, तो एक गहरी श्वास लेकर फिर से ध्यान श्वास पर स्थिर करें।
जब हम निरंतरता से श्वास को जानते रहते हैं, तब एक समय आता है, जब श्वास चाहे बड़ी हो या छोटी, हमें श्वास का “निमित्त” प्राप्त होता है। और तब से, बड़ी आसानी से हम श्वास के उस आलंबन को पकड़ कर अगले चरणों में आगे बढ़ते हैं।
(३)
‘सब्बकायप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘सब्बकायप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
पूरी काया महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
यह अभ्यास केवल श्वास को देखने और जानने भर की निष्क्रिय प्रक्रिया नहीं है। यह “सीखने” की एक जीवंत और सक्रिय साधना है। इसमें साधक यह अभ्यास करते हुए सीखता है कि वह श्वास को पूरे शरीर के साथ जोड़कर, उसे शरीर भर में महसूस करते हुए ले और छोड़े।
यह चरण श्वास को शरीर तक विस्तारित करने जैसा है—एक गहरी संवेदनशीलता, जो केवल नासिका या छाती तक सीमित न रहकर पूरे शारीरिक क्षेत्र को समेटने लगती है।
यहाँ ‘पूरी काया’ का अर्थ समझना अत्यंत आवश्यक है।
अट्ठकथा में कहा गया है कि यहाँ ‘काया’ का अर्थ केवल ‘श्वास की पूरी लंबाई’ से है। लेकिन गहराई से विचार करने पर यह व्याख्या उचित नहीं लगती।
- पहला कारण यह है कि पहले दो चरण ही श्वास की पूरी लंबाई (लंबी या छोटी) को जानने पर आधारित हैं, इसलिए यहाँ फिर से उसी बात को दोहराना नया कदम नहीं हो सकता।
- दूसरा, बुद्ध ने ठीक अगले यानी चौथे चरण में श्वास को स्पष्ट रूप से ‘काय-संस्कार’ कहा है। यदि वे यहाँ ‘काया’ और अगले में ‘काय-संस्कार’ दोनों का अर्थ श्वास ही ले रहे होते, तो वे अवश्य इसका संकेत देते।
- तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि चौथा चरण चित्त को चतुर्थ-ध्यान की ओर ले जाता है, जहाँ श्वास अत्यंत सूक्ष्म होकर लगभग रुक जाती है, और शरीर एक शुद्ध, उज्ज्वल सजगता से भर जाता है। उस अवस्था में प्रवेश करने से पहले पूरी काया के प्रति यह सूक्ष्म सजगता आनी अनिवार्य है।
इसलिए, “पूरी काया की अनुभूति” का तात्पर्य केवल श्वास की लंबाई नहीं, बल्कि व्यापक, सजीव और सजगता के साथ पूरे शरीर की अवस्था पर चित्त का फैलना है।
इस चरण का एक व्यावहारिक तरीका यह है—शरीर के किसी एक हिस्से से शुरुआत करें, जैसे नाभि से। श्वास लेते हुए उस क्षेत्र को सजग बनाएं, फिर धीरे-धीरे वहाँ से ऊपर—पेट, छाती, गला, सिर, गर्दन, कंधे, बाँहें, हाथ, पीठ, कमर, नितंब, जांघें और पैर की ओर आगे बढ़ें। हर क्षेत्र को श्वास के स्पर्श से संवेदनशील करें, उसे जीवित जानें।
विपस्सना साधक सिर से पैर तक, और पैर से सिर तक शरीर का क्रमिक अवलोकन करते हैं। यह शरीर के प्रति संवेदनशीलता जगाने का एक अत्यंत प्रभावी तरीका है, लेकिन इस प्रक्रिया में वे अक्सर श्वास का आलंबन छोड़ देते हैं। जबकि बुद्ध के ‘मूल आनापान’ की सबसे बड़ी खूबी ही यह है कि इसमें श्वास का साथ किसी भी चरण में नहीं छूटता—चाहे वह वेदनानुपस्सना हो, चित्तानुपस्सना हो, या धम्मानुपस्सना। श्वास हर पल एक अटूट धागे की तरह बना रहता है।
