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लोकधम्म का चक्र
भगवान बुद्ध के अनुसार यह पूरी दुनिया आठ ‘लोकधम्मों’ के इर्द-गिर्द घूमती है, और आम इंसान का चित्त जीवन भर इन्हीं आठ खूँटों के गोल-गोल चक्कर काटता रहता है—
- लाभ और हानि
- यश और अपयश
- निंदा और प्रशंसा
- सुख और दुःख
हम संसार में सुख, सुविधा और सुरक्षा पाने के लिए उन चीज़ों को मुट्ठी में भींचने की कोशिश करते हैं, जो स्वभाव से ही सूखी रेत की तरह उँगलियों से फिसलने वाली हैं। ‘अनित्य संज्ञा’ हमारे पाँच उपादान-स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान) के प्रति इसी अंधे चिपकाव को काटने वाला सबसे अचूक और सदाबहार अस्त्र है।
सियार की खुजली
इस सुत्त में भगवान बुद्ध ‘लाभ, सत्कार और कीर्ति’ की तुलना एक ऐसे बूढ़े सियार से करते हैं जिसे खुजली की बीमारी है। वह सियार गुफा में, पेड़ के नीचे, या खुले मैदान में जाकर सोचता है कि ‘जगह’ बदलने से उसे आराम मिलेगा, लेकिन खुजली तो उसके अपने ही शरीर में है!
ठीक यही हाल हमारा है। हम प्रशंसा, रुतबे या ‘वाहवाही’ में शांति ढूँढते हैं, लेकिन तृष्णा और अहंकार की खुजली हमारे ही भीतर है। आप कोई भी सांसारिक मुकाम हासिल कर लें, अनित्यता के कारण वह ‘सुख’ कुछ ही देर में व्यय हो जाएगा और आप फिर से बेचैन हो उठेंगे।
अभ्यास कैसे करें?
दैनिक जीवन में इस साधना का अभ्यास चित्त में उठने वाले हर बुलबुले को देखने (उदय-व्यय) की कला है:
- लाभ, सत्कार और कीर्ति: जब आपकी प्रशंसा हो, या लोग आपका सम्मान करें, तो भीतर उठने वाले ‘सुख’ (वेदना) को आत्म मानकर अहंकार जागते हुए देखें। सजग होकर देखें कि कैसे वह ध्वनि (रूप), उसे सुनने का अनुभव (विज्ञान) और उसे स्वयं के अस्तित्व से जोड़ने से उपजा वह अहंकार उसी क्षण उत्पन्न हुए, कुछ देर तक स्थिर रहे, और फिर विलीन होने लगे। जो वस्तु स्वाभाविक रूप से ही लुप्त हो जाने वाली है, उसके प्रति छाती चौड़ी करना कितना हास्यास्पद और दयनीय है!
- नुकसान और अपमान: इसी तरह, जब कोई आर्थिक नुकसान हो, लोग अपमान करें या आपको भूल जाएँ, तो देखें कि उससे उपजी चित्त की सिकुड़न और छटपटाहट (दुःख-वेदना) भी स्थायी नहीं है। वह भी कारणों से उठी है और लुप्त हो जाएगी।
सफलता का पैमाना
इस साधना का उद्देश्य संसार के प्रति भावशून्य हो जाना नहीं है। सफलता तब मानी जाती है जब ‘लाभ, सत्कार और कीर्ति’ का कोई बड़ा प्रलोभन आपके सामने आए, और आपका चित्त उसे लपकने के बजाय, आग के पास लाए गए मुर्गे के पंख की तरह पीछे सिकुड़ जाए (विराग)।
जब यह दृष्टि परिपक्व होती है, तो रेत के महलों को बचाने की थका देने वाली जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, और चित्त एक असीम प्रफुल्लता और सुरक्षित शांति में स्थित हो जाता है।
अनित्य संज्ञा क्या है?
ऐसा होता है कि कोई साधक जंगल जाता है, या पेड़ के तले जाता है, या किसी ख़ाली जगह (शून्यागार) जाता है, और तब चिंतन करता है—
- ‘रूप अनित्य हैं
- संवेदनाएँ अनित्य हैं
- संज्ञा अनित्य हैं
- रचनाएँ अनित्य हैं
- विज्ञान अनित्य है’
इस तरह, वह साधक “पाँच उपादान-स्कंध” को अनित्य देखते हुए विहार करता है।
यह अनित्य-संज्ञा कहलाता है।
अनित्य-संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
जब कोई अनित्य-संज्ञा में लिन रहे, तब वह लाभ, सत्कार, और कीर्ति 1 से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
सफलता का पैमाना
जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई अनित्य-संज्ञा में लीन रहे, तब ‘लाभ, सत्कार, और कीर्ति’ से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
किंतु, यदि कोई अनित्य-संज्ञा में लीन रहने पर भी ‘लाभ सत्कार व कीर्ति’ से आकर्षित होता हो, या घिन-भाव उपस्थित न हो—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं अनित्य संज्ञा को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फल नहीं पाया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
और, यदि कोई ‘अनित्य संज्ञा’ में लीन रहे, और लाभ सत्कार व कीर्ति से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने अनित्य संज्ञा’ विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फल पा लिया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
अनित्य-संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!"
—अंगुत्तरनिकाय १०:६० + ७:४६
यतो यतो सम्मसति,
खन्धानं उदयब्बयं
लभती पीतिपामोज्जं,
अमतं तं विजानतंजैसे जैसे वह छूता है,
स्कंधों का उदय व्यय,
उसे प्रीति और प्रमोद मिलता है,
जानकार के लिए वही अमृत है।— धम्मपद ३७४
“लाभ, सत्कार, और कीर्ति, भिक्षुओं, बड़ी निर्दयी होती है। योगबन्धन से सर्वोपरि राहत पाने में बड़ी, कठोर व तीक्ष्ण बाधा बनती है। क्या तुमने कल रात बूढ़े सियार को रोते सुना?
“हाँ, भन्ते।”
वह बूढ़ा सियार खुजली से परेशान है। उसे कही सुख नहीं मिलता—चाहे वह गुफ़ा में जाए, पेड़ तले जाए, या खुली जगह। वह जहाँ भी जाए, जहाँ भी खड़े रहे, जहाँ भी बैठे, जहाँ भी लेटे—हमेशा परेशान ही रहता है।
उसी तरह कोई भिक्षु ‘लाभ सत्कार व कीर्ति’ से पराभूत हो जाता है। उसका चित्त झुलस जाता है। उसे कही सुख नहीं मिलता—चाहे वह शून्यागार में जाए, पेड़ तले जाए, या खुली जगह। वह जहाँ भी जाए, जहाँ भी खड़े रहे, जहाँ भी बैठे, जहाँ भी लेटे—हमेशा परेशान ही रहता है।
इतनी निर्दयी होती है भिक्षुओं, ‘लाभ सत्कार व कीर्ति’! योगबन्धन से सर्वोपरि राहत पाने में बड़ी, कठोर व तीक्ष्ण बाधा बनती है!
इसलिए भिक्षुओं, तुम्हें सीखना चाहिए—‘जब भी हमें ‘लाभ सत्कार व कीर्ति’ मिल रही हो, हम उससे अलग हट जाएंगे। और जो ‘लाभ सत्कार व कीर्ति’ मिल चुकी हो, उससे अपना चित्त झुलसने नहीं देंगे।’”
—संयुत्तनिकाय १७:८ ↩︎