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— अकुशल का त्याग —
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द्वितीय नीवरण

दुर्भावना

— आत्मरक्षा का एक घातक भ्रम —

लेखक: भिक्खु कश्यप
| १४ मिनट
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दुर्भावना, दरअसल, आत्मरक्षा की एक आदिम प्रतिक्रिया है।

जब कोई हमें शब्दों या कर्मों से आहत करता है, तो भीतर रक्षातंत्र तुरंत सक्रिय होकर संघर्ष की मुद्रा में आ जाता है। मन हृदय को पहुँचे दुःख का आंकलन करता है और भविष्य में ऐसी पीड़ा की पुनरावृत्ति से बचने के उपाय खोजने लगता है। स्वाभाविक रूप से अपनी रक्षा करना कोई बुरा कर्म नहीं है। हर व्यक्ति को आत्म-सुरक्षा का अधिकार है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम मामूली से मामूली बात को भी अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान बैठते हैं।

उदाहरण के लिए, कोई कुछ कह दे और हमारी छवि को थोड़ी-सी खरोंच लग जाए, तो मन तुरंत प्रतिक्रिया देता है—‘उसने मेरे साथ अन्याय किया।’ हमारा अहंकार इस पीड़ा को आत्मसम्मान से जोड़ देता है—‘मैं चुप कैसे रह सकता हूँ?’ फिर हमारी बुद्धि उसमें ईंधन भर देती है—‘मुझे इसे सबक सिखाना चाहिए, ताकि यह दोबारा मुझे आहत न कर सके।’

जैसे कामुकता भीतर की रिक्तता भरने का एक सस्ता उपाय है, वैसे ही क्रोध स्वयं को ‘शक्तिशाली’ और ‘सही’ महसूस करने का एक झूठा और सस्ता उपाय है। तुच्छ-सी बात भी हमारे लिए अस्तित्वगत संकट का रूप ले लेती है और उस काल्पनिक खतरे की आड़ में आक्रामकता जन्म लेती है। यदि इस क्षणिक प्रतिक्रिया को समय रहते न रोका जाए, तो यह एक छोटी-सी चिंगारी भीतर धधकती आग बन जाती है। यहीं से द्वेष, दुर्भावना और नफरत की शुरुआत होती है।

हम तुरंत ही उस व्यक्ति को अपने मानसिक दृश्यपटल के मंच पर खड़ा कर देते हैं। हम बार-बार वही घटना, वही शब्द, वही दृश्य मन में दोहराते रहते हैं। हम भूल जाते हैं कि दुर्भावना, चाहे कितनी भी ‘उचित’ या ‘न्यायसंगत’ क्यों न प्रतीत हो, अंततः एक विष ही है—जो सबसे पहले उसी को जलाकर राख करता है, जिसके भीतर वह पनपता है।

यदि प्रज्ञा की दृष्टि से देखा जाए, तो क्रोध एक ‘हत्यारी’ ऊर्जा है। यह ऐसी ऊर्जा है, जो जिस पर भी फूटे, उसी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। यदि वह ऊर्जा बाहर प्रकट होती है, तो सामने वाले को नुकसान पहुँचाती है, और यदि भीतर दबा दी जाती है (कुंठा), तो वह क्रोधित व्यक्ति को भीतर से गला डालती है। ऐसे लोग जो बार-बार क्रोध को भीतर पीते और दबाते हैं, वे अक्सर गंभीर शारीरिक और मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।

इसलिए, इस ‘जानलेवा’ ऊर्जा को न तो भीतर दबाना चाहिए और न ही बाहर किसी पर उड़ेल देना चाहिए। बल्कि, इसे बड़ी सूझबूझ, धैर्य और अंतर्ज्ञान के साथ समझकर धीरे-धीरे विलीन कर देना चाहिए। यही सच्चा समाधान है।

आइए, इस बंधन को तोड़ने के उपाय स्वयं भगवान के मुख से सुनें।

‘उसने मेरा अपमान किया!
मुझे मारा! हराया! लूट लिया!’

—जो इसी में उलझे होते हैं,
उनका बैर शान्त नहीं होता।

—जो इसमें नहीं उलझते,
उनका बैर शान्त हो जाता है।

बैर से बैर शान्त नहीं होता।
निर्बैर से बैर शान्त होता है

यही सनातन धर्म है।

—धम्मपद ३ + ४ + ५

जीत बैर को जन्म देती है।
और हार दुःख में डुबाती है।

हज़ारों-हज़ारों लोगों से लड़कर
उन्हें हराने से बेहतर है
केवल एक पर जीत हासिल करना
स्वयं पर!