निसंदेह, शरीर के अंगों का इस तरह अलग-अलग अवलोकन करने से सूक्ष्म जागरूकता का विकास होता है। लेकिन जब पूरे शरीर में पर्याप्त सजगता आ जाए, तो अपने ध्यान को किसी एक केंद्र—जैसे छाती या नाभि—पर स्थिर करें और श्वास की लय के साथ शरीर के सभी हिस्सों को एक सूत्र में पिरो दें। ऐसा करने से आपका पूरा शरीर अलग-अलग टुकड़ों के बजाय एक सजीव, अखंड और पूर्ण इकाई की तरह महसूस होने लगेगा।
लेकिन याद रखें कि कोई एक तरीका ही सर्वश्रेष्ठ और अंतिम नहीं होता—जो सहज लगे, वही मार्ग अपनाएँ। लक्ष्य यही है—श्वास के साथ-साथ पूरे शरीर को एक साथ, एक इकाई की तरह, सजीव और सचेत अनुभव करना।
जब सभी हिस्सों में सजगता भर जाए, तब उन्हें अलग-अलग न जानें—अब पूरे शरीर को एक साथ, समग्रता में, श्वास लेते और छोड़ते समय अनुभव करें। जिस प्रकार एक धागा बिखरे हुए फूलों को पिरोकर उन्हें एक अखंड माला का रूप दे देता है, ठीक उसी प्रकार महसूस करें कि श्वास आपकी संपूर्ण काया के अंग-अंग को आपस में पिरोते हुए, कोने-कोने में गहराई से प्रवाहित हो रही है।
इस चरण में जैसे-जैसे एकाग्रता बढ़ती है, वैसे-वैसे हम कामुकता से दूर होने लगते हैं। हमें शरीर को ‘उबटन या आटे का गोला’ समझकर उलट-पुलट करते हुए, श्वास के साथ जागरूकता फैलाना होता है। इस कार्य में समय पाकर एक ‘निर्लिप्तता’ से उत्पन्न प्रीति-सुख उपजती है। भगवान उपमा देते हुए कहते हैं —

जैसे, कोई कुशल स्नान-सेवक काँस की थाली में स्नान-चूर्ण (उबटन) डाले और उसमें धीरे-धीरे जल छिड़ककर उसे गूँथे, ताकि वह चूर्ण-पिंड भीतर और बाहर से पूरी तरह जल से व्याप्त हो जाए, किंतु जल बाहर न टपके।
उसी तरह, वह उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस विलगता से जन्मे प्रीति और सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे।
इस चरण के पूर्ण होते-होते सम्यक-समाधि का “प्रथम ध्यान” विकसित होता है, और साधक आर्य अष्टांगिक मार्ग की ओर अग्रसर होने लगता है।
(४)
‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
काया के संस्कारों को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
जब श्वास के साथ पूरे शरीर को एक साथ अनुभव करने की क्षमता आ जाए, तब अगला स्वाभाविक कदम है—उसे शांत करना, स्थिर बनाना, और रुका ही देना।
यहाँ “काय-संस्कार” का आशय केवल श्वास नहीं है, बल्कि वह पूरी लयबद्ध प्रणाली है जो श्वास और शरीर को आपस में जोड़ती है। प्रारंभिक सूत्रों के अनुसार, आश्वास-प्रश्वास (श्वास) को ही काया-संस्कार कहा गया है, क्योंकि यह सीधे काया से जुड़ी हुई प्रक्रिया है। इसे हम शारीरिक हलचल या शरीर में चल रहा ऊर्जा-प्रवाह भी कह सकते हैं, जिसे ध्यान में धीरे-धीरे शांत किया जाता है।
हमारा काम है—श्वास को ऐसा बना देना, जो स्वयं में सौम्य, राहतपूर्ण और संतुलित हो, जिससे यह गुण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैल जाए।
जब श्वास सहज और कोमल हो, तब वह शरीर के भीतर उन क्षेत्रों तक पहुँचने लगती है जहाँ पहले तनाव या कठोरता बनी हुई थी। ध्यानपूर्वक उन हिस्सों पर श्वास भेजें—जैसे जबड़ा, हृदय, नितंब, और रीढ़—और देखें कि वहाँ कैसी धाराएँ चल रही हैं। श्वास को इस तरह अनुभव करें कि वह थामे नहीं, धकेले नहीं—बस धीरे-धीरे गला दे, और खोल दे।
यह कोई बलपूर्वक शान्त करने की प्रक्रिया नहीं है—बल्कि एक निमंत्रण है शरीर को: “आराम कर लो… स्थिर हो जाओ… तुम्हें अब थामने की ज़रूरत नहीं।”
