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— दुक्खा पटिपदा —
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दुक्खा पटिपदा

अनात्म संज्ञा

— मेरा नहीं, मेरा आत्म नहीं, मैं यह नहीं —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| १० मिनट
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प्रभुत्व का भ्रम

अशुभ, धातु और अनित्य संज्ञाओं के ज़रिए हमने इस ‘किराए के घर’ की एक-एक ईंट को खोलकर देख लिया। लेकिन फिर भी, हमारे चित्त की गहरी परतों में एक अत्यंत सूक्ष्म अहंभाव (अस्मिमान) छिपा रहता है जो कहता है—“भले ही यह शरीर और मन अनित्य हैं, लेकिन इनका ‘मालिक’ या ‘अनुभवकर्ता’ तो मैं हूँ!”

‘अनात्म संज्ञा’ भगवान बुद्ध की देशना का वह अंतिम प्रहार है, जो इस ‘मालिक’ होने के भ्रम को तोड़ता है। ऐतिहासिक तौर पर कहा जाता हैं कि यह वह विशेष संज्ञा है जिसे पूरे मानव इतिहास में केवल भगवान बुद्ध ही उजागर करते हैं।

स्वामित्व या विवश गुलामी?

भगवान (सच्चक सुत्त में) इसे राजा के प्रभुत्व की उपमा से समझाते हैं: जैसे किसी राज्य पर राजा का अधिकार चलता है, उसके आदेश से कानून लागू होता है। क्या उसी तरह हम अपने रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान पर अपना कानून चला सकते हैं?

भगवान तीखे और अकाट्य प्रश्न करते हैं। हम दिन-रात कहते हैं “मेरी काया”, “मेरा मन”, “मेरी भावनाएँ”। लेकिन यदि वास्तव में यह शरीर ‘आपका’ (अत्ता/आत्म) है, तो क्या आप इसे आदेश दे सकते हैं कि—“तू कभी बूढ़ा मत होना! तू कभी बीमार मत पड़ना!”? यदि यह मन ‘आपका’ है, तो क्या आप इसे आदेश दे सकते हैं कि—“आज से मुझे केवल सुख ही महसूस हो, कभी दुःख या क्रोध न आए!”?

बिल्कुल नहीं! हमारी अपनी ही काया और हमारा अपना ही चित्त हमारे आदेशों को नकार देते हैं। हम एक ऐसी गाड़ी में बैठे हैं जिसकी स्टीयरिंग हमारे हाथ में है ही नहीं, फिर भी हम ‘ड्राइवर’ होने का अहंकारी भ्रम पाले हुए हैं। जो चीज़ हमारे नियंत्रण में ही नहीं है, जो अपनी ही प्राकृतिक शर्तों पर बीमार, दुखी और नष्ट होती है, उसे “यह मैं हूँ” या “यह मेरा है” मानना ही सबसे बड़ी अविद्या है।

अभ्यास कैसे करें?

दैनिक जीवन में इस साधना का अभ्यास हर अनुभव से ‘मैं’ और ‘मेरा’ को अलग खींच लेने की कला है:

  • काया का विखंडन: जब बाल सफ़ेद होने लगें, त्वचा पर झुर्रियाँ दिखने लगें, या शरीर में कोई तेज़ पीड़ा उठे, तो हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया क्या होती है?

    कुछ पलायनवादी लोग सच्चाई से भागने के लिए तुरंत बालों में डाई लगा लेते हैं, एंटी-एजिंग क्रीम पोतने लगते हैं, या दर्द को झटपट दबाने के लिए पैरासिटामोल या कोई पेन-किलर खा लेते हैं।

    वहीं कुछ लोग, जो भले ही इन चीज़ों से पलायन न करें, लेकिन जिनके भीतर ‘प्रभुत्व की धारणा’ (मैं शरीर का मालिक हूँ) गहरी होती है, वे शरीर की इस नाफ़रमानी पर हैरान होकर विलाप करने लगते हैं— “हाय! मैं बूढ़ा हो रहा हूँ!”

    इन दोनों ही अकुशल प्रतिक्रियाओं से बचकर, उस क्षण अनात्म संज्ञा से देखें— “यह रूप (काया) मेरे आदेश से नहीं चल रहा है। यह बस अपना प्राकृतिक धर्म निभा रहा है। जो मेरे वश में ही नहीं है, वह ‘मैं या मेरा’ कैसे हो सकता है?”