दूसरों के बजाय
स्वयं को जीतना बेहतर है।
जब आप स्वयं को
—अभ्यस्त करा चुके हो,
अथक संयम से रहते हो—
तब न देव, न गंधर्व,
न ब्रह्म, न ही मार
उस जीत को
हार में बदल सकता है।

—धम्मपद २०१ + १०३ + १०४+ १०५

दुर्भावना का मनोविज्ञान

जिस तरह वासना कोई रहस्यमयी ताक़त नहीं है, उसी तरह क्रोध भी कोई शैतानी शक्ति नहीं है जो अचानक आप पर कब्ज़ा कर लेती है। यह भी एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। बिना ईंधन के जैसे आग नहीं जल सकती, वैसे ही बिना खुराक के दुर्भावना ज़िंदा नहीं रह सकती।

आहार (ईंधन और खुराक)

दुर्भावना का मुख्य आहार क्या है? भगवान इसे ‘पटिघ निमित्त’ (प्रतिरोधी विषय) कहते हैं। इसका अर्थ है—सामने वाले की वह बात, वह कर्म या वह व्यवहार जो आपको चुभता है, जो आपको अवांछित लगता है। जब हमारा ध्यान पूरी तरह उस ‘चुभने वाले’ हिस्से पर टिक जाता है, तो क्रोध को अपना भोजन मिल जाता है।

अयोनिसो मनसिकार (अनुचित चिंतन)

क्रोध को भड़काने वाले इस हाथ का नाम है—‘अनुचित चिंतन’। जब कोई हमारे साथ बुरा करता है, तो हम बार-बार उस घटना का ‘रिप्ले’ अपने दिमाग में चलाते हैं। हम उस व्यक्ति की गलतियों को आवर्धक लेंस से देखते हैं। यह बार-बार का चिंतन उस छोटी सी चिंगारी पर पेट्रोल छिड़कने का काम करता है। जो दुर्भावना अभी पैदा नहीं हुई थी, वह पैदा हो जाती है; और जो पैदा हो चुकी थी, वह भयंकर नफ़रत में बदल जाती है।

योनिसो मनसिकार (उचित चिंतन)

यह दुर्भावना की आग की प्राणवायु काटने की कला है। ‘उचित चिंतन’ का अर्थ है, चीज़ों को एक अलग, शांत और निष्पक्ष नज़रिए से देखना। जब आप चोट खाने के बाद भी, उस व्यक्ति के कर्मों को अलग-अलग करके देख पाते हैं—उसकी मजबूरियों, उसकी मूर्खता या उसके भीतर की पीड़ा को समझ पाते हैं, तो क्रोध ठिठक जाता है।

अनाहार (भूखा मारना)

क्रोध के इस दानव को मारने का सबसे अचूक अस्त्र है—‘मेत्ता’ (सद्भावना)। जब हम ‘उचित चिंतन’ के द्वारा सामने वाले की कमियों के बजाय उसकी किसी अच्छाई को देखते हैं, या उस पर करुणा करते हैं, तो दुर्भावना को अपनी खुराक (चोट और अहंकार) मिलनी बंद हो जाती है। बिना खुराक के यह तड़पती है और अंततः शांत हो जाती है।

दुर्भावना का आहार और अनाहार

अनुत्पन्न दुर्भावना को उत्पन्न करने, और उत्पन्न हुई दुर्भावना को बढ़ाकर अत्याधिक करने का आहार क्या है?

प्रतिरोधी विषय (“पटिघ निमित्त”) होता है—उस पर अनुचित चिंतन (“अयोनिसो मनसिकार” =अनुचित तरह से ध्यान देना) करना आहार बनता है अनुत्पन्न दुर्भावना उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई दुर्भावना बढ़कर अत्याधिक होने का।

किन्तु, मेत्ता चेतो-विमुक्ति होती है—उस पर उचित चिंतन (“योनिसो मनसिकार”) करना अनाहार (भूखा रखना) है अनुत्पन्न दुर्भावना उत्पन्न होने और उत्पन्न हुई दुर्भावना बढ़कर अत्याधिक होने को।

—संयुत्तनिकाय ४६:५१ : आहार सुत्त

खन्ति और मेत्ता

जब हम दुर्भावना की इस आत्मघाती प्रकृति को समझ लेते हैं, तो उपाय स्पष्ट हो जाता है। दुर्भावना का वास्तविक इलाज है—मेत्ता (सद्भावना), करुणा और उपेक्षा (तटस्थता) की साधना।