जैसे-जैसे यह कौशल गहराता है, शरीर की सूक्ष्म हलचलों पर पकड़ बढ़ती है—और वे स्वाभाविक रूप से शांत होने लगती हैं। सूक्ष्म होती जागरूकता से हम शरीर की सूक्ष्म गहराइयों में उतरने लगते हैं। जैसे-जैसे हम गहराइयों में उतरते हैं, वैसे-वैसे सूक्ष्म हलचल को शांत करते जाते हैं।
और एक समय आता है, जब श्वास और शारीरिक गतिविधियां शान्त होते-होते पूरी तरह रुक जाती हैं। ऐसा प्रायः चतुर्थ-ध्यान में होता है, जहाँ श्वास भीतर-बाहर लगभग पूरी तरह रुक जाती है। उस अवस्था में मानस, यानी जागरूकता, शरीर के भीतर सिमटी हुई नहीं रह पाती, बल्कि पूरे शरीर में और मानो शरीर के बाहर तक भी, गुब्बारे की तरह फैल जाती है। यही चतुर्थ ध्यान का संकेत है।
भगवान उसके लिए उपमा देते हुए कहते हैं—

जैसे, कोई पुरुष सिर से पैर तक सफ़ेद उज्ज्वल चादर ओढ़कर बैठा हो, जिससे उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस सफ़ेद वस्त्र से बिना ढका न रह जाए। उसी तरह वह काया में उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त को फैलाकर बैठता है, ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस परिशुद्ध उजालेदार चित्त से अव्याप्त न रह जाए।
यह अवस्था चतुर्थ ध्यान का द्वार खोलती है—एक ऐसा ठहराव जहाँ शरीर, श्वास, और चित्त में परस्पर एक सौम्य सामंजस्य उत्पन्न होता है।
(५)
पीतिपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘पीतिपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
प्रीति महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
श्वास को देखते-देखते एक समय आता है जब वेदना का “निमित्त” मिलने लगता है। वेदना के निमित्त को पकड़ने से चित्त एक सूक्ष्मता को प्राप्त करता है, शरीर की स्थूल ऊर्जाएँ पिघलने लगती हैं, और स्थूल अनुभूतियों की धुंध छंटने लगती है। उसी के साथ, एक सूक्ष्म ऊर्जा फूट पड़ती है और शरीर में बहने लगती है। यह शरीर को रोमांचित करती है, पुरानी स्थूल और बासी ऊर्जाओं को बाहर खदेड़ती है, और एक नयी उम्मीद व स्फूर्ति जगाती है। इसे ही प्रीति, पुलक-रोमांच, या हर्ष कहते हैं।
यह चरण किसी भी समय स्वयं आ सकता है। लेकिन भगवान के अनुसार हमें अपने अभ्यास से ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करना होता है, जिससे कि यह प्रीति की धारा फूट पड़े। जब भी वह फूट पड़े, हमें संपूर्ण शरीर के कोने-कोने में उसे प्रवाहित कर, अधिक-से-अधिक समय तक बहने देना होता है, और पूरी तरह डुबो देना होता है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यह प्रीति स्वास्थ्य और ध्यान दोनों के लिए अत्यंत लाभकारी है, इसलिए इसे बढ़ाकर, विकसित कर अधिक-से-अधिक समय तक सेवन करना चाहिए। स्वयं भगवान बुद्ध समय-समय पर केवल इसी प्रीति-भोज का अनुभव करते हुए विहार करते थे।
बाद के कुछ ग्रंथों में इस प्रीति से भय उत्पन्न कराया गया और कहा गया कि इससे आसक्ति हो सकती है जिससे मुक्ति में विलंब होता है। लेकिन भगवान के अनुसार यह प्रीति एक संबोध्यङ्ग (जागृति का अंग) है, जिसे बढ़ाकर परिपूर्ण करना होता है। यदि प्रीति परिपूर्ण न हो, तो सम्यक-समाधि प्राप्त नहीं हो सकती, और सम्यक-समाधि के बिना आर्य अष्टांगिक मार्ग और मुक्ति दोनों ही असंभव हैं।
