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अभ्यास कैसे करें?
खुद से शुरुआत करें: किसी ऐसे व्यक्ति को अंगों के ढेर के रूप में देखना मुश्किल होता है जिसके प्रति आप आकर्षित हों। इसलिए इस कुरूप सच्चाई को सबसे पहले ‘अपने भीतर’ (अज्झत्त) देखें। अपनी ही त्वचा, अपनी ही हड्डियाँ, अपने ही दाँत, अपने ही मल-मूत्र की वास्तविकता को देखें। जब अपने सौंदर्य का भ्रम टूटता है, तो दूसरों के प्रति भ्रम भी दरकने लगता है।
आवरण को भेदें: यदि शुरुआत में ३२ अंगों की पूरी सूची का अभ्यास करना केवल रटने जैसा लगे, तो किसी एक या दो अंगों (जैसे दाँत या हड्डियाँ) पर ही ध्यान केंद्रित करें।
एक चेतावनी
चूँकि यह संज्ञा एक शक्तिशाली औषधि है, इसलिए इसके उपयोग में सावधानी भी आवश्यक है। ‘संयुत्तनिकाय ५४.९’ में एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन है जहाँ कुछ भिक्षुओं ने अशुभ-संज्ञा का गलत और अतिवादी दृष्टिकोण से अभ्यास किया। उन्होंने शरीर के प्रति इतनी घृणा और अवसाद पैदा कर लिया कि परिणामस्वरूप कई भिक्षुओं ने आत्महत्या तक कर ली। इस घटना के बाद भगवान बुद्ध ने उन्हें आनापानस्मृति का अभ्यास देकर उनके चित्त को पुनः संतुलित किया।
इसलिए यदि इस अभ्यास से आपके भीतर घोर निराशा, घृणा या आत्म-ग्लानि महसूस होने लगे, तो समझ लें कि अभ्यास गलत दिशा में चला गया है। आप औषधि को जहर बना रहे हैं। उसी क्षण अशुभ भावना को रोक दें और अपने चित्त को प्रसन्न करने के लिए ‘मेत्ता’ या ‘आनापानसति’ पर लौट आएँ। अशुभ भावना की सफलता का पैमाना संभोग और शारीरिक आकर्षण के विचार से मुक्त होना (विराग) है, न कि घृणा या मानसिक संताप पैदा करना।
मूल साधना
अशुभ संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी और महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
कैसे साधक काया में बदसूरती देखने की साधना करता है?
कोई साधक अपनी काया का इस तरह मनन करता है—
अयं खो मे कायो
मेरी यह काया
उद्धं पादतला
पैर तल से ऊपर,
अधो केस मत्थका
माथे के केश से नीचे,
तच परियन्तो
त्वचा से ढ़की,
पूरो नानप्पकारस्स असुचिनो!
नाना प्रकार की गंदगियों से भरी है!
अत्थि इमस्मिं काये:
मेरी इस काया में है:
केसा लोमा नखा दन्ता तचो
केश, लोम, नाखून, दाँत, त्वचा
मंसं न्हारु अट्ठी अट्ठिमिञ्जं वक्कं
माँस, नसें, हड्डी, हड्डीमज्जा, तिल्ली
हदयं यकनं किलोमकं पिहकं पप्फासं
हृदय, कलेजा, झिल्ली, गुर्दा, फेफड़ा
अन्तं अन्तगुणं उदरियं करीसं मत्थलुङगं
आँत, छोटी-आँत, उदर, टट्टी, मस्तिष्क
पित्तं सेम्हं पुब्बो लोहितं सेदो मेदो
पित्त, कफ, पीब, रक्त, पसीना, चर्बी
अस्सु वसा खेळो सिङघाणिका लसिका मुत्तं!
आँसू, तेल, थूक, बलगम, जोड़ो में तरल, एवं मूत्र।
एवं अयं मे कायो
ऐसी है मेरी काया।
उद्धं पादतला
पैर के तल से ऊपर,
अधो केस मत्थका
माथे के केश से नीचे,
तच परियन्तो
त्वचा तक सीमित,
पूरो नानप्पकारस्स असुचिनो!
नाना प्रकार की गंदगियों से भरी है!—इस तरह साधक काया में गंदगी देखते हुए रहता है। यह ‘अशुभ संज्ञा’ कहलाता है।
अशुभ संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है।
सफलता का पैमाना
जब कोई अशुभ संज्ञा में लीन रहे, तब मैथुन-कर्म (संभोग) की सोच मात्र से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
जैसे, मुर्ग़े का पँख या स्नायु के टुकड़े को आग में डाल दिया जाए, तो वह दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता। उसी तरह, जब कोई अशुभ संज्ञा में लीन रहे, तब मैथुन-कर्म की सोच मात्र से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है।
किंतु कोई अशुभ संज्ञा में लीन रहने पर भी मैथुन-कर्म की सोच से आकर्षित होता हो, या घिन-भाव उपस्थित न हो—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैं अशुभ संज्ञा को सही तरह से विकसित नहीं कर पाया हूँ। क्योंकि मुझ में क्रमानुसार बदलाव नहीं आया। मैंने इस साधना का फल नहीं पाया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
और, यदि कोई ‘अशुभ संज्ञा’ में लीन रहे, और मैथुन-कर्म की सोच मात्र से उसका चित्त दूर सिकुड़ता है, विपरीत झुकता है, पीछे हटता है, खिंचा नहीं चला जाता; बल्कि तटस्थता या घिन-भाव में स्थित हो जाता है—तब उसे समझ लेना चाहिए कि ‘मैंने अशुभ संज्ञा विकसित कर लिया। क्योंकि मुझमें क्रमानुसार बदलाव आ गया। मैंने इस साधना का फल पा लिया!’
इस तरह, वह सचेत हो जाए।
अशुभ संज्ञा की साधना करना, उसे विकसित करना—महाफलदायी, महालाभकारी होता है। वह अमृत में डुबोता है, अमृत में पहुँचाता है!
—अंगुत्तरनिकाय १०:६० + ७:४६