यह कोई बनावटी विनम्रता या कमज़ोरी का प्रदर्शन नहीं है। आरंभिक अवस्था में साधक को ‘क्षांति’ की साधना करनी होती है—एक अद्वितीय संगम जिसमें धैर्य, क्षमाशीलता और सहिष्णुता एक साथ बहते हैं।

क्षांति, वस्तुतः, बाहर नहीं—भीतर घटित होती है। बाहर कोई कुछ भी कहे या करे—लेकिन भीतर एक खुलापन, स्थिरता और क्षमाशीलता का प्रवाह बना रहे। क्षमा का अर्थ यह कतई नहीं है कि हम अन्याय को चुपचाप सह लें। इसका वास्तविक अर्थ है—पहले हम भीतर की इस जानलेवा प्रतिक्रिया से मुक्त हो जाएँ, और फिर शांत, स्थिर चित्त से तय करें कि इस स्थिति को कब और कैसे उचित रूप से सुलझाना है।

यदि उस क्षण स्वयं को नियंत्रण में रखना कठिन लगे, तो सबसे पहले उस व्यक्ति पर से ध्यान हटा लेना चाहिए। जब भीतर का तूफान थोड़ा थम जाए, तब उस व्यक्ति के कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करें। यदि हम अपने हृदय को विस्तृत कर सकें—इतना विराट कि उसमें किसी घटिया से घटिया व्यक्ति की भी सूक्ष्म अच्छाई दिख पड़े—तो दुर्भावना खुद-ब-खुद दम तोड़ देगी।

आइए, सारिपुत्त भंते के मुख से नफ़रत को मिटाने के ये बेजोड़ और व्यावहारिक तरीके सुनें:

मित्रों, नफ़रत मिटाने के पाँच तरीक़े हैं, जिनका उपयोग कर भिक्षु उत्पन्न हुई नफ़रत को पूर्णतः मिटा देता है। कौन-से पाँच?

जब भिक्षु को किसी व्यक्ति के प्रति नफ़रत जन्म ले, तब वह भिक्षु—

  1. उसके प्रति मेत्ता की साधना करता है…
  2. उसके प्रति करुणा की साधना करता है…
  3. उसके प्रति उपेक्षा की साधना करता है…
  4. उसे भुला देता (“असति”) है, उस पर ध्यान नहीं देता (“अमनसिकार”)…
  5. उसके कर्म फल पर चिंतन करता है—‘यह आयुष्मान अपने कर्म का स्वयं स्वामी, कर्म का वारिस, कर्म से जन्मा, कर्म का बंधु है, कर्म के ही शरण है।
    वह जो भी कर्म करेगा—कल्याणकारी या पापपूर्ण—उसी का वारिस भी बनेगा।’ —ये नफ़रत मिटाने के पाँच तरीक़े हैं। इनका उपयोग कर भिक्षु उत्पन्न हुई नफ़रत को पूर्णतः मिटा देता है।

—अंगुत्तरनिकाय ५:१६१

दुर्भावना को कैसे त्यागें?

  1. काया से बुरा, वाणी से अच्छा

    कुछ लोग ‘शारीरिक आचरण’ में अशुद्ध होते है, किंतु ‘वाणी के आचरण’ में शुद्ध होते हैं। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी नफ़रत मिटा देनी चाहिए। कैसे?

    जैसे कोई पंसुकूलिक भिक्षु—जो त्यक्त, फेंकी हुई वस्तुओं से ही अपना निर्वाह करता है—मार्ग में पड़ा कोई पुराना चिथड़ा देखता है। वह अपने दाएँ पैर से उस वस्त्र के एक कोने को दबाता है, और फिर बाएँ पैर से उसे फैलाता है। और तब, उसके उपयोगी हिस्से को फाड़कर अलग कर लेता है, और उसे उठाकर चल पड़ता है।

    उसी तरह, व्यक्ति के अशुद्ध कायिक-आचरण पर ध्यान न दें। बल्कि, उसके केवल शुद्ध वाचिक-आचरण पर ही ध्यान दें। इस तरह, उसके प्रति नफ़रत मिटा देनी चाहिए।

  2. वाणी से बुरा, काया से अच्छा

    कुछ लोग ‘वाणी के आचरण’ में अशुद्ध होते है, किंतु ‘शारीरिक आचरण’ में शुद्ध होते हैं। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी नफ़रत मिटा देनी चाहिए। कैसे?