ध्यान रहे कि हमें इस तरह से श्वास लेना और छोड़ना सीखना है कि प्रीति महसूस हो। ज़ाहिर है कि इसमें श्वास के साथ प्रयोग करना आवश्यक होता है। तरह-तरह से श्वास लेकर, शरीर के भिन्न-भिन्न हिस्सों से गुज़ारते हुए, साधक अंततः अपने अन्तर्ज्ञान से ऐसे अनेक बटनों को ढूँढने में सफल होता है, जिन्हें दबाने पर प्रीति सक्रिय हो उठे और उसकी धारा बहने लगे।
भगवान उपमा देते हुए कहते हैं—

जैसे, कोई गहरी झील हो, जिसमें नीचे तल से जल का स्रोत फूटता हो। उस झील में न तो पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण दिशा से पानी की कोई धारा आती हो, और न ही समय-समय पर देवता वर्षा कराते हो। तब उस झील की गहराई से निकलने वाला वह शीतल जल-स्रोत ही पूरी झील को ठंडे पानी से सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि झील का पूरा जल उस शीतल जल से ओत-प्रोत हो जाए। उसके जल का कोई भी अंश उस शीतल जल से अव्याप्त न रहे।
उसी तरह वह उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से काया को सींचता है, भिगोता है, फैलाता है, पूर्णतः व्याप्त करता है। ताकि उसके शरीर का कोई भी हिस्सा उस समाधि से उपजे प्रीति और सुख से अव्याप्त न रह जाए।
इस चरण को पूर्ण करते हुए द्वितीय-ध्यान अवस्था विकसित होती है, और हम आर्य अष्टांगिक मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।
(६)
सुखपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘सुखपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
सुख महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
जब शरीर में प्रीति का संचार होता है, तब मानो, पर्दे के पीछे सुख, शीतलता की अनुभूति कराते हुए शरीर में फैलता रहता है। अंततः एक समय आता है, जब प्रीति भी “स्थूल” महसूस होने लगती है। तब साधक उस स्थूल प्रीति से चित्त को विरक्त करता है, और चित्त को उसके आधार से मुक्त करता है। उसी के साथ, चित्त को अत्यधिक स्थिर एकाग्रता प्राप्त होती है। सुख, मानो, पर्दे के पीछे से निकलकर आगे आता है, और एक अभूतपूर्व राहत और शांति देते हुए, शरीर को एक शीतल गीलेपन में भिगोते हुए फैलने लगता है।
तब साधक को चाहिए कि वह उसे, श्वास के साथ-साथ, शरीर के कोने-कोने में फैलने दे, ताकि पूरा शरीर सुख में पूरी तरह डूब जाए।
यह सुख कोई सामान्य कामसुख जैसा अकुशल नहीं होता। बल्कि यह अत्यंत कुशल और आध्यात्मिक सुख है, जो चित्त की स्थिर एकाग्रता के कारण पैदा होता है। भगवान स्पष्ट रूप से कहते हैं कि इस ध्यान-सुख के साथ जुड़ना चाहिए, इसकी साधना करनी चाहिए, इसे विकसित करना चाहिए और इससे बिल्कुल भयभीत नहीं होना चाहिए।
इस चरण को पूर्ण करते हुए तृतीय-ध्यान अवस्था विकसित होती है, और हम आर्य अष्टांगिक मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।
भगवान उपमा देते हुए कहते हैं—

जैसे, किसी तालाब में नीलकमल, लाल कमल या श्वेत कमल खिले हों। वे फूल पानी से बाहर नहीं निकलते, बल्कि पानी के भीतर ही जन्म लेते हैं, भीतर ही बढ़ते हैं और भीतर ही डूबे रहते हैं। वे अपनी जड़ से लेकर पंखुड़ियों तक उसी शीतल जल से सींचे जाते हैं, भिगोए जाते हैं, फैलाए जाते हैं, पूर्णतः व्याप्त किए जाते हैं। उन कमलों का कोई भी अंश उस शीतल जल से अछूता नहीं रहता।