  • भावनाओं और विचारों का विखंडन: जब मन में निराशा, उदासी, डर या क्रोध का कोई उफान आए, तो प्रथम उसे विपरीत कुशल संज्ञा से देखने का प्रयास करें। इस संघर्ष में ही आपको स्वयं ही अनात्म संज्ञा प्रकट होने लगेगी, जिसमें आपको पता चलेगा कि आपका मन (भावना, वेदना), आपका नजरिया (संज्ञा) आपके आदेशानुसार नहीं चलता। तब आप उसे केवल एक ‘वेदना’ या ‘संस्कार’ के रूप में देखें, जो आपके बिना बुलाए उठी है और बिना आपकी अनुमति के ही चली जाएगी।

सफलता का पैमाना

इस साधना का उद्देश्य यह सोचकर हताश होना नहीं है कि “मेरा कोई वजूद ही नहीं है,” और न ही शून्यवाद के अवसाद में गिरना है। भगवान के अनुसार, सफलता तब मानी जाती है जब इस ‘अनात्म’ सत्य को देखने से ‘अस्मिमान’ (मैं हूँ का भाव) का भारी और थका देने वाला बोझा हमेशा के लिए गिर जाए।

ज़रा सोचिए, जब भीतर कोई ‘मैं’ ही नहीं बचेगा, तो दुनिया के अपमान का तीर किसे लगेगा? जब ‘मेरा’ ही कुछ नहीं, तो भविष्य में कुछ छिन जाने का डर किसे सताएगा? इसी परम मोहभंग (निब्बिदा) और वैराग्य से वह अंतिम ‘विमुक्ति’ प्रकट होती है, जहाँ साधक संसार के सभी बंधनों को तोड़कर एक असीम आज़ादी में कह उठता है—“जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!”

रूपा अनत्ता!

रूप आत्म (=स्व) नहीं होता हैं!

यदि रूप आत्म होता, तो वह हमें पीड़ा (=रोग, जीर्णता, विघटन) में नहीं डालता। और, हम उसे कह पाते कि—‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो (=अर्थात, हम अपने रूप का रूपांतरण कर पाते।)’

किन्तु, रूप वाक़ई आत्म नहीं होता है, इसलिए वह हमें पीड़ा में डालता है। और, हम उसे नहीं कह पाते कि—‘मेरा रूप ऐसा हो, वैसा न हो।’

क्या मानते हो, रूप नित्य होता है, या अनित्य?

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं होता, वह कष्टपूर्ण होता है, या सुखपूर्ण?”

“कष्टपूर्ण, भन्ते।”

“जो नित्य न हो, बल्कि कष्टपूर्ण हो, बदलते स्वभाव का हो, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि—‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

इसलिए, जो रूप—भूत, भविष्य, या वर्तमान के हो, आंतरिक हो या बाहरी, स्थूल हो या सूक्ष्म, हीन हो या उत्तम, दूर हो या समीप—सभी रूप ‘मेरे नहीं, मेरा आत्म नहीं, मैं यह नहीं!’—इस तरह, वे जैसे बने हो, वैसे सही पता करके देखना चाहिए।"

इस तरह देखने से धर्म सुने आर्यश्रावक का रूपों के प्रति मोहभंग होता है। मोहभंग होने से वैराग्य आता है। वैराग्य आने से वह विमुक्त होता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है—‘विमुक्त हुआ!’ और, तब उसे पता चलता है —‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’"

वेदना अनत्ता!

वेदना (अनुभूतियाँ) आत्म नहीं होती हैं!

यदि वेदना आत्म होती, तो वह हमें पीड़ा में नहीं डालती! और हम उसे कह पाते कि—‘मेरी वेदना ऐसी हो, वैसी न हो।’

किन्तु, वेदना वाक़ई आत्म नहीं होती, इसलिए हमें पीड़ा में डालती है। और, हम नहीं कह पाते कि—‘मेरी वेदना ऐसी हो, वैसी न हो।’

क्या मानते हो, वेदना नित्य होती है, या अनित्य?"

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं होती, वह कष्टपूर्ण होती है, या सुखपूर्ण?”

“कष्टपूर्ण, भन्ते।”

“जो नित्य न हो, बल्कि कष्टपूर्ण हो, बदलते स्वभाव की हो, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि—‘यह मेरी है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

“इसलिए, जो वेदना —भूत, भविष्य, या वर्तमान की हो, आंतरिक हो या बाहरी, स्थूल हो या सूक्ष्म, हीन हो या उत्तम, दूर हो या समीप—सभी वेदना ‘मेरी नहीं, मेरी आत्म नहीं, मैं यह नहीं’—इस तरह, वे जैसे बनी हो, वैसे सही पता करके देखना चाहिए।

इस तरह देखने से धर्म सुने आर्यश्रावक का वेदनाओं के प्रति मोहभंग होता है। मोहभंग होने से वैराग्य आता है। वैराग्य आने से वह विमुक्त होता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है—‘विमुक्त हुआ!’ और, तब उसे पता चलता है —‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’”

सञ्ञा अनत्ता!

संज्ञा (नजरिया, या दृष्टिकोण) आत्म नहीं होती हैं।

यदि संज्ञा आत्म होती, तो वे हमें पीड़ा में नहीं डालते। और, हम उसे कह पाते कि—‘मेरे संज्ञा ऐसे हो, वैसे न हो।’

किन्तु, संज्ञा वाक़ई आत्म नहीं होती, इसलिए हमें पीड़ा में डालते हैं। और हम नहीं कह पाते कि—‘मेरी संज्ञा ऐसे हो, वैसे न हो।’

क्या मानते हो, संज्ञा नित्य होता है, या अनित्य?"