    जैसे कोई जलाशय हो, जो शैवालों और जल-पौधों से आच्छादित हो। तब वहाँ एक व्यक्ति आता है—जो गर्मी से बदहाल है, पसीने से लथपथ, थकान से काँपता हुआ, और प्यासा। वह उस जलाशय में उतरता है। फिर, अपने हाथों से शैवालों और पौधों को एक ओर हटाता है, और (दोनों हाथों की अंजलि बनाकर) चुल्लू से उस जल को पीता है। और, फिर शांत होकर अपने रास्ते पर चल पड़ता है।

    उसी तरह, व्यक्ति के अशुद्ध वाचिक-आचरण पर ध्यान न दें। बल्कि, उसके केवल शुद्ध शारीरिक-आचरण पर ही ध्यान दें। इस तरह, उसके प्रति नफ़रत मिटा देनी चाहिए।

  3. काया और वाणी दोनों से बुरा, कभी-कभी शांत होने वाला

    कुछ लोग ‘शारीरिक और वाचिक’ दोनों ही आचरण में अशुद्ध होते हैं, किंतु वे समय-समय पर ‘चित्त में स्पष्टता और प्रशान्ति’ महसूस करते हैं। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी नफ़रत मिटा देनी चाहिए। कैसे?

    जैसे किसी पथ पर जल से भरा एक गड्ढा हो—गाय के ख़ुर से बना हुआ। तब वहाँ एक व्यक्ति आता है—जो गर्मी से बदहाल है, पसीने से लथपथ, थकान से काँपता हुआ, और प्यासा। वह सोचता है, ‘यह गाय के ख़ुर से बना हुआ, जल से भरा एक गड्ढा है। यदि मैं इसे हाथों से उठाने का प्रयास करूँ, तो यह गड़बड़ा जाएगा, मटमैला हो जाएगा, और पीने के योग्य नहीं बचेगा। क्यों न मैं नीचे झुककर, गाय की भाँति धीरे-धीरे इसे सुड़ककर पी लूँ? (बिना जल को विचलित किए)’

    तब वह झुकता है, सावधानी से, गाय की भाँति जल को सुड़कता है। और, फिर शांत होकर अपने रास्ते पर चल पड़ता है।

    उसी तरह, व्यक्ति के अशुद्ध शारीरिक और वाचिक आचरण पर ध्यान न दें। बल्कि, उसे समय-समय पर मिलने वाली चित्त स्पष्टता और प्रशान्ति महसूस करने पर ही ध्यान दें। इस तरह, उसके प्रति नफ़रत मिटा देनी चाहिए।

  4. काया, वाणी और मन—तीनों से ही दुष्ट

    कुछ लोग ‘शारीरिक और वाचिक’ दोनों ही आचरण में अशुद्ध होते हैं, और वे समय-समय पर ‘चित्त में स्पष्टता और प्रशान्ति’ भी महसूस नहीं करते हैं। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी नफ़रत मिटा देनी चाहिए। कैसे?

    जैसे कोई व्यक्ति बीमार हो—पीड़ा में, किसी गंभीर रोग से ग्रस्त, और यात्रा में हो—(वह किसी बस्ती से बहुत दूर हो)—न पिछले गाँव निकट हो, न अगला गाँव समीप। (वह अकेला हो ) न उसे उचित आहार मिले, न औषधि। न कोई सेवा करने वाला हो, न कोई ऐसा जो उसे किसी बस्ती तक पहुँचा सके।

    तभी कोई दूसरा यात्री वहाँ से गुज़रे। वह उस बीमार को देखकर रुक जाए। उसके भीतर करुणा जगे, दया उपजे, सहानुभूति फूट पड़े। वह सोचने लगे—“काश! इसे उचित आहार मिल जाए। काश! कोई इसे औषधि दे सके। कोई इसकी देखभाल कर सके। और कोई इसे किसी गाँव तक पहुँचा सके…। ऐसा क्यों? ताकि इसका इसी जगह, इस तरह विनाश न हो जाए।”

    उसी तरह ऐसे व्यक्ति के लिए दया, करुणा और सहानुभूति से जो कर सकें, करें, (सोचते हुए,) ‘काश! यह व्यक्ति शारीरिक-दुराचार त्याग कर शारीरिक सदाचार का अभ्यास करें! काश! यह वाचिक-दुराचार त्याग कर वाचिक-सदाचार का अभ्यास करें! काश! यह मानसिक-दुराचार त्याग कर मानसिक-सदाचार का अभ्यास करें! ऐसा क्यों? ताकि वह काया छूटने पर मरणोपरांत पतन होकर यातनालोक नर्क में न उपजे!’ इस तरह, उसके प्रति नफ़रत मिटा देनी चाहिए।

  5. काया, वाणी और मन—तीनों से शुद्ध!