उसी तरह वह उस प्रीति-रहित सुख से अपनी काया को इस प्रकार सींचता है, भिगोता है, फैलाता है और पूर्णतः व्याप्त करता है कि उसका पूरा शरीर उस सुख से ओत-प्रोत हो जाए। उसकी काया का कोई भी अंश उस प्रीति-रहित सुख से अछूता (अव्याप्त) न रहे।
(७)
‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘चित्तसङ्खारपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
चित्त के संस्कारों को महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
चित्त की रचना दो कारकों से प्रभावित होती है—वेदना और संज्ञा। दोनों ही चैतसिक हैं, यानी सीधे चित्त से जुड़े हुए हैं। इसी कारण “संज्ञा और वेदना” का जोड़ ही ‘चित्त-संस्कार’ कहलाता है। वास्तव में, चित्त में जो तरह-तरह के संस्कार बनते रहते हैं, वे इसी संज्ञा और वेदना के मेल से बनते हैं।
उदाहरण के लिए, यदि “मेरा शत्रु” एक संज्ञा है और इसके साथ “दुखद वेदना” जुड़ी हो, तो चित्त-संस्कार एक तरह का बनेगा (जैसे क्रोध)। लेकिन यदि इसी व्यक्ति को “पीड़ित” मान लें और वेदना बदल जाए, तो चित्त की बनावट भी बदल जाएगी। इस चरण में साधक को यही देखना है कि वेदना कैसे संज्ञा से जुड़कर चित्त-संस्कार बनाती है, और संज्ञा बदलते ही वेदना कैसे बदल जाती है। यही चित्त-संस्कार को प्रत्यक्ष रूप से देखने की साधना है।
इस तरह दोनों कारकों का खेल देखकर, और हम स्वयं भी खेलकर, चित्त-संस्कारों के प्रति गहन अंतर्दृष्टियों को प्राप्त करते हैं। इसी चरण में हम “संस्कार” की प्रक्रिया सीखते हैं, और उनकी बहती धाराओं को समझने लगते हैं। आगे चलकर, हम जितना हो सके, उतना इस प्रक्रिया पर नियंत्रण प्राप्त करते हैं। और इसे सीखने के लिए भी प्रयोग करने पड़ते हैं।
(८)
‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
चित्त के संस्कारों को शान्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
चित्त-निर्माण की प्रक्रिया को सीखते-सीखते, गहन अंतर्दृष्टियों को प्राप्त करते-करते, हम इन्हें शान्त करना सीखते हैं।
इसे शांत करने का एक बहुत ही व्यावहारिक तरीका संज्ञा को बदलना है। एक ही अनुभव पर अलग-अलग संज्ञा रखने से चित्त-संस्कार बदल जाते हैं—कभी वह शांत होता है, कभी बेचैन।
उदाहरण के लिए, “मेरा शरीर” की स्थूल संज्ञा के साथ भारीपन या असहजता जुड़ सकती है, लेकिन जब इसी संज्ञा को बदलकर “धातुओं का संयोग” या “क्षण-क्षण बदलती प्रक्रिया” के रूप में देखा जाता है, तो वेदना हल्की हो जाती है और चित्त-संस्कार तुरंत शांत होने लगते हैं। इस कदम में साधक जान-बूझकर स्थूल संज्ञाओं को छोड़ता है और सूक्ष्म से सूक्ष्मतम संज्ञाओं का उपयोग करता है। जैसे-जैसे संज्ञा सूक्ष्म होती जाती है, वैसे-वैसे चित्त के संस्कार स्वतः शांत होने लगते हैं।
इसमें भी श्वास लेते और छोड़ते हुए हम उन चैतसिक ऊर्जाओं को शान्त करने के तरीके सीखते हैं, जो जागरूकता की पृष्ठभूमि में निरंतर जकड़न पैदा कर रही थीं। श्वास की लय के साथ सूक्ष्म संज्ञाओं को बदलते ही, चित्त का कोलाहल शांत होकर एक गहरे मौन में बदलने लगता है।
इस चरण के साथ-साथ हम ध्यान की गहन-गहन और प्रशान्त अवस्थाओं को प्राप्त करते हैं, और उसके परे झाँकने का प्रयास भी करते हैं। जब हम हमारी जानकारी में उपस्थित सभी चित्त-संस्कारों को शान्त करते हुए चलते हैं, तब अंततः, एक समय आता है, जब चित्त निरोध का द्वार भी खुलता है।
यह चरण तेरह से सोलह चरणों के साथ-साथ भी घटित हो सकता है।
(९)
‘चित्तपटिसंवेदी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘चित्तपटिसंवेदी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
चित्त महसूस करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
चित्त-संस्कारों को जानते हुए, उसे बदलते हुए, हम चित्त के प्रति संवेदनशील होने लगते हैं, और चित्त का “निमित्त” भी पकड़ में आने लगता है। जब हमारी जागरूकता इतनी सूक्ष्म हो जाए कि वह अपने चित्त के आलंबन को कुशलता से पकड़ सके, और उसके अनेक प्रकारों, आकारों और रंगों को जान सके, तब वाकई माना जाता है कि साधक का चित्त बहुत सूक्ष्म हो चुका है।
इतनी सूक्ष्म जागरूकता वाला व्यक्ति, अपने चित्त के साथ-साथ अक्सर पराए व्यक्ति का चित्त जानने में भी सक्षम हो जाता है। लेकिन यदि ऐसा न हो, तब भी हमें कम-से-कम स्वयं का चित्त जानने में सक्षमता हासिल करनी ही चाहिए, और यह कार्य भी श्वास के साथ जुड़ा होना चाहिए।
(१०)
‘अभिप्पमोदयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘अभिप्पमोदयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
चित्त को प्रसन्न करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
जब साधक को अपना चित्त पता चलने लगे, तो उसे चित्त को प्रमुदित या प्रसन्न करना आवश्यक है। क्योंकि प्रसन्न चित्त का सरलता से प्रसारण और विस्तार होता है, और वह विस्तारित चित्त की श्रेणी में आने लगता है। साथ ही, विस्तारित चित्त “अनुत्तर” होने की दिशा में भी आगे बढ़ता है।
विस्तारित चित्त में अनेक अनोखे गुणधर्म होते हैं, जैसे वह अत्यधिक उजालेदार, लचीला, हल्का, लेकिन शक्तिशाली होता है। और अनुत्तर चित्त अत्यधिक सूक्ष्म अवस्थाओं को पाने लगता है, जिसे पहले कभी प्राप्त न किया गया हो।
चित्त के ये गुणधर्म साधक को अनेक संभावनाओं की ओर अग्रसर करते हैं, जैसे दूसरों के मन को पढ़ लेना, दूर की मानवीय या अमानवीय आवाज़ें भी सुन लेना, या दूरदृष्टि से सब देख लेना इत्यादि। अनुत्तर चित्त में साधक अपने अनेक जन्मों से लगे चित्त के अवरोधपूर्ण सीमाओं को लाँघने लगता है, और अनुत्तर अवस्थाओं में प्रवेश करता है।
चित्त को पहले-पहले प्रसन्न करने के लिए साधक बाहरी विचारों का आधार ले सकता है। जैसे, बुद्ध या अन्य अनुस्मृतियाँ, मेत्ता या अन्य ब्रह्मविहार भावना इत्यादि। लेकिन अंततः उसे केवल अपनी श्वास के साथ, बिना किसी बाहरी आलंबन के, चित्त को प्रसन्न करना सीखना होता है। इसमें भी वह अनेक छिपे हुए चित्त के बटन ढूँढता है, जिससे वह प्रसन्न होने लगे। यदि वह बिना विचार किए ऐसी सक्षमता हासिल करने लगे, तब उसकी आध्यात्मिक उन्नति में अनेक अनोखे बदलाव आते हैं।
(११)
‘समादहं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘समादहं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
चित्त को समाहित करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
अब तक इस चरण में लगभग तीन निमित्त—श्वास का आलंबन, संवेदना का आलंबन, और चित्त का निमित्त साथ-साथ चल रहे होते हैं। तब, साधक इन चरण में उन निमित्तों का उपयोग कर अपने चित्त को समाहित करना सीखता है।
समाहित होना समाधि में पूरी तरह से डूबने की प्रक्रिया है। इस चरण में साधक अपने चित्त की सूक्ष्म सक्रियता, या नन्ही-से-नन्ही चंचलता को भी शान्त और स्थिर करते हुए एकाग्रता में तल्लीन होना सीखता है।
(१२)
‘विमोचयं चित्तं अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘विमोचयं चित्तं पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
चित्त को विमुक्त करते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
जब चित्त समाहित हो, तब उसे मुक्त करना अपेक्षाकृत सरल होता है।
ध्यान की इस प्रगति में चित्त कैसे कदम-दर-कदम हल्के होते हुए मुक्त होता है, इसे समझना महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे साधक ध्यान के क्रम में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे पहले स्थूल और भारी मानसिक अवस्थाएँ छूटती जाती हैं, और फिर उनसे भी अधिक सूक्ष्म बोझ छोड़ दिए जाते हैं। हालाँकि यह मुक्ति एकदम से स्थायी नहीं होती, बल्कि उस अवस्था में अस्थायी रूप से घटती है। लेकिन हर चरण में चित्त पहले से कहीं अधिक हल्का और साफ़ होता जाता है।
इस अवस्था में साधक केवल ध्यान में डूबा ही नहीं रहता, बल्कि वह प्रज्ञा के साथ देखता भी है। वह किसी ध्यान अवस्था में स्थित रहते हुए ही उसके घटकों को पहचान सकता है, और आवश्यकता पड़ने पर बिना उस अवस्था से गिरे, उन्हीं घटकों से छूट भी सकता है। संक्षेप में, एक ओर चित्त ध्यान-अवस्थाओं के माध्यम से क्रमशः बोझ छोड़ना सीखता है, और दूसरी ओर प्रज्ञा के सहारे उन्हीं सूक्ष्म अवस्थाओं से भी अपनी आसक्ति छोड़ना सीखता है। यही समथ और विपस्सना का वास्तविक संयुक्त अभ्यास है।
इसलिए यह चरण पिछले चरण के साथ मिलकर आगे-पीछे कई बार घटित होकर चित्त को विमुक्त करना सीखता है। विमुक्त करने के लिए उसके अनेक आलंबनों को छोड़ना आवश्यक होता है। इसलिए पुनः तेरह से सोलह चरणों का उपयोग करते हुए साधक चित्त को विमुक्त करना सीखता है।
इस चरण में ध्यान के अंगों और सूक्ष्म बोझों से जो विमुक्ति (चेतो-विमुक्ति) होती है, वह आरंभ में लौकिक और अस्थायी होती है। लेकिन यही निरंतर अभ्यास समय पकने पर लोकुत्तर और स्थायी मुक्ति का द्वार खोलता है।
(१३)
‘अनिच्चानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘अनिच्चानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
अनित्यता को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
ये चारों ही चरण विपस्सना की श्रेणी में आते हैं। साधक धम्मानुपस्सना के इन चारों ही चरणों का किसी भी समय, किसी भी चरण के पश्चात उपयोग कर सकता है।
धम्मानुपस्सना के इस शुरुआती कदम में साधक अनित्य संज्ञा को धारण करता है, और पहले अपने पाँच आसक्ति-स्कंधों को अनित्य दृष्टिकोण से देखता है।
अनित्य के नज़रिए से देखने पर चित्त की गहराई में बसी वह आसक्ति ढीली पड़ने लगती है।
(१४)
‘विरागानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘विरागानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