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं होता, वह कष्टपूर्ण होता है, या सुखपूर्ण?”

“कष्टपूर्ण, भन्ते।”

“जो नित्य न हो, बल्कि कष्टपूर्ण हो, बदलते स्वभाव का हो, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि—‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ?’”

“नहीं, भन्ते।”

इसलिए, जो संज्ञा—भूत, भविष्य, या वर्तमान के हो, आंतरिक हो या बाहरी, स्थूल हो या सूक्ष्म, हीन हो या उत्तम, दूर हो या समीप—सभी संज्ञा ‘मेरे नहीं, मेरा आत्म नहीं, मैं यह नहीं!’—इस तरह, वे जैसे बने हो, सही पता करके देखना चाहिए।

इस तरह देखने से धर्म सुने आर्यश्रावक का नजरियों के प्रति मोहभंग होता है। मोहभंग होने से वैराग्य आता है। वैराग्य आने से वह विमुक्त होता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है—‘विमुक्त हुआ!’ और, तब उसे पता चलता है—‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’"

सङ्खारा अनत्ता!

संस्कार आत्म नहीं होता हैं।

यदि संस्कार आत्म होता, तो वे हमें पीड़ा में नहीं डालते। और, हम उसे कह पाते कि—‘मेरे संस्कार ऐसे हो, वैसे न हो।’

किन्तु, संस्कार वाक़ई आत्म नहीं होता, इसलिए हमें पीड़ा में डालते है। और हम नहीं कह पाते कि—‘मेरी संस्कार ऐसी हो, वैसी न हो।’

क्या मानते हो, संस्कार नित्य होता है, या अनित्य?"

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं होता, वह कष्टपूर्ण होता है, या सुखपूर्ण?”

“कष्टपूर्ण, भन्ते।”

“जो नित्य न हो, बल्कि कष्टपूर्ण हो, बदलते स्वभाव की हो, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि—‘यह मेरी है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ?’”

“नहीं, भन्ते।”

इसलिए, जो संस्कार —भूत, भविष्य, या वर्तमान की हो, आंतरिक हो या बाहरी, स्थूल हो या सूक्ष्म, हीन हो या उत्तम, दूर हो या समीप—सभी संस्कार ‘मेरी नहीं, मेरी आत्म नहीं, मैं यह नहीं!’—इस तरह, वे जैसे बने हो, सही पता करके देखना चाहिए।

इस तरह देखने से धर्म सुने आर्यश्रावक का संस्कार के प्रति मोहभंग होता है। मोहभंग होने से वैराग्य आता है। वैराग्य आने से वह विमुक्त होता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है—‘विमुक्त हुआ!’ और, तब उसे पता चलता है —‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’"

विञ्ञाणं अनत्तं!

विज्ञान आत्म नहीं होता है!

यदि विज्ञान आत्म होता, तो हमें पीड़ा में नहीं डालता। और हम उसे कह पाते कि—‘मेरा विज्ञान ऐसा हो, वैसा न हो।’

किन्तु, विज्ञान वाक़ई आत्म नहीं होता है, इसलिए हमें पीड़ा में डालता है। और, हम नहीं कह पाते कि—‘मेरा विज्ञान ऐसा हो, वैसा न हो।’

क्या मानते हो, विज्ञान नित्य होता है, या अनित्य?"

“अनित्य, भन्ते।”

“जो नित्य नहीं होता, वह कष्टपूर्ण होता है, या सुखपूर्ण?

“कष्टपूर्ण, भन्ते।”

जो नित्य न हो, बल्कि कष्टपूर्ण हो, बदलते स्वभाव की हो, क्या उसे इस तरह देखना योग्य है कि—‘यह मेरा है, यह मेरा आत्म है, यही तो मैं हूँ’?”

“नहीं, भन्ते।”

इसलिए, जो विज्ञान —भूत, भविष्य, या वर्तमान का हो, आंतरिक हो या बाहरी, स्थूल हो या सूक्ष्म, हीन हो या उत्तम, दूर हो या समीप—सभी विज्ञान ‘मेरा नहीं, मेरा आत्म नहीं, मैं यह नहीं’—इस तरह, वह जैसे बना हो, वैसे सही पता करके देखना चाहिए।

इस तरह देखने से धर्म सुने आर्यश्रावक का विज्ञान के प्रति मोहभंग होता है। मोहभंग होने से वैराग्य आता है। वैराग्य आने से वह विमुक्त होता है। विमुक्ति के साथ ज्ञान उत्पन्न होता है—‘विमुक्त हुआ!’ और, तब उसे पता चलता है —‘जन्म समाप्त हुए! ब्रह्मचर्य परिपूर्ण हुआ! काम पुरा हुआ! अभी यहाँ करने के लिए कुछ बचा नहीं!’”

— संयुत्तनिकाय २२:५९

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सच्चक सुत्त
प्रथम साधना