    कुछ लोग ‘शारीरिक और वाचिक’ दोनों ही आचरण में शुद्ध होते हैं, और वे समय-समय पर ‘चित्त में स्पष्टता और प्रशान्ति’ भी महसूस करते हैं। ऐसे व्यक्ति के प्रति भी नफ़रत मिटा देनी चाहिए। कैसे?

    जैसे कोई जलाशय हो—निर्मल, शीतल, पारदर्शक। उसका जल मधुर हो, तट धीरे-धीरे ढलान वाला, और चारों ओर से अनेक वृक्षों की छाया से आच्छादित हो। तब वहाँ एक व्यक्ति आता है—जो गर्मी से बदहाल है, पसीने से लथपथ, थकान से काँपता हुआ, और प्यासा।

    वह उस शांत, स्वच्छ जलाशय में उतरता है। स्नान करता है, और चुल्लू भर-भरकर जल पीता है। फिर बाहर निकलकर उन्हीं वृक्षों की शीतल छाया में बैठ जाता है—या लेटकर विश्राम करता है।

    उसी तरह, व्यक्ति के शुद्ध शारीरिक और वाचिक आचरण पर ध्यान दें। और उसे समय-समय पर मिलने वाली चित्त स्पष्टता और प्रशान्ति महसूस करने पर भी ध्यान दें। ऐसा प्रेरणादायक व्यक्ति आप का चित्त शांत कर सकता है। इस तरह, उसके प्रति नफ़रत मिटा देनी चाहिए।

—अंगुत्तरनिकाय ५:१६२ (संक्षिप्त)

एक प्राथमिक अभ्यास

जब हम दुर्भावना का त्याग करते हैं, तो वह सामने वाले पर किया गया कोई उपकार नहीं है; वस्तुतः वह स्वयं पर किया गया सबसे बड़ा उपकार है। याद रखें कि क्रोध की भट्टी में झुलसते हम स्वयं हैं, और व्याकुलता के पसीने से हम ही तरबतर होते हैं। इसलिए, दूसरों की अच्छाई खोजना, हमारी अपनी प्यास बुझाने और स्वयं के हृदय को सुरक्षित रखने की नितांत आवश्यकता है।

जब अगली बार किसी की बात चुभे और भीतर क्रोध भड़के, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय ठहरें। अपने ध्यान को अधिकांशतः बाहर छूटती हुई लंबी साँसों पर टिका दें। शरीर में उठने वाली उत्तेजना—वह बढ़ती गर्मी, तेज़ धड़कन और उस ‘हत्यारी ऊर्जा’ (काया-संस्कार)—को कुछ पल के लिए मात्र एक तटस्थ साक्षी बनकर देखें।

फिर, मन में बार-बार चलने वाले उस व्यक्ति के संवाद (रिप्ले या वाणी-संस्कार) को रोकें, और उसके बजाय स्वयं से पूरी जागरूकता के साथ कहें—“यह सरासर एक गलत और आत्मघाती प्रतिक्रिया है। मेरी ही ऊर्जा मुझे भीतर से जला रही है। हे भगवान! मैं इस दुर्भावना के विष से हमेशा के लिए कब मुक्त हो पाऊँगा?”

जैसे ही आप उस घटना की बाहरी ‘कहानी’ से ध्यान हटाकर केवल अपने भीतर के काया-संस्कार और वाणी-संस्कार को देखना शुरू करेंगे, दुर्भावना की उत्तेजक खुराक तुरंत कट जाएगी। आप महसूस करेंगे कि वह हत्यारी ऊर्जा कुछ ही पलों में गर्म भाप बनकर उड़ने लगी है। उस समय, उन सभी प्राणियों के प्रति ‘मेत्ता’ प्रेषित करें, जो इस क्षण आपके ही समान ऐसी अंधी प्रतिक्रियाओं और पीड़ा में उलझे हुए हैं। यह एक छोटा-सा आरंभिक कदम आपके चित्त की संकीर्णता को तोड़कर उसे तुरंत विशाल बना देता है।

जब हृदय का इस तरह विस्तार होता है, तो चित्त ब्रह्मविहार की ओर उन्मुख होकर असीम हो जाता है—और तब वह समस्त संसार के प्रति असीम प्रेम, करुणा और क्षमा से भर उठता है।

आगे क्या पढ़ें?

आईए, अब तीसरी रुकावट के त्याग की ओर बढ़ें—यानी उस सुस्ती और तंद्रा की ओर—

  • जो हमारे हृदय को वश में कर उसे बंदी बना लेती है,
  • और हमारे अन्तर्ज्ञान को दुर्बल कर हमें दुःखों में उलझा देती है।

सुस्ती-तंद्रा

इस विषय से जुड़े इस अध्याय को देखें:

पटिपदा - अध्याय छह