विराग को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
पालि भाषा और बौद्ध मनोविज्ञान में ‘राग’ का अर्थ केवल आसक्ति नहीं, बल्कि ‘रंग’ भी होता है। इसलिए जब चित्त रागपूर्ण होता है, तब वह विषय-वासनाओं के किसी न किसी रंग में रँग जाता है। लेकिन ‘विराग’ देखते हुए साधक अपनी प्रज्ञा से उस आकर्षण के रंग को पूरी तरह धो डालता है।
वह किसी भी उठने वाली विशिष्ट आसक्ति को इस पैनी दृष्टि से देखता है कि उसका सारा आकर्षण फीका पड़ जाए और वह पूरी तरह बेरंग हो जाए।
स्वाभाविक है कि आकर्षण-रहित (बेरंग) आसक्ति चित्त में अधिक देर तक टिक नहीं सकती। वह स्वतः ही अपनी पकड़ छोड़ देती है और अगले चरणों में विलीन हो जाती है।
(१५)
‘निरोधानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘निरोधानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति;
निरोध को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
“जो धर्म कारण से उत्पन्न होते हैं, उनका निरोध भी होता ही है।” इस आर्य दृष्टिकोण के साथ, साधक इस चरण में प्रवेश करता है। वह अपनी आसक्तियों या किसी भी आलंबन को उसके निरोध होने वाले स्वभाव की नज़र से देखता है।
इस वजह से भले ही आसक्तियों की यदि कोई अब भी छिपी हुई पकड़ हो, वह भी दृश्यमान होने लगती है। निरंतर इस नज़रिए से देखने पर कोई भी आसक्ति टिक नहीं पाती है।
(१६)
‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी अस्ससिस्सामी’ति सिक्खति,
‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी पस्ससिस्सामी’ति सिक्खति।
परित्याग को देखते हुए श्वास छोड़ना सीखता है।
इस अंतिम चरण में साधक अपनी आसक्तियों को बड़ी सक्रियता से देखता है कि इस चित्त के आलंबन का परित्याग करना है। जब इस नज़र से निरंतर देखा जाए, तो छोटी-बड़ी कोई भी आसक्ति अंततः त्याग ही दी जाती है।
इस तरह, आनापान-स्मृति सोलह चरणों में, अपने पूर्ण विस्तार के साथ ‘परिपूर्णता’ को प्राप्त होती है।
मूल आनापान का आमंत्रण
बुद्ध की यह सोलह चरणों वाली मूल आनापान साधना केवल एकाग्रता का कोई साधारण व्यायाम नहीं है; यह जीवन को गहराई से देखने और उसके परे जाने की यात्रा है। यह यात्रा स्थूल शरीर की एक साधारण-सी श्वास से शुरू होती है, चित्त की सूक्ष्मतम गहराइयों को पार करती है, और अंततः हमें सब कुछ त्यागकर निर्वाण के उस परममुक्ति में विश्राम करना सिखाती है।
यह मार्ग लंबा और सूक्ष्म लग सकता है, और हो सकता है कि शुरुआत में चित्त अपने पुराने स्वभाव के कारण भटके भी। लेकिन निराश न हों। याद रखें कि हर एक सचेत श्वास, और हर एक सजग पल जो आप इस साधना में बिताते हैं, वह आपके भीतर जन्म-जन्मांतर के अज्ञान को काटकर प्रज्ञा का एक नया दीप जलाता है। बुद्ध का यह प्राचीन राजमार्ग आज आपके लिए पूरी तरह खुला है। इस पर चलने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं है, बस एक सच्चे संकल्प और निरंतर अभ्यास की दरकार है।
आपकी साधना महालाभकारी हो, महाफलदायी हो, सफल और सार्थक हो।
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भगवान की मूल श्वास-साधना पढ़ें